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05.31.2008
 
तुम्हारे पास
ममता किरण

तुम्हारा साथ छूटने के बाद
मैंने भरसक कोशिश की
झूठमूठ खुश रहने की
जिन्दा रहने की
और
कुछ हद तक कामयाब भी रहा

बच्चों के सामने हमेशा मुस्कुराता रहा
किताबें पढ़ता रहा
मन की अभिव्यक्ति
लिखता रहा कागज पर
अपनी तनहाई बाँटने के लिए
दोस्तों को फोन करता रहा
पर अब
अब नहीं होता मुझसे ये सब

तुम्हारी याद लौ बनकर
सदा जलती रहती है मेरे भीतर
मेरी आँखों की रोशनी थक चुकी है
तुम्हारी तस्वीर देखते देखते
मेरे कान आतुर हैं
तुम्हारी आवाज सुनने को
हर जगह ढूँढता फिरता हूँ तुम्हारी खुशबू
कभी खाने में
तो कभी कपड़ों में
तो कभी बिस्तर में

नाकाम हो चुका हूँ मैं
मेरा अस्तित्व कुछ भी नहीं
तुम्हारे बिन
मैं आना चाहता हूँ तुम्हारे पास
तुम्हारे पास
वहाँ, जहाँ तुम चली गयी हो
कई जन्मों के बंधन का वादा कर
मैं आना चाहता हूँ तुम्हारे पास
तुम्हारे पास ।


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