अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.23.2016


मैंने कुछ गालियाँ सीखी हैं

मैंने पूछा –
इन दिनों नया क्या सीख रही हो
उसने कहा-
पता है
मैंने कुछ गालियाँ सीखी हैं
यहाँ की प्रादेशिक भाषा में
मैंने कहा –
तुम्हें गालियों की क्या ज़रूरत पड़ गयी

उसने कहा –
यहाँ अब देश नहीं
प्रादेशिकता महत्वपूर्ण होने लगी है
प्रादेशिक भाषा में गाली देने से ही
हम अपने सम्मान की रक्षा कर पाते हैं
पराये नहीं अपने समझे जाते हैं
इस देश के कई प्रदेशों में
आत्म-सम्मान से जीने के लिए
अब गालियाँ ज़रूरी हैं।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें