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07.01.2008
 

क्या जीत लिखूँ क्या उसे हार लिखूँ
महिमा बोकारिया


क्या जीत लिखूँ क्या उसे हार लिखूँ
कैसे लफ़्जों में वो पहला प्यार लिखूँ॥

वो लम्हें अब भी जवाँ ज़हन में
जवाँ है वो सारे ही नज़ारे
फिर कैसे धड़कती धड़कनों को बीती बात लिखूँ॥

अरमानों ने खेली थी प्रीत से होली
अश्क़ भीगे उस रंग से आजतलक
फिर कैसे फीकी फीकी वो रंगीली फाग लिखूँ॥

साथ उसका नहीं हाथ की लकीरों में
मेरी ग़ज़लों की बन गया वो तक़दीर
फिर कैसे सुरीली मुहब्बत को तन्हाई की रात लिखूँ॥

दिल हार कर पाये कुछ पल सौगात में
उस हर पल में समाया आनन्द इबादत सा
फिर क्य़ूँ ख़ुद को मीरा उसको घनश्याम लिखूँ॥

न जीत लिखूँ न अब कोई हार लिखूँ
दुनिया से बचाकर अपना दिलनशी प्यार रखूँ॥


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