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| 12.12.2008 |
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योगिनी
- (आसक्ति) |
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मानिला मल्ला मंदिर के सामने योगासन करने हेतु साधक एवं साधिकायें आ चुके
हैं और उन्होंने मंदिर के बरामदे में रखी आलमारी से अपने आसन निकालकर हरी
हरी घास पर बिछा लिये हैं। ग्रीष्म ऋतु की प्रातः बड़ी सुहानी है। आकाश
स्वच्छ एवं नीला है परंतु पूर्व दिशा में रवि के उदय की सूचना देते हुए
रक्ताभ हो रहा है। चीड़ के वृक्षों की नुकीली पत्तियों के बीच से होकर आने
वाली मंद बयार की शीतलता शरीर को रोमांचित कर रही है एवं चीड़ की पत्तियों
में कम्पन उत्पन्न कर ऐसी कोमल सरगम की ध्वनि निकाल रही है जैसे कोई कुशल
वादक सितार के सातों तारों को एक साथ बहुत हल्के हल्के झंकृत कर रहा हो।
मानिला मंदिर के चारों ओर पसरे वन में निर्द्वंद्व होकर रात्रि विश्राम
करने वाले पक्षी अपने कलरव से प्रातःवेला का स्वागत कर रहे हैं। योगी
भुवनचंद्र एवं योगिनी मीता के मंदिर से बाहर आने की प्रतीक्षा है और इस बीच
साधक एवं साधिकायें हल्के-फुल्के वार्तालाप में निमग्न हैं।
धीर गम्भीर मुद्रा में योगी के आगमन के साथ पूर्ण शांति छा जाती है- ऐसा
प्रतीत होता है जैसे पक्षी भी नित-नित योगी के आगमन के साथ साधकों में
व्याप्त हो जाने वाली शांति के अभ्यस्त हो चुके हैं और वे भी कुछ क्षण के
लिये अपना अविरल वार्तालाप स्थगित कर देते हैं। योगी हरिओउम् का उच्चारण कर
साधकों के समक्ष बने छोटे से चबूतरे पर विराजमान हो जाते हैं। फिर निशब्द
पदचाप के साथ योगी के पीछे आने वाली येागिनी मीता चबूतरे के आगे की घास पर
अपना आसन बिछा लेतीं हैं। योगिनी सबको पद्मासन,
अर्धपद्मासन अथवा सुखासन में बैठ जाने का निर्देश देतीं हैं और स्वयं के
साथ तीन बार ओउम् ध्वनि करने को कहतीं हैं। प्रकटतः योगी भी ध्यानस्थ हो
जाते हैं,
परंतु योगी वास्तविकता में एकाग्रचित्त नहीं हो पाते हैं। गत वर्ष योगिनी
के माइक नामक अमेरिकन के साथ अमेरिका चले जाने की घटना के पश्चात योगी आज
तक किसी भी दिन मन को पूर्णतः एकाग्र नहीं कर पाये हैं- योगिनी के अमेरिका
में होने की अवधि में विरह की टीस एवं तिरस्कार के आभास के कारण तथा योगिनी
के वापस आ जाने के उपरांत आशंकाजनित अनियंत्रित आसक्ति के कारण। योगी के मन
में असुरक्षा की ऐसी भावना भर गई है कि कुछ क्षणों का अंतराल होने पर ही वह
योगिनी को देखने को विह्वल होने लगते हैं।
योगिनी एवं साधक नेत्र मूँदकर सूर्य नमस्कार करने में व्यस्त हैं परंतु
योगी पद्मासन में बैठकर अर्धनिमीलित नेत्रों से योगिनी के नखशिख का अवलोकन
कर रहे हैं। योगिनी द्वारा हस्तउत्तान आसन करने पर योगी का ध्यान योगिनी
