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| 10.04.2008 |
| बाग जैसे गूँजता है पंछियों से ममता किरण |
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बाग जैसे गूँजता है पंछियों से
घर मेरा वैसे चहकता बेटियों से घर में आया चाँद उसका जानकर वो छुप के देखे चूड़ियों की कनखियों से क्या मेरी मंज़िल मुझे ये क्या ख़बर कह रहा था फूल इक दिन पत्तियों से दिल का टुकड़ा है डटा सीमाओं पर सूना घर चहके है उसकी चिट्ठियों से बंद घर देखा जो उसने खोलकर एक क़तरा धूप आयी खिड़कियों से एक शजर ख़ुद्दार टकराने को था थी चुनौती सामने जब आँधियों से ख़्वाब में देखा पिता को य़ूँ लगा हो सदाएँ मंदिरों की घंटियों से फोन वो खुशबू कहाँ से लाएगा वो जो आती थी तुम्हारी चिट्ठियों से |
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