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05.15.2014


गोलू

वह अक्सर गन्ना चूसता या बिस्कुट चबाता हुआ किसी गली के छोर पर बैठा मिलता। लार से गाल भरे रहते और चिपके रहते कई कण; उसके दिनभर के खाने की सूची दिखाते।

लोग उसे आटा पिसवाने को चक्की भेजते और धर देते पाँच पैसे हाथ में।

वह दौड़ा चला जाता दुकान पर और एक लिमलेट लाकर सीढ़ियों की ओट में बैठ जाता।

कई बार मुँह से निकालता हथेली पर, जैसे खुद को यकीन दिला रहा हो; कि वह सच में ही खा रहा है उसे, या फिर उसके पिघलने का अफ़सोस, कुछ समझ में नहीं आते उसके भाव।

उसे सब गोलू कहते और खूब हमदर्दी जताते।

हर कोई कुछ न कुछ धर ही देता हाथ में। खा-खा कर चमड़ा उतरा रहता जांघों के नीचे उसके खाकी हाफ़ पेंट से पर फिर भी काकी चुरमें का लड्डू धर ही देती उसे। गोलू लड़कियों की बढ़ती छातियों को घूरता रहता फिर भी वह कुछ नहीं कहती उसे। झट चुनरी ठीक कर निकल जाती। एक बार तो गुन्नी की छाती को झट से हाथ लगा कर दबा दिया उसने, बोला, "ये क्या है?" साथ वाले बच्चे फिसक पड़े, गुन्नी उसका हाथ झटक कर भाग गई। उसके हम-उम्र अगर कोई दूसरा करता तो गुन्नी की माँ उसे उलटा लटका देती; ऐसा मेरी माँ कहती।

ईर्ष्या होती उससे, क्या नसीब पाया था उसने, स्कूल नहीं, दिनभर उँडेरना और फिर ये सब!
लगता कुछ ऐसा हो कि, उसका नसीब मुझे मिल जायें।

कल बीच रात गोलू की माँ आयी उसको लेकर मेरे क्लिनीक में। काफ़ी साल निकल गये थे बीच से।

पर गोलू वैस ही था। फेफरें पड़ रहे थे उसके। उसकी माँ बोली, "बचाले बेटा..बचाले उसे...।"
मेरा बचपन का दोस्त बेसुध पड़ा था मुँह खोले, अभी भी कुछ खाने की निशानियाँ कमीज़ पर बिखरी पड़ी थीं। उसी मासूम आँखों से देख रहा था। भाव समझ नहीं आ रहे थे आज भी।

मैं सर पर हाथ फेर रहा था उसके, ईश्वर से प्रर्थना कर रहा था.. "हे ईश्वर, मेरा नसीब उसे दे दो!"


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