द्वारा पहने हल्के आसमानी रंग के कुर्ते एवं श्वेत शलवार में उभरते योगिनी
के अँगों एवं शिर के पीछे लटकते काले केशों पर विचरण करता है। योगी को
योगिनी अतीव आकर्षणयुक्त सुंदरी लग रही हैं और वह रोमांचित हो रहे हैं।
यद्यपि योगिनी के अमेरिका जाने के पूर्व भी योगी का योगिनी के प्रति आकर्षण
किसी क्षण न्यून नहीं होता था,
परंतु अब योगी के मन में व्याप्त यह भय,
कि कहीं योगिनी उससे पुनः न बिछड़ जाये,
योगिनी का पल दो पल का वियोग भी योगी को असहज कर देता है। योगिनी द्वारा
सूर्य नमस्कार के आगे की
क्रिया- पादहस्त आसन,
अश्वसंचालन आसन,
पर्वतासन,
साष्टांग प्रणाम आसन और फिर उनसे वापसी की प्रक्रिया- के दौरान भी योगी
लुकछिपकर अपना कोई नेत्र खोलकर योगिनी के अँगसंचालन का अवलोकन करते रहते
हैं। योगी अब पुरुष साधकों के प्रति भी ईर्ष्यालु हो गये हैं। वह नहीं
चाहते हैं कि कोई पुरुष साधक योगिनी के अँगसौष्टव को भरपूर देखे। अतः वह
यदा-कदा उन पर भी सशंकित निगाह डाल लेते हैं। कहते हैं कि नारी जाति में
किसी पुरुष के आकर्षण को भाँप लेने एवं सचेत हो जाने के लिये छठी इंद्रिय
होती है। योगिनी मीता साधकों की ओर मुँह करके बैठी हैं एवं योगी के सामने
उनका पृष्ठभाग है,
तथापि उन्हें योगी द्वारा अर्धनिमीलित नेत्रों से अपने अँगों को अवलोकित
किये जाने का भान हो रहा है जिससे एक उत्तेजक स्पर्श का आभास हो रहा है।
योगिनी को यह आशंका भी हो रही है कि यद्यपि योगी एवं योगिनी के सहवास की
बात जग जाहिर है,
तथापि योगी द्वारा सबके सामने इस प्रकार का नित-नित आसक्ति प्रदर्शन साधकगण
के नेत्रों में किरकिरी उत्पन्न कर सकता है। वह कई दिनों से योगी को इस
विषय में सावधान करने की सोच रही थीं,
परंतु स्वयं के अमेरिका चले जाने से योगी के मानस में उत्पन्न वेदना का
ध्यान कर समुचित शब्द नहीं ढूँढ पाती थीं। आज योगिनी अनुभव कर रही थीं कि
योगी अपनी विह्वलता का प्रदर्शन कुछ अधिक ही कर रहे थे। अतः उन्होंने
योगासन की समाप्ति के उपरांत योगी को इस विषय में सीधे न सही तो अप्रत्यक्ष
रूप से सचेत करने का निश्चय कर लिया। साधकों के चले जाने के उपरांत योगी के
साथ एकाकी होने पर योगिनी ने योगी से कहा,
“अब
इस गाँव के लोग भी कितने मुँहफट हो गये हैं- आज हास्यासन के उपरांत मनोहर
श्याम द्वारा सेक्स सम्बंधों के विषय में सुनाया गया चुटकुला कुछ वर्ष
पूर्व तक कोई व्यक्ति अपने संगी-साथियों के अतिरिक्त अन्य किसी के सामने
सुनाने की बात सोच भी नहीं सकता था।”
“हाँ,
सच कहती हो।”
योगी के मुँह से यह उत्तर सुनकर
मीता आगे बोली,
“भुवन!
तुम्हें ज्ञात है कि कुछ दिन से गाँव के कुछ मनचले लड़के तुम पर क्या फब्ती
कसने लगे हैं-
‘सूरत
है भोली-भाली,
पर दिल का बेईमान है’?”
