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05.03.2012
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योगिनी - (आसक्ति)
महेशचन्द्र द्विवेदी


 

मीता की आशंका निर्मूल नहीं थी- भुवन चंद्र सचमुच ऐसे आवेश के वशीभूत होकर गया था कि वापसी की बात सोचने में भी अक्षम था; उसे तो बस चलते चला जाना था- दूर, इतनी दूर कि कि मीता अथवा उससे सम्बंधित किसी प्रकार की स्मृति अथवा छवि भी मन में न आये। वह मानिला मंदिर से पर्वतीय  वन के बीच बनी पगडंडियों के मार्ग से अपनी धुन में चला जा रहा था- उसे न अँधेरे में साँप-बिच्छू पर पैर पड़ जाने का ख़याल था और न किसी नरभक्षी के सामने आ जाने का डर; चलना और अधिक से अधिक दूर पहुँच जाना मात्र उसका लक्ष्य था। जब पर्वत पर नीचे को ढलान पर उतरना होता, तो वह दौड़ने लगता और फिर ऊँचाई आने पर उसी झोंक में बढ़ता जाता था। सूर्य अधिक नहीं चढ़ पाया था, जब भुवन चंद्र हेड़ाखान के मंदिर के निकट पहुँच गया। यह मंदिर रानीखेत से लगभग छः किलोमीटर पहले चिलियानौला में एक रमणीक पहाड़ी पर ५५०० फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी में बाबा हेड़ाखान ने वर्षों तपस्या की थी। स्वामी योगानंद ने इन्हें क्रियायोग का ज्ञानी महावतार बाबा का नाम दिया था। फिर बीसवीं सदी में भी इस मंदिर के एक बाबा जी बाबा हेड़ाखान के नाम से पूजे जाते रहे हैं। वर्ष १९८४ में उनकी मृत्यु के पश्चात अब केवल मूर्ति की पूजा होती है। आज सैकड़ों भक्तगण इस मंदिर पर प्रतिदिन आकर दर्शन, भजन, कीर्तन करते रहते हैं।

भुवन चंद्र इस मंदिर पर पहले भी कुछ दिन रुक चुका था। मंदिर के एक पुराने बाबा ने सड़क पर आत्मविस्मृति में भागते से भुवनचंद्र को देखकर पहचान लिया और साग्रह ऊपर अपनी कुटिया में ले गया। प्रातःकालीन क्रियाओं से निवृत होकर भुवनचंद्र ने जब बाबा द्वारा प्रस्तुत प्रसाद खाया, तब वह अपने कल्पनालोक से वर्तमान में आने लगा। उसे अत्यधिक थकान का अनुभव हो रहा था और वह फर्श पर बिछी चटाई पर लुढ़क कर सो गया और सायंकाल बाबा के जगाने पर ही जागा। आरती के समय वह बाबा भुवनचंद्र को मंदिर के गर्भगृह में ले गया। वहाँ घंटा-घड़ियाल का सुर सुनकर भुवनचंद्र का मन पुनः विचलित होने लगा- उसे आरती के समय अपने सामने खड़ी रहने वाली मीता की स्मृति गहराई से सताने लगी। उसने किसी तरह कुछ भोजन किया, परंतु भुवनचंद्र के मन को मानिला, मीता और माइक कुरेदते रहे- वह जितना उन्हें भूलने का प्रयत्न करता, उतनी ही मन के धाव को कुरेदे जाने की टीस उसे होती और फिर इस अनुभूति में और अधिक रम जाने से वह उसी प्रकार अपने को नहीं रोक पाता जैसे पीठ में खुजली पड़ने पर खुजलाने वाला व्यक्ति यह जानते हुए भी कि नाखूनों से पीठ छिलती जा रही है, अपने को रोक नहीं पाता है।

जब मंदिर में निस्तब्धता छाने लगी, तब भुवनचंद्र चुपचाप मंदिर के प्रांगण से बाहर निकल आया और वन मार्ग से अल्मोड़ा की ओर चल दिया।

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दूसरे दिन वह अल्मोड़ा पहुँचकर शिव के नारी रूप के त्रिपुर सुंदरी मंदिर में पहुँचकर विश्राम करना चाहता था, परंतु अल्मोड़ा आने से कुछ पहले ही क्लांत होकर सड़क किनारे के एक ढाबे की बगल में घास पर लेट गया। ढाबे वाला उसे ध्यान से देख राह था। सायंकाल जागने पर ढाबे वाले ने उससे पूछा,

बाबा, कहाँ जाना है?‘

जहाँ शंकर बाबा ले जायें।

ढाबे वाला इस रहस्यमय उत्तर से बड़ा प्रभावित हुआ। उसने उसे भोजन कराया और ढाबे पर रात्रि विश्राम ा आग्रह किया, परंतु भुवनचंद्र यह कहकर आगे चल दिया कि शंकर बाबा की इच्छा अभी उसे विश्राम कराने की नहीं है। 

मिरतौलिया के मार्ग से चलकर भुवनचंद्र प्रातः होते होते जटागंगाघाटी में स्थित जागेश्वर महादेव के मंदिर पहुँच गया। वहाँ नंदिनी एवं सुरभि के जलस्रोतों के संगम पर उसने स्नान-ध्यान किया। आज वह अपने को बहुत कुछ सहज अनुभव कर रहा था। यहाँ के प्राचीन मंदिर एवं अछूता प्राकृतिक वातावरण  उसका मन मोह रहे थे। अन्य मंदिरों में दर्शनोपरांत उसने तरुण जागेश्वर /जागेश्वर महादेव/ के मंदिर में प्रवेश किया। इस मंदिर के द्वार पर द्वारपाल के रूप में केवल नंदी न होकर नंदी एवं स्कंदी दोनों खड़े थे, गर्भगृह में शिवलिंग अकेला होते हुए भी दो भागों में बंटा थाः बड़ा भाग शिव का एवं छोटा भाग पार्वती का प्रतीक था, तथा शिवलिंग के पीछे चंडा राजा दीपचंद एवं त्रिपालचंद की मूर्तियाँ विराजमान थीं। भुवनचंद्र ने ध्यानस्थ होकर देर तक इस मंदिर में पूजा की- इस बीच उसे अनुभूति होती रही कि एक शिवलिंग मे दो स्वरूपों की भाँति उसके स्वयं में भी भुवन एवं मीता दोनों सिमट हुए हैं। उसके मन में एक प्रकार का स्वांतःसंतोष घर कर रहा था। परिस्थिति एवं काल से विस्मृत होकर वह तब तक ध्यानस्थ बैठा रहा जब तक एक साधु उसे भोजन हेतु बुलाने नहीं आया।

भुवनचंद्र जागेश्वर की ईश्वरमयता एवं नीरवता से प्रभावित होकर वहीं रुक गया। निर्जनता बड़ी रोमांचक एवं मोहक होती है परंतु उसमें एक अवगुण भी होता है, और वह है दुखद स्मृतियों की तीक्ष्णता को द्विगुणित कर देना।  भुवन के प्रथम दो-तीन दिन तो किसी तरह कट गये, परंतु चौथे दिवस की सायं होते ही मीता की याद और माइक के प्रति उसकी आसक्ति की कल्पना भुवनचंद्र के मन को ऐसे सालने लगे कि उसका मन उनसे और दूर चले जाने को छटपटाने लगा। सौभाग्यवश पाँचवें दिन सन्यासियों एवं सन्यासिनियों की एक टोली वहाँ आयी, जिससे भुवनचंद्र की जानपहचान हो गई। यह समूह आदिकैलाश जा रहा था। भुवनचंद्र की वाणी, उसके योग के ज्ञान, एवं उसके तपोनिष्ठ व्यक्तित्व से वे सब अत्यधिक प्रभावित हुए एवं उन्होंने यह जानकर कि योगी भुवनचंद्र का कोई ठिकाना विशेष नहीं है, उसे अपने साथ आदिकैलाश चलने का साग्रह निमंत्रण दे दिया। भुवनचंद्र को भी उनके साथ लग जाने में मीता से बहुत दूर चले जाने का एक अवसर दिखाई दिया और वह अगले दिन उनके साथ चल पडा।

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सन्यासियों की टोली पिथौरागढ़ जनपद की ख्यातिप्राप्त कंदरा पातालभुवनेश्वर के दर्शन करते हुए आदिकैलाश जा रही थी। जागेश्वर से पातालभुवनेश्वर का वनमार्ग अत्यंत दुरूह है क्योंकि सीधी खड़ी पर्वतीय चट्टानों को आच्छादित किये हुए घने वन से होकर जाता है। इस मार्ग में साँपों के अतिरिक्त बाघ एवं तेंदुए से सामना हो जाने की भी सम्भावना रहती है। अतः बस से यात्रा करना तय हुआ। बस काफी खाली थी। एकांत पाने एव अपने में मग्न रहने के उद्देश्य से भुवनचंद्र केवल दो व्यक्तियों के हेतु बनी खाली सीट पर जाकर बैठ गया। कुछ देर में एक अधेड़ आयु की संन्यासिनी ने उसी सीट के निकट खड़े होकर उससे खिड़की की ओर खिसकने का संकेत किया। यद्यपि भुवनचंद्र एकांत चाहता था तथापि यह देखकर कि दो व्यक्तियों के बैठने हेतु बनी सभी सीटों पर एक न एक व्यक्ति बैठ चुका है, वह शिष्टतापूर्वक खिड़की के निकट खिसक गया। भुवनचंद्र खिड़की के बाहर के दृश्य को देखने लगा, परंतु उसका मन न चाहते हुए भी मानिला के मंदिर की ओर भटक जाता था और वह मीता की यादों में खो जाता था- वह कभी सोचता कि मीता अब प्रातः की पूजा समाप्त कर मंदिर की व्यवस्था सम्बंधी निर्देश दे रही होगी, फिर तभी उसमें ईर्ष्याभाव जाग उठता और विचार आता कि मीता माइक के साथ अमेरिका चली गई होगी, और फिर यह हृदयविदारक विचार असीम करुणा में परिवर्तित हो जाता और वह यह सोचकर दुखी हो जाता कि मेरी मीता किसी मुसीबत में न फँस गई हो। सन्यासिनी भुवनचंद्र को यदा कदा तिरछी निगाहों से देख लेती थी और उसके मन के अंतर्द्वंद्व को पढ़ने का प्रयत्न कर रही थी। उसे जब भुवनचंद्र के नेत्रों में अश्रु छलकते दिखाई दिये, तो उसने भुवनचंद्र से पूछ लिया,

 योगी जी, कहाँ के रहने वाले हैं?‘

यद्यपि भुवनचंद्र किसी प्रकार के वार्तालाप से बचना चाहता था, परंतु विवशतावश उसे कहना पडा,

 मानिला, अल्मोड़ा

सन्यासिनी यह उत्तर सुनकर अपनी सीट पर उछल सी पड़ी और अतीव प्रसन्नता का प्रदर्शन कर बोली,

 तो क्या आप योगी भुवनचंद्र हैं?‘

भुवनचंद्र ने उसकी ओर चकित होकर देखते हुए उत्तर दिया,

 हाँ।

सन्यासिनी उल्लास से रोमांचित होकर बोली,

 इसीलिये मुझे प्रारम्भ से ही आप पहचाने से लग रहे थे, परंतु आप ने अपना चेहरा और बाना ऐसा बना रखा है कि इस दशा में मैं क्या सम्भवतः आप की माँ भी आप को न पहचान पायें।

 आप मुझे कैसे जानतीं हैं?‘

 सन्यासिनी का चोला धारण करने से पूर्व मेरा नाम सुमना उर्फ़ शायना था। सम्भवतः आप को याद आ जाये कि जब आप मानिला मंदिर के स्वामी बने थे तब मैं अपनी एक सहेली के साथ आप के यहाँ आई थी और फिर सहेली के वापस चले जाने पर वहीं रुक गई थी। इसका कारण यह था कि मेरे पति सलमान, जिनसे मैंने अपने घर वालों के विरोध के होते हुए प्रेम विवाह किया था, दूसरा निक़ाह करने जा रहे थे और शरियत के मुताबिक चार बीबियाँ रखना जायज़ बताते थे। इससे क्षुब्ध व दुखी होकर मैं अपने पति से पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा के उपरांत एक सप्ताह में लौट आने की बात कहकर आई थी, पर पता नहीं अपनी उस समय की परिस्थिति के कारण अथवा अपनी किसी दुर्बलता के कारण मैं वहाँ आप में अपना भविष्य देखने लगी थी। आप अपने प्रति मेरे इस आंतरिक लगाव को नहीं समझ सके थे और मुझसे एक सामान्य भक्त जैसा व्यवहार करते रहे थे। मै यह सोचकर चुप बनी रही थी कि किसी न किसी दिन तो आप मेरे हृदय की बात समझ ही लेंगे, परंतु तभी मीता नाम की योगिनी वहाँ आ गई थी और मेरे लिये सब कुछ समाप्त हो गया था। दूसरे दिन मैं वहाँ से बिना किसी को कुछ बताये अपने पति के पास चली गई थी परंतु, जैसी आशंका थी, तब तक वहाँ भी मेरे लिये सब कुछ बदल चुका था। तब से मैं सन्यासिनी बनकर साधुओं की टोली में सम्मिलित होकर वन-पर्वत में भटक रही हूँ। कहते हैं कि ये वन एवं पर्वत मनुष्य को माया-मोह से पिंड छुड़ाकर संतोष एवं परमानंद की स्थिति में पहुँचाते हैं, परंतु मुझे तो यहाँ आकर आज तक केवल पलायन की अनुभूति हुई है- न तो मुझे शांति मिली है और न मेरी सांसारिक आसक्ति में कमी आई है।‘- आसक्ति में कमी न आने की बात कहते हुए सन्यासिनी भुवनचंद्र को प्रेमपूरित नेत्रों से देखने लगी थी, और भुवनचंद्र असहज हो गया था। विषय परिवर्तन के उद्देश्य से भुवनचंद्र बोल पड़ा था,

क्या आप पहले कभी पातालभुवनेश्वर गईं हैं? क्या है वहाँ? नाम तो बड़ा पौराणिक है।

सुमना तो भुवनचंद्र से बात करते रहने का कोई बहाना चाहती ही थी, अतः बड़े मनोयोग से बताने लगी,

हाँ, मैं दो बार पहले वहाँ जा चुकी हूँ। पिथौरागढ़ जनपद में यह पर्वत के गर्भ में एक बड़ी सी कंदरा है, जिसमें ३३ करोड़ देवताओं का वास होना कहा जाता है। उसमें प्रवेश करने के लिये पर्वत में पतला सा दुरूह छेद है, जिसमें कठिनाई से एक व्यक्ति घुस पाता है। यदि कोई व्यक्ति हृदय से कमज़ोर हो तो नीचे तक पहुँचने से पूर्व घबरा सकता है, अतः पूरी तरह आश्वस्त होने पर ही उसमें घुसना चाहिये- मुझ जैसे खाये पिये घर के व्यक्ति /यद्यपि सुमना मोटी नहीं थी, परंतु भरे हुए स्वस्थ बदन की थी/ को विशेष ध्यान रखना चाहिये। परंतु एक बार नीचे पहुँचते ही ऐसा प्रतीत होने लगता है कि आप किसी अन्य लोक में पारगमित कर दिये गये हों। बायीं ओर कुछ ही दूरी पर शेषनाग अपना विशाल फन फैलाये हुए भगवान विष्णु पर छाया किये हुए दिखाई देते हैं। शेषनाग के शरीर का शेष भाग नीचे धरती पर दूर तक कंदरा में फैला हुआ है। आगे चलकर अनेक अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ पर्वत में प्रकृति द्वारा गढ़ी हुई दिखाई देतीं हैं। सम्पूर्ण कंदरा एक देवलोक का प्रतिरूप प्रतीत होती है।

भुवनचंद्र सुमना की बात ध्यान से सुन रहा था और पातालभुवनेश्वर में एक रहस्यलोक छिपे होने की कल्पना से अभिभूत हो रहा था। वह अपने कल्पनालोक में खोया हुआ सा एकटक उसके मुख की ओर देख रहा था और उसके चुप होने पर भी यथावत  देखता रहा, तब सुमना अपने नेत्रों को लज्जावनत करके बोली,

मीता आजकल कहाँ है?‘

यह प्रश्न सुनकर भुवनचंद्र के हृदय मे एक कंपकपी सी छूट गईः वह आश्चर्यचकित था कि इतनी देर तक वह मीता के विरह को कैसे भुला सका था। उसके मुख से अनायास निकल गया,

अपने मित्र माइक के साथ अमेरिका गई होगी।

सुमना भी आश्चर्यचकित होकर इस आशा से भुवनचंद्र को देखती रही कि वह मीता के विषय में आगे कुछ और बोलेगा, परंतु योगी ने अपना मुँह बाहर की ओर घुमाकर ऐसा भाव धारण कर लिया जैसे कि बात पूर्ण हो चुकी है और उसे आगे कुछ नहीं कहना है। सुमना ने उस समय चुप रहना ही अच्छा समझा।

अपरान्ह में लगभग पाँच बजे यह सन्यासी समूह पातालभुवनेश्वर पहुँच गया और सीधे कंदरा पर दर्शनार्थ आ गया। जब सब लोग एक एक करके कंदरा में उतरने लगे तो सुमना ने भुवनचंद्र को कहा कि वह पहले उतरे, तत्पश्चात वह स्वयं सावधानीपूर्वक उतरेगी। नीचे उतरकर भुवनचंद्र सन्यासिनी की प्रतीक्षा में खड़ा हो गया। सुमना पैर नीचे डालकर उतरने लगी और कुछ नीचे उतरने के पश्चात चिल्लाई,

धीरे से नीचे खींचिये, मुझे फंसाव का अनुभव हो रहा है

भुवनचंद्र ने नीचे सुमना की टांगों केा पकड़ कर उसे सहारा देकर उतार लिया। भुवनचंद्र को लगा कि सुमना इस दौरान उससे कुछ अधिक ही लिपट रही थी।

पातालभुवनेश्वर का दृश्य योगी को सुमना द्वारा वर्णित तथ्यों से कहीं अधिक रहस्यात्मक लगा। उस दौरान वह सुमना का साथ एवं मीता की स्मृति दोनों को भूल गया था।

सन्यासियों ने रात्रि विश्राम हेतु वहीं निकट के एक खाली खेत को चुना। ग्रीष्म ऋतु की रात्रि में झींगुर की चीं.......चीं....... एवं श्रगालों के रुदन की ध्वनि के अतिरिक्त चहुँओर शांति थी। आकाश इतना निर्मल था कि उसके एक एक तारे को गिना जा सकता था। सुमना ने सप्रयास अपनी चादर भुवनचंद्र के बगल में ही बिछाई थी, परंतु भुवनचंद्र आकाश के तारों में अपनी मीता को खोजता सा दूसरी ओर मुँह करके निद्रनिमग्न हो गया।

 

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आगे धारचुला तक की यात्रा बस से थी और उसके पश्चात पंगु, सिरखा, गलगड, मालपा, बुधी, गुंजी, ओमपर्वत, कुटी, पार्वती ताल, जौलिंगकौंग से आदि-कैलाश की यात्रा दुरूह चढ़ाई के पर्वतीय पैदल मार्ग से थी, जिसे पूरा करने में दस दिवस लग गये। इस दौरान योगी श्रम से इतना क्लांत रहता था कि मीता की स्मृति आती तो थी, परंतु मस्तिष्क उसे रोके रहने अथवा उससे दुखित होने में असमर्थ रहता था। पर्वतीय चढ़ाई अत्यंत क्लांति देने वाली थी, तथापि प्रकृति की सुंदरता अपने चरम पर होने के कारण वह सह्य हो जाती थी। गुंजी से एक मार्ग कैलाश-मानसरोवर को भी जाता था और कुछ युवा सन्यासियों ने आदि-कैलाश से लौटकर वहाँ जाने की बात भी उठाई, जिस पर कतिवय अनुभवी सन्यासियों ने अति-शीत एवं प्राणहारक मार्ग की बात कहकर उन्हें सावधान करना चाहा परंतु उन्होने भगवान शंकर की कृपा से पार हो जाने की बात कहकर कैलाश पर्वत के दर्शन करने के अपने निश्चय को दोहराया। तब भुवनचंद्र ने यह बताकर उनके अविवेकी उल्लास का शमन कर दिया कि चीन का वीसा लिये बिना वहाँ नहीं जाया जा सकता है और यदि चीनियों ने पकड़कर जेल में बंद कर दिया, तो मृत्यु ही वहाँ से छुटकारा दिला पायेी।

भुवनचंद्र को कठिनाइयों से जूझने का अनुभव था, अतः उसे मार्ग में कोई विशेष कष्ट नहीं हुआ, केवल इसके कि सुमना अवसर पाते ही उसके अति-निकट आने का सयास प्रयत्न करती थी और उस समय योगी के हृदय में मीता की याद और गहरी टीस देने लगती थी। अंत में आदि-कैलाश के चार हजार सात सौ सत्तर मीटर ऊँचे हिमाच्छादित श्वेत शिखर को देखकर योगी अभिभूत हो गया- उसमें उसे साक्षात शंकर के दर्शन हो रहे थे। उसके उत्तर में कैलाश पर्वत, दक्षिण में गुर्ला मांधाता, पश्चिम में रक्षा ताल उसकी शोभा में चार चाँद लगा रहे थ। यहाँ आकर योगी को ऐसा लगा कि वह यहाँ तपोलीन होकर मीता की स्मृति को अवचेतन मन के किसी पहुँच के बाहर वाले कोने में डाल सकता है एवं अपना शेष जीवन यहीं बिता सकता है।

जीवन की वास्तविकता हमारी आशाओं एवं आकांक्षाओं को प्रायः दिवास्वप्न में परिवर्तित कर देती है। उसी रात्रि के अँधकार में जब योगी निद्रानिमग्न था, सुमना चुपचाप उसके बिस्तर में घुस आई। योगी की आँख खुलने पर उसने उसे दुत्कारते हुए कह दिया,

चलो हटो। सन्यासिनी के लिये यह बड़ा अशोभनीय आचरण है।

प्रातःकाल जब सबकी आँख खुली, सन्यासिनी सुमना वहाँ नहीं दिखाई दी। सब अचम्भित थे कि सुमना क्यों और कहाँ चली गई है- केवल योगी भुवनचंद्र को उसके चले जाने के कारण का आभास हो रहा था और वह चिंता से व्यग्र हो रहा था। बहुत खोज करने पर भी सुमना का कोई पता नहीं चला। योगी भुवनचंद्र के मन में यह धारणा घर करने लगी कि सुमना अब इस संसार में नहीं है और इसके लिये वह स्वयं को अपराधी मानकर ग्लानिग्रस्त हो गया। इसके साथ ही उसके मन में यह अशुभ विचार भी आने लगा कि कहीं उसका ईर्ष्याजनित व्यवहार मीता के लिये भी किसी त्रासदी का कारण न बन जाये।

दूसरी प्रातः किसी के जागने के पूर्व योगी भुवनचंद्र मानिला के लिये चल पड़ा। मीता से मिलन की आस उसके पैरों में पंख लगाये हुई थी और मीता को मंदिर पर पाकर उसके अश्रु वर्षा ऋतु के झरने की भाँति झर पड़े थे।

योगी के लौट आने पर हेमचंद्र चायवाला, जो प्रारम्भ से योगी एवं योगिनी के अनन्य प्रेम का साक्षी रहा है, अब फिर मन ही मन मगन रहने लगा है।

पीछे - 1, 2


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