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ISSN 2292-9754

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01.14.2016


चाय का कप

चाय का कप
अपने ओठों से लगाकर
वो बोली –

तुम चाय अच्छी बनाने लगे हो
वैसी ही जैसी कि -
मुझसे बातें बनाते हो

फिर एक चुस्की के बाद
मुस्कुरा के कहा –

उतनी ही गरम है
जितना अपना रिश्ता

मैंने पूछा –
मीठी कितनी है?

उसने शर्माते हुए कहा
जितने की तुम्हें आदत है
और जितनी मैं,
तुम्हें पीने देती हूँ।


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