यह सुनकर योगी कुछ बोलते नहीं हैं,
परंतु इसके अर्थ पर विचार कर उनके मन में गुदगुदी अवश्य उठती है और एक
धृष्ट स्मितरेखा उनके अधर पर बिखर जाती है। योगिनी मीता उन्हें प्रेमपूरित
नेत्रों से देखती रह जाती हैं।
**
कुमाऊँ /कूर्मांचल/ क्षेत्र में अल्मोड़ा जनपद को मंदिरों का जनपद कहा जा
सकता है। मध्यकाल में यह क्षेत्र कत्यूरी राजा द्वारा शासित था,
जिन्होंने इसका बड़ा भूभाग
श्रीचांद नामक गुजराती ब्राह्मण को बेच दिया था। चांद वंश के राजाओं ने
यहाँ अनेक मंदिरों का निर्माण कराया था। इस क्षेत्र की सुंदरता से अभिभूत
होकर गाँधी जी ने कहा था,
‘इन
दीज हिल्स,
नेचर्स ब्यूटी इक्लिप्सेज औल मैन कैन डू‘।
इसी के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में चीड़ के वृक्षों से आच्छादित ऊँची पहाड़ी
के ढलान पर बसे मानिला गाँव में दो मानिला मंदिर हैं- मानिला मल्ला और
मानिला तल्ला। मानिला शब्द माँ अनिला का संक्षिप्त स्वरूप है। कुछ वर्ष
पूर्व तक जब उत्तराखंड प्रांत उत्तर प्रदेश का एक भाग था,
यह ग्राम सदियों पुरानी अपनी प्राकृतिक कमनीयता को यथावत बनाये रखे रहा था
परंतु उत्तराखंड के सृजनोपरांत ग्रामों के नगरीकरण की ऐसी होड़ लग गई है कि
मानिला गाँव कुछ कुछ एक मैदानी नगर जैसा लगने लगा है- अहर्निश बढ़ती आबादी,
दिन प्रतिदिन कटते वृक्ष,
ग्राम में पानी की ऊँची टंकियाँ,
सड़कों के किनारे खड़े होते बिजली के खम्भे,
हाथों में मोबाइल और घरों में टी० वी०,
तथा रामनगर से आने वाली मुख्य सड़क पर लगी चार पहियों के वाहनों की कतार
सभी कुछ इस तपोमय भूमि के उच्छृंखल स्वरूप धारण कर लेने की कहानी कह रहे
है। मुख्य सड़क के किनारे स्थित होने के कारण मानिला तल्ला मंदिर अपनी
नैसर्गिक आभा त्यागकर एक मैदानी मंदिर के व्यापारिक स्वरूप को ओढ़ चुका है,
परंतु पर्वत शिखर पर स्थित मानिला मल्ला मंदिर अपनी विशिष्ट स्थिति के कारण
आज भी अपनी प्राकृतिक कमनीयता पूर्ववत सँजोये हुए है। यद्यपि ग्राम मानिला
से इस मंदिर को जाने वाली पहाड़ी पर एक डामर की सड़क बन गई है,
तथापि सड़क के दोनों ओर लगे हुए वृक्षों और झाड़ियों से कोई छेड़छाड़ नहीं
की गई है और वहाँ न तो कोई्र निर्माण कार्य हुआ है और न कोई दूकान खुली है।
मानिला मल्ला मंदिर आज भी पूर्ववत चीड़ और साल के ऊँचे ऊँचे वृक्षों से ढका
हुआ है।
मानिला मल्ला मंदिर के
वयोवृद्ध स्वामी के गोलोकवासी हो जाने के उपरांत भुवनचंद्र वहाँ योगी
स्वरूप में आकर बस गये थे और फिर कुछ समय पश्चात मीता उनकी संगिनी एवं
योगिनी बनकर आ गईं थीं,
तब से मंदिर की ख्याति देश-विदेश में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रही थी।
योगिनी के व्यक्तित्व में अहर्निश निखार आ रहा था और उनकी ख्याति चहुँदिश
प्रस्फुटित हो रही थी। योगिनी का गहन ज्ञान,
ओजस्वी वाणी,
एवं देदीप्यमान व्यक्तित्व बरबस लोगों को इस मंदिर पर खींच लाता था। वर्ष
दो वर्ष में ही सुदूर देशों के लोग मानिला के मंदिर को मानिला की योगिनी के
मंदिर से जानने गे थे।
तभी एक सर्वथा अप्रत्याशित
घटना घट गई थी- जिसने भी सुना,
जिह्वा दाँतों तले दबाकर रह गया था। योगिनी मीता अमेरिका से आये हुए एक
पर्यटक माइक के साथ अमेरिका चली गईं थीं। यद्यपि योगिनी मीता योगी
भुवनचंद्र को बताकर अमेरिका गईं थीं तथापि उनके इस तरह योगी को छोड़कर चले
जाने की घटना ने प्राचीन परम्पराओं वाले ग्राम मानिला में सब की आस्था को
हिलाकर रख दिया था। योगी ने ऊपर से निर्लिप्त बने रहने का दिखावा किया था,
परंतु हेमंत चायवाले ने उन्हें अनेक बार सायं के धुँधलके में वृक्षों के
झुरमुट के पीछे अश्रु पोंछते हुए देखा था। और फिर एक सायं अकस्मात योगिनी
मीता मंदिर में पुनः आ गईं थीं। उनका पुनरागमन ग्रामवासियों में गुप्त
पारस्परिक चर्चा का विषय अवश्य बना था,
परंतु योगी द्वारा योगिनी के प्रति पूर्ववत अपनत्व का भाव प्रदर्शित करने
के कारण कोई प्रकटतः कुछ भी नहीं बोला था।
योगिनी के पुनरागमन की घटना शनैः शनैः पुरानी पड़ने लगी है एवं मानिला
मंदिर की दिनचर्या- प्रातःकाल योगी के ध्यानस्थ अवस्था में साधकों के समक्ष
विराजमान हो जाने पर योगिनी द्वारा साधकों को आसन-प्राणायाम कराना,
अपरान्ह में योगी द्वारा व्याख्यान,
सायंकाल योगी एवं योगिनी द्वारा वनभ्रमण एवं इस दौरान आरती में भाग लेने के
उद्देश्य से मंदिर को आते हुए हेमंत चायवाले द्वारा यदा-कदा उन्हें एकांत
में कबूतर-कबूतरी की भाँति गुटरगूँ करते हुए देख लेना,
आरती के उपरांत भोजन एवं विश्रांति- यथापूर्व हो गई है। यद्यपि प्रकटतः सब
शांत है परंतु योगी के मन की अथाह गहराइयों में यदा-कदा सागर-तल पर
प्रस्फुटित उष्णजल के स्रोत के समान उफान आते रहते हैं। रहीम ने सत्य ही
कहा है,
“रहिमन
धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर न जुड़े और जुड़े गाँठ पर जाय”
योगिनी के माइक के साथ चले
जाने से योगी के मन में गाँठ अवश्य पड़ गई है,
जो उनको मीता के प्रति अपने व्यवहार में सहजता लाने में बाधक बन रही है।
**
सायंवेला है,
मंदिर के अंदर एवं आसपास झुरमुटों में अँधेरा छा रहा है,
परंतु मंदिर की छतरी पर आकाशीय वातावरण से प्रत्यावर्तित होकर पड़ने वाली
रवि-किरणें उसे स्वर्णिम आभा प्रदान कर रहीं है। योगी आरती की थाल में रखे
दिये की बाती को प्रज्वलित कर थाल को हाथों में उठा रहे हैं। योगिनी मीता
एवं भक्तगण प्रणाम मुद्रा ग्रहण कर चुके हैं। फिर एक गोरा व्यक्ति चुपचाप
मीता के पीछे आकर प्रणाम मुद्रा में खड़ा हो जाता है। किसी का ध्यान उसकी ओर
नहीं जाता है क्योंकि आरती प्रारम्भ हो चुकी है एवं भक्तगण नेत्र मूँदकर
