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07.01.2008
 

जिस मोड़ से गुरो उसी की पहचान बनो
महिमा बोकारिया


ख़्वाबों में आशाओं के रंग बिखरने दो
खुले नयनों में आकाश सिमटने दो
बना ली बहुत सिमाएँ चारों और
कल्पनाओं को उन्मुक्त उड़ान अब भरने दो॥

निराशा हताशा की चिता सजने दो
तन्हाई को मौन संगीत से भरने दो
अद्‌भुत सौन्दर्य दिखेगा हर तरफ
इक बार अदंर का गागर तो छलकने दो॥

क्यूँ ज़िंदगी को अपने से बिछड़ने देते हो
बाहरी चकाचौंध में पागल बन भटकने देते हो
भीतर ही हैं खुली हुई मधुशाला
क्यूँ नहीं इसी में खुद को बहकने देते हो॥

खुद से खुद को ज़रा बात करने दो
सुप्त ऊर्जा को जरा वात बन बहाने दो
मत रोको अपने बचपन को
खुल के हँसो जरा उत्पात होने दो॥

फरारी से द्रुत मन के सवार बनो
अट्टालिका में रहकर भी हिम का आकार बनो
जीवन को कर लो इतना उन्नत तेजस्वित
जिस मोड़ से गुज़रो उसी की पहचान बनो॥


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