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07.01.2008
 

बना रहूँ सदा मनमीत
महिमा बोकारिया


नहीं चाहत, आऊँ कभी तुम्हारे ख़्वाबों में
या फिर तेरी मुस्कान से सुरभित बागों में
पर जब तन्हाई चुराने लगे तूमसे तूम्हारी प्रीत
साथ देने तुम्हारा, मैं खड़ा सदा मनमीत॥

नहीं हसरत, तू मुझे लिखें रोज़ डायरी में
या झलक मेरी दिखे तेरी किसी चर्चित शायरी में
पर जब कभी तेरे अश्क़ों से बहने लगे गीत
उसे थामने, मैं खड़ा सदा मनमीत॥

नहीं बुलाना भले अपनी कामयाबी के जश्न में
या माँगना दुआओं के लिए फैले दामन में
पर जब कभी राह मे तुम्हें न मिले जीत
हमराह बनने, मैं खड़ा सदा मनमीत ॥

यही आरज़ू, तेरे जीवन मे खुशियों का पारावार हो
और तेरे हर ग़म पर मेरा अधिकार हो
तेरे हर तमस को हर जाऊँ बन दीप प्रदीप्त
अपना अक़्स, उकेरे बिना ही बना रहूँ सदा मनमीत ॥

मेरी ख़ामोश अनाम चाहत की इतनी सी हैं रीत
बिन रिश्ते बिन बन्धन के बना रहूँ सदा मनमीत ॥


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