अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.12.2018


जूते

परम कई सालों बाद आज अपने शहर लौट कर आया था। फ़ौज में देश की सेवा करते और पोस्टिंग बदलते रहने की वजह से अपने शहर आने का मौक़ा ही नहीं मिलता था। पर इस बार परम लम्बी छुट्टी लेकर आया था, बहुत लम्बी शायद बाक़ी की पूरी ज़िन्दगी भर के लिए।

सब कुछ बदल गया था अब इस शहर में छोटा सा शहर अब बड़ा होता जा रहा था। शहर की पुरानी छोटी गलियाँ अब आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गई थीं। शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स और बड़ी-बड़ी दुकानें; इन सब से शहर भर सा गया था। ख़ाली ज़मीन का टुकड़ा भी बामुश्किल दिखाई देता।

"यहाँ तो खेल का मैदान हुआ करता था," शहर के बीचोंबीच खेल के मैदान की जगह बनती एक ऊँची बिल्डिंग को देखते हुए परम ने सोचा।

और यहाँ सामने 'जनता शू एंड स्पोर्ट्स' तीन मंज़िला शोरूम का नाम पढ़ते ही परम ठहर सा गया। यहाँ तो करीम चाचा की जूतों की दुकान हुआ करती थी जिसमें वो छोटा-मोटा खेल का सामान भी रख लिया करते थे।

"मैं अक्सर करीम चाचा से फ़ुटबॉल वाले जूते उधार ले जाया करता था और फिर जेबखर्ची से थोड़ा थोड़ा कर उन्हें चुकाता रहता था। नए जूते और फ़ुटबॉल बस दो ही तो शौक़ थे मेरे," परम एक बार फिर सोचने लगा।

"पर यहाँ इतना बड़ा शोरूम कैसे!" मन का कोतूहल और जिज्ञासा उसे शोरूम तक खींच कर ले गयी। पर वहाँ जाते ही परम ने शो केस में लगा फ़ुटबॉल वाला जूता उठा लिया और देखने लगा। सहसा नज़र दीवार पर लगी करीम चाचा की तस्वीर पर पड़ी। परम की आँखें भर आईं। करीम चाचा अब नहीं रहे थे।

"सर यहाँ जूते सिर्फ़ जोड़े (pair) में मिलते हैं।" हाथ से जूता लेते हुए करीम चाचा के बड़े लड़के ने कहा।

परम भरी आँखों के साथ अपनी बैसाखी के सहारे लंगड़ाते हुए बाहर निकल गया। शहर बड़ा हो गया था, दुकानें बड़ी हो गई थी, बच्चे बड़े हो गए थे और इंसानियत का स्वर्गवास हो चुका था।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें