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| 05.31.2008 |
| जाने कहाँ चले गये वो ज़िंदगी के पल ममता किरण |
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जाने कहाँ चले गये वो ज़िंदगी के पल
खुशिय़ाँ थीं ढेर सारी कोई नहीं था छल मुरझा गये हैं गुल यहाँ शायद इसीलिए आबो हवा जो चाहिए वो ही गयी बदल जिसने बढ़ा चढ़ा के किया पेश स्वयं को इस दौर में ऐसे ही लोग हो रहे सफल दिल का कठोर था वो मगर बाप भी तो था डोली चढ़ी जो बेटी तो आँखे हुईं सजल धन के नशे में चूर हैं शहज़ादे इस कदर बेख़ौफ़ हो के ज़िंदगी को जा रहे कुचल तारे हैं काफ़िये से और चाँद है रदीफ़ अहसास में जो उतरे तो हो गयी ग़ज़ल हर ओर खौफ़ बेबसी है झूठ और फ़रेब दुनिया के मायाजाल से ममता कहीं निकल। |
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