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ISSN 2292-9754

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04.10.2018


निर्झर नादिया सी मैं

 अभिलाषाओं की निर्झर 
नदिया सी जब मैं बहती थी 
कल कल की ध्वनियों के मध्य
मेरी उमंग यह कहती थी .....

टेढ़े मेढ़े रस्तों पर मेरे 
अरमां जब मचलते थे
नदिया की लहरों जैसे 
साहिल से टकरते थे ....

फिर भी कभी भी डर कर
अपना रास्ता नहीं बदलते थे
मंज़िल तक पहुँचने को
निरंतर वो मचलते थे .....


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