अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.01.2015


एक वैसी ही लड़की

एक शाम अकेले
जाने-पहचाने रास्तों पर
अनजानी सी मंज़िल की तरफ
बस समय काटने के लिए बढ़ते हुए
देखता हूँ
एक वैसी ही लड़की

जैसी लड़की को
मैं कभी प्यार किया करता था

उसे पल भर का देखना
उन सब लम्हों को देखने जैसा था

जो मेरे अंदर,
तब से बसते हैं
जब से उस लड़की से
मुलाक़ात हुई थी
जिसे मैं प्यार करता था

उस एक पल में
मैं जी गया अपना सबसे
खूबसूरत अतीत
और शायद भविष्य भी

वर्तमान तो बस तफरी कर रहा था
लेकिन उस शाम की याद
न जाने कितने ज़ख्मों को हवा दे गयी
काश............... क़ि
वो लड़की ना मिलती।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें