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11.18.2007
 
मेज की इमेज
मनीष उपाध्याय ’पंचरत्न’

मैं दफ़्तर की एक मेज हूँ
फाइलों के ढेर की सबसे सुहानी सेज हूँ

नहीं हैं तैय्यार वे, मुझपर से उठकर जाने को,
रखकर इन्हें निश्चिंत सोता बाबू, भूलकर जमाने को।

दबी सदियों से बनी फाइलों की नायिका,
दिन-रात मुझपर काम होता सब का सब अन्याय का।

लेती रही हूँ हर घड़ी दफ़्तर में जायका चाय का,
मुझको पता मैं स्रोत हूँ, अतिरिक्त अवैध आय का।

एक जैसी आवाज़ें और दिखने में भी ढोल हूँ,
रखती छुपाकर राज़ सारे मूक स्वर का बोल हूँ।

अन्याय, भ्रष्टाचार, रिश्वत मेरी ही गोद के लाल से,
सम्भालकर पाला है इनको कानूनों के काल से।

लगता है आज दफ़्तर में, मन रही जन्नत की ऐश-ए-शाम है,
आया हुआ अफसर नया, जिसको कि पेश-ए-जाम है।

दिल खोलकर उसको पिलाते
मुझको भी कुछ बूँदें चखाते...
मुझको भी कुछ बूँदें चखाते...
मुझको भी कुछ...


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