शंख-घड़ियाल की कर्णमोदक ध्वनि सुनने एवं योगी के साथ-साथ आरती गाने में
मग्न हैं। आरती समाप्त करने के पूर्व योगी थाल को हाथों में लिये हुए अपने
स्थान पर वृत्ताकार घूमते हैं। अर्धवृत्त पूरा होने पर जैसे ही योगी भक्तगण
के सम्मुख होते हैं,
वह स्तम्भित हो जाते हैं,
उनकी भृकुटि चढ़ जाती है एवं क्रोध के कारण दिये की लौ की प्रतिच्छाया उनकी
भृकुटि पर त्रिनेत्र के समान दमकने लगती है। बड़ी कठिनाई से अपने पर
नियंत्रण कर वह वृत्त को पूरा करते हैं और थाल के दीपक को भक्तों के समक्ष
दीपक से आरती लेने हेतु प्रस्तुत करते हैं। उनकी थाल जब उस गोरे व्यक्ति के
सामने आती है तो वह आरती लेने से पूर्व मुस्कराकर योगी को प्रणाम करता है
जिसका उत्तर योगी अपरिचय की मुद्रा बनाकर देते है,
परंतु इसी बीच योगिनी का ध्यान माइक की ओर आकृष्ट हो जाता है और वह प्रसन्न
होकर आत्मीयता से बोलती है,
‘हलो
माइक‘।
योगी की अपने प्रति प्रतिक्रिया देखकर माइक अप्रकृतिस्थ हो रहा था। यद्यपि
वह मीता को पीछे से देख चुका था परंतु अभी तक उससे बोला नहीं था। मीता के
मुख पर उत्सुकतापूर्णी स्वागत का भाव देखकर वह सहज हो जाता है और मुख एवं
नेत्रों में मुस्कराहट लाकर मीता को
‘हाय‘
कहता है। कुछ अन्य स्थानीय साधक भी माइक को पहिचान लेते हैं और उसकी ओर
देखकर मुस्करा रहे हैं। माइक को देखकर मीता के मुख पर आने वाली प्रसन्नता
की आभा को योगी भाँप लेता है और योगी के मानस में उफनते क्रोध का स्थान
क्षोभ ले लेता है। क्रोधित व्यक्ति के मन में क्षोभ का आधिपत्य हो जाने पर
नेत्र स्वतः अश्रुपूरित होने लगते हैं- योगी अपने अश्रुओं को अनियंत्रित
होते देख आरती का थाल मूर्ति के समक्ष रखकर अपने शयनकक्ष में प्रवेश कर
जाते हैं। माइक एवं मीता सहज भाव से वार्तालाप में लिप्त हो जाते हैं।
भक्तगण अपने अपने घरों को प्रस्थान करते हैं- इनमें हेमंत चायवाला भी ह जो
माइक के आगमन के उपरांत की घटनाएँ देखकर बड़े खट्टे मन से अपने घर की ओर
धीरे धीरे चल देता है।
योगिनी माइक के लिये आश्रम का एक कमरा खुलवा देती है एवं उसके भोजन एवं
सुखसुविधा हेतु निर्देश भी देती है। योगी अपने कमरे में ही रहते हैं,
परंतु उनका ध्यान मीता एवं माइक के बीच होने वाले वार्तालाप एवं उस पर मीता
की प्रतिक्रिया पर केंद्रित रहता है। उनकी छठी इंद्रिय मीता एवं माइक के मन
को भी बाँचने का प्रयत्न कर रही है एवं स्वयं के मन में व्याप्त ईर्ष्या
उसके स्वनिर्मित अर्थ बुन रही है।
उस रात्रि योगी को नींद नहीं आई,
उनकी पलकें यदा-कदा कुछ क्षणों को ही झपकीं। साल के वृक्ष में घोंसला बनाये
हुए उल्लू के बोलने की आवाज भी उन्हें और अधिक अशांत करती रही। ब्राह्मवेला
में योगासन के दौरान योगी की निगाह मीता के नखशिख का अवलोकन करने के बजाय
माइक के नेत्रों से टकरातीं रहीं। रात्रि में मीता को भुवनचंद्र अनमना
अवश्य लगा था और उसने भुवनचंद्र से उसके स्वास्थ्य के विषय में पूछा भी था
परंतु भुवनचंद्र के
‘ठीक
है‘
कहने पर वह यह सोचकर कि सम्भवतः यह माइक के आकस्मिक पुनरागमन की क्षणिक
प्रतिक्रिया होगी,
शांतिमना होकर सो गई थी।
किसी कवि ने सही कहा है,
‘आँखें
ज़ुबाँ नहीं होतीं हैं,
पर बेज़बाँ नहीं होतीं है।‘
योगासन की समाप्ति पर शांतिपाठ के उपरांत सूर्य के प्रकाश में भुवनचंद्र के
नेत्र देखकर मीता को यह समझते देर न लगी थी कि भुवन की चुभन न तो क्षणिक है
और न ऊपरी,
वरन् हृदय के अंतस्तल तक है। माइक के प्रति योगिनी के हृदय में मित्रभाव के
अतिरिक्त कुछ न था,
अतः योगी के नेत्र पढ़कर उसे क्रोध आने लगता है,
पंरतु योगी की मनोदशा पर विचार कर वह स्वयं को शांत कर लेती है,
तथापि एक अंतर्द्वंद्व का अंकुर अवश्य उसके मन में भी प्रस्फुटित होने लगता
है।
छुई मुई के समान व्यक्तित्व के मन का अंतर्द्वंद्व उसकी हताशा एवं अवसाद का
जनक बनता है,
परंतु योगिनी के समान दृढ़मना व्यक्ति के मन का अंतर्द्वंद्व उसमें स्वयं
द्वारा सही समझे जाने वाले मार्ग पर चलते रहने की ज़िद उत्पन्न करता है।
योगिनी ने योगी की प्रतिक्रिया की परवाह किये बिना माइक से पूर्ववत निकटता
का व्यवहार करते रहने का मन बना लिया। अतः सायंकाल माइक ने जब योगिनी से
वनभ्रमण हेतु चलने को कहा,
तो योगिनी ने योगी से पूछे बिना
‘हाँ‘
कर दी। योगी यह वार्तालाप सुन रहा था और मन ही मन कुढ़ रहा था,
अतः चलते समय जब योगिनी ने उससे साथ चलने को कहा तो उसने मना कर दिया। उनको
जाते हुए योगी उनके पृष्ठभाग को देखता रहा- उसके मन में तिरस्कृत किये जाने
का भाव जाग्रत हो रहा था और उसमें उफनते हुए क्षोभ की सीमा नहीं थी।
**
वन का एकांत मिलते ही माइक ने मीता से पूछा, ‘मीता तुम अमेरिका से अकस्मात क्यों चलीं आईं? जिन दिनों तुम लास वेगस गईं हुईं थीं, उन दिनों मैं जापान गया हुआ था। वहाँ से लौटने के बाद फ़ुर्सत मिलने पर जब मैं तुम्हारे होस्टल गया, तब ज्ञात हुआ कि तुम बिना कुछ बताये ही इंडिया वापस चली गई हो। यह सुनकर मरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। अब की बार तो मैं केवल तुम्हारे चुपचाप चले आने का कारण जानने ही यहाँ आया हूँ।‘ फिर कुछ क्षण रुककर खिलंदड़ेपन से एक आँख मिचकाकर आगे बोला,
‘साथ
में तुम्हारे सान्निध्य में कुछ पल और बिता पाने का लालच तो ऐसा था जैसे
गेंहूँ के साथ बथुए को पानी लग जाता है।‘ माइक चुप होकर मीता की ओर देखने लगा, तब मीता व्यंग्यवाण छोड़ती हुई बोली,
‘तुम्हारे
देश का विमेन्स लिबरेशन मूवमेंट क्या किसी को धोखे से नशे की दवा खिलाकर
उसके विवश हो जाने पर विमेन द्वारा उसके शरीर से खिलवाड़ करने की अनुमति
देता है?‘
माइक आश्चर्य से मीता की बात सुन रहा था और उसका भावार्थ समझकर बोला,
‘अरे!
यह तो रेप हुआ?
तुमने पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई?‘
‘लास
वेगस के होटल के कमरे में जब मुझ पर ड्रग का प्रभाव कम हुआ,
तब मेरी शारीरिक एवं मानसिक दशा सामान्य नहीं थी और मुझे इतनी ग्लानि हो
रही थी कि ऐसे में अविलम्ब इंडिया वापस आने के अतिरिक्त कुछ और करने का
विचार ही नहीं आ रहा था।‘
माइक ने वास्तविकता में दुखी होकर कहा,
‘आई
एम रियली सौरी फौर बीइंग इंस्ट्रूमेंटल इन पुटिंग यू इन सच ए ट्रैजिक
सिचुएशन। आई डिड नौट नो दैट दोज विमेन वेयर वूल्व्ज।‘
माइक द्वारा की जा रही क्षमायाचना को देखकर मीता का कोमल हृदय द्रवित हो
गया और उसके हृदय में सूजन एवं शेली के प्रति दहकती प्रतिशोध की ज्वाला कुछ
शांत हो गई। लगभग पूर्णतः सहज होकर उसने माइक से प्रश्न किया,
‘क्या
तुम्हारे देश में प्यार का अर्थ केवल सेक्स ही होता है?‘
माइक इस आरोपयुक्त प्रश्न से कुछ देर के लिये हतप्रभ हो गया,
परंतु शीघ्र ही अपने को सम्हालकर उसने उत्तर दिया,
‘मीता,
यह सच है कि हमारे यहाँ लव शब्द का प्रयोग इतना लूज्ली होने लगा है कि यह
लगभग अर्थहीन रहता है जब तक बाँहों में भरकर होठों पर कामुक चुम्बन लेने
एवं समुचित परिस्थिति हो तो काम-क्रिया में लिप्त होने जैसे विशेषण से इसे
प्रमाणित न किया जावे।
‘सौरी,
माई लव‘,
‘हाय
डार्लिंग‘
‘लव
यू”
जैसी अभिव्यक्तियाँ तो हर किसी के द्वारा किसी भी जाने अनजाने के लिये कर
दी जाती हैं। हो सकता है कि इन अभिव्यक्तियों में छिपे भावबोध की अनुभूति
टीनएजर प्रथम प्रेम के समय करता हो,
परंतु टी. वी.,
सिनेमा,
इंटरनेट एवं समाज में व्याप्त लैंगिक सम्बंधों की स्वच्छंदता ने लव की
परिणति को सेक्स में सीमित कर दिया है। यह भी वास्तविकता है कि वहाँ की
फास्ट-लाइफ में लव भी इतना फास्ट हो गया है कि भारतीय कपुल्स की तरह स्थायी
इमोशनल-बौंडिंग कम ही कर पाता है और एक व्यक्ति के जीवन में अनेक पार्टनर्स
आते रहना सामान्य बात हो गई है। अन्मैरिड ऐडल्ट के लिये तो सेक्स सम्बंधी
कोई बंधन है ही नहीं। मीरा किर्शेनबौम नामक एक सायकोलोजिस्ट ने तो मैरिज के
स्थायित्व के लिये औकेजनल-एक्स्ट्रामैरिटल-ऐफेयर को संजीवनी बूटी की संज्ञा
ही दे डाली है। इन कारणों से किसी को निश्चिंतता नहीं रहती है कि किस दिन
उसकी पत्नी अथवा पति काम से लौटने के बाद उससे कह दे
‘यू
हैव बीन ए गुड हस्बैंड /वाइफ/ टु मी,
बट सौरी डार्लिंग,
आई विल हैव टु लीव यू टुमौरो ऐज आई हैव फौलेन इन लव विद बिल/ मिशेल/,
बट वी शैल कौंटीन्यू टु रिमेन गुड फ्रेंड्स‘।
इस तरह के सम्बंध-विच्छेद का दुष्प्रभाव बच्चों के लालन-पालन एवं चिंतन पर
अवश्य पड़ता है परंतु धीरे-धीरे वे भी समझने लगे हैं कि ऐसा तो होना ही है
और पहले की अपेक्षा अब अधिक शीघ्रता से नई परिस्थितियों एवं स्टेप-पेरेंट्स
को स्वीकार करने लगे हैं। परंतु हमारा समाज एवं हमारा कानून प्रत्येक
व्यक्ति के व्यक्तित्व की महत्ता एवं स्वतंत्रता को बहुत सम्मान देता है और
किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उससे किसी प्रकार के शारीरिक सम्बंध स्थापित
करने पर घोर दंड देता है।‘
मीता बड़े ध्यान से माइक को सुन रही थी और माइक के चुप होते ही बोल पड़ी,
‘प्लेटोनिक
लव के विषय में आप का क्या विचार हैं?’
‘मैं
बचपन से लिटरेचर में इंटेरेस्टेड रहा हूँ और प्लेटोनिक लव पर कितने नौविल,
कहानियाँ एवं काव्यग्रंथ मैे पढ़े हैं। अः मैं जानता हूँ कि प्लेटोनिक लव
का न केवल अस्तित्व है,
वरन् अधिकतर व्यक्तियों का प्रेम प्लेटोनिक लव से ही प्रारम्भ होता है।
पश्चिमी समाज में भी भूतकाल में सामाजिक बंधनों के कारण अनेक प्रेम सम्बंध
प्लेटोनिक लव तक ही सीमित रह जाते थे। उन दिनों सम्बंधों के स्थायित्व का
बड़ा महत्व था,
अतः लोग प्लेटोनिक लव मात्र की सुखानुभूति एवं तद्जनित वियोगानुभूति में
जीवन बिता देते थे। कतिपय प्रकरणों में यह वियोगानुभूति असह्य भी हो जाती
थी,
परंतु अपनी प्रेमिका /प्रेमी/ के मान-सम्मान का ध्यान रखकर लोग इसे प्रकट
नहीं होने देते थे। अब हमारे समाज का दर्शन है कि मुझे जो जीवन मिला है,
वह अधिक से अधिक सुख प्राप्त करने हेतु है। अतः प्लेटोनिक लव या तो शीघ्र
ही स्पर्श-सुख में परिवर्तित हो जाता है और यदि किसी कारणवश ऐसा सम्भव नहीं
हो पाता है,
तो लोग नवीन सम्बंध स्थापित कर उसकी प्राप्ति अन्यत्र करने लगते हैं। यह
कहना सचमुच कठिन है कि इस विषय में हमारे पूर्वज अधिक सही थे अथवा हम सही
हैं। इसमें कोई संदेह नहीं हे कि सुखानुभूति के पीछे दौड़ना प्रकृति द्वारा
प्रदत्त मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है। मेरी समझ में यदि ऐसा करने से कोई
अन्य व्यक्ति हर्ट न होता हो,
तो इसमें कोई हानि भी नहीं है।‘
‘पर
सेक्स सुख हेतु