अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.16.2014


उसने कहा

 मैंने उस दिन ऐसे ही कहा कि-
तुम बड़ी चालाक हो,
सब के साथ कोई न कोई रिश्ता बनाकर रखती हो

इस पर उसने फिर कहा –
तुम्हारे साथ कौन सा रिश्ता है ?

मैंने कहा –
प्यार, विश्वास और दोस्ती का

उसने कहा -
प्यार मैं तुम्हें करती नहीं
विश्वास तुम मेरा तोड़ चुके हो
और जिस पर विश्वास न हो,
वह दोस्त कैसा ?

उसकी बातें कड़वी थीं,
पर सच्ची थीं
मेरी ख़ामोशी ने,
उसे पिघलाया और वह बोली –

मेरा तुम्हारे साथ अतीत का रिश्ता है,
जो वर्तमान में अपनी पहचान खो चुका है
लेकिन मेरा वर्तमान और भविष्य,
मेरे अतीत से बेहतर नहीं है
और हो भी जाए तब भी,
अतीत की बातें मैं,
भूल नहीं सकती
क्योंकि मैं –
सबके साथ, कोई न कोई रिश्ता
बना कर रखती हूँ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें