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04.17.2014


अहसास

वह आँखे मूँदकर बैठती है। अब हर पेशी से उर्जा निकलकर चारों ओर फैलती है। कोई आकृति अंतर्मन पर प्रकटती है। समझने की कोशिश करती है उसे, पर उसका कोई आकार नहीं। उस आकृति से अब उर्जा का उलटा बहाव अपने अंदर को खिंचता सा वह महसूस करती जाती है। जीवन से भरे-भरे वह पल। सारा शरीर धधकता जाता है। सब कुछ भूल कर बस एक अस्तित्व बचा हो जैसे धरातल पर केवल वही, अकेला अस्तित्व!

कोई बंदा मोबाईल पर एफ़.एम. लगाकर ज़ोर-शोर से गाना बजाता पास से गुज़रता है, वह झटके से इंसानों की दुनिया को क्षण भर में फिर अपना लेती है। अपने आप को समेटकर अंदर की ओर छुपा देती है। और उन जीवित पलों को वही पेड़ के नीचे छोड़ कर जाती है। इसी आशा के साथ कि कल सुबह वह फिर आयेगी और वक़्त की उसी कड़ी से रुबरू होगी। ये सब उसे फिर जोड़ देंगें, वहीं से जहाँ से वह टूटी थी, बिलकुल ऐसे; जैसे टूटी ही ना हो।

या ऐसे; जैसे उस पल के बाद का जीवन उसने जिया ही ना हो।

अब वह दिन भर के कार्य में व्यस्त। किसी ऐसे ही संवेदनशील साथी के साथ कुछ नाजुक पल चुराता दिन। एक-दूसरे पर ऐसे पलों के छींटे मारते, कभी बारिश करते वे दिन भर लुका-छिपी का साथ निभाते से।

उसकी शाम आती ही व्याकुलता से भरी। दिन जिया ही नहीं और रात की गहनता फिर डुबोने आ गयी! वह नये सिरे से अपने आप को समेटती है। समेटती है दिन भर का बिखरापन, समेटती है कई टुकड़ों में बँटी उसकी व्यवहारिकता, समेटती है उसका बार-बार बहना, खंडित होना समेटती है, संवेदनशील मन ने झिड़का और फिर मजबूरी से स्वीकारी वास्तविकता का कड़वापन। वह समेटती जाती है, जोड़ती जाती है एक-एक टुकड़ा और अपने आपको "जिगसॉ पज़ल" की तरह हर तरफ़ से ठीक से जोड़ा गया या नहीं यह निहारती है। कभी अपनी नज़रों में, कभी उसका साथ देनेवाले की ऑखों से। फिर अपने आपको तसल्ली देती खड़ी होती है निशा का स्वागत करने।

अँधेरा पसंद है उसे। वह हर उस चीज़ को ढक देता है, जो वास्तविकता के भद्देपन की नुमाइश करता है। अँधेरा एक मलाई की तरह नरम-नरम सा फ़ैलता जाता है जिस्मोजान पर, जैसे उसकी कल्पना में साथी की उँगलियाँ घुमेंगी जब गर्दन पर से.. वहाँ से ... रेखा खिंचती नीचे तक.. मेरुदंड पर सरसराहट पैदा कर, शरीर-भर रोंगटे उभारे..।

वह अँधेरे से और भी उम्मीदें करती है। वह नहीं सोना चाहती रात भर। वह दिन से ज़्यादा रात को जीना चाहती है। उस सच्चे खरे अँधेरे को! जैसे इतना ही समय बचा हो ज़िंदगी का। सुबह जैसे सब ख़त्म होनेवाला हो।

उठती-जागती, पलों का हिसाब जोड़ती वह काटती जाती है दिन-रात। प्रखरता-मद्धिमता। जीती जाती है जीवन का यह घटक तरंगों पर से गिरते-उठते अहसास का। वह हर समय, हर वक़्त बस एक अहसास बन कर रहना चहती है, रहने की कोशिश में लगी रहती है, और ज़्यादातर रहती भी है।


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