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| 05.31.2008 |
| अपने बचपन का सफ़र याद आया ममता किरण |
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अपने बचपन का सफ़र याद आया
मुझको परियों का नगर याद आया जो नहीं था कभी मेरा अपना क्यूँ मुझे आज वो घर याद आया कोई पत्ता न हिले जिसके बिना रब वही शामो ए सहर याद आया इतना शातिर वो हुआ है कैसे है सियासत का असर याद आया रोज़ क्यूँ सुर्ख़ियों में रहता है है यही उसका हुनर याद आया जब कोई आस ही बाकी न बची मुझको बस तेरा ही दर याद आया उम्र के इस पड़ाव पे आकर क्यूँ जुदा होने का डर याद आया माँ ने रखा था हाथ जाते हुए फिर वही दीदे ए तर याद आया जिसकी छाया तले किरण थे सब घर के आँगन का शजर याद आया। |
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