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03.12.2008
 

रिश्ता हमारा और भी गहराता गया
महिमा बोकारिया


दूरी ज्यों ज्यों वक्त मुझसे बढ़ाता गया
रिश्ता हमारा और भी गहराता गया।।
उसका जुनून था,  मेरी तन्हाई
और मैं हर पल मुस्कुराहट से सजाता गया ।।

चाँद के बहाने वक्त आया छत पर कितनी बार
तृष्णा जगानी चाही धर धर विविध आकार
उसकी पिपासा थी,  मेरी व्याकुलता
और मैं तन्मय बन रात रानी सम उसे महकाता गया ।।

संदेशा मेरा वक्त ने प्रिये तक न जाने दिया
पैगाम उसका भी मेरे तक कब आने दिया
उसकी आस थी,  मेरा एकाकीपन
और मैं खामोशियों को धड़कन का संगीत सुनाता गया ।।

मझधारों के बीच वक्त ने किया खड़ा
राहों को फूलों से ज्यादा काटों से मढ़ा
उसका मद था,  मेरा संघर्ष
और मैं सुधि के सुमरन में खुद को बहाता गया


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