अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.31.2008
 
दो चार पल
ममता किरण

कभी इस व्यस्त जीवन में
रा दो चार पल ठहरो

ये देखो खिल रही कलियाँ
घटा सावन की छायी है
बिखेरी फूलों ने खुशबू
तितलियाँ उड़ रहीं हर ओर
कैसा मौसम सुहाना है
रंग पत्तों में लौटा है
डाल गलबहियाँ मन के साथ
सुनो उनकी जरा बातें

रात तारों भरी देखो
कि पूरा चाँद निकला है
नदी की धड़कने सुन लो
जरा महसूस लो उनको
कभी इस तपते सूरज को
जरा उगते हुए देखो

जो देखोगे अगर ये सब
तो होगीं उलझनें कुछ कम
कठिन इतना नहीं जीवन
कठिन तुमने बनाया है

कभी इस व्यस्त जीवन में
जरा दो चार पल ठहरो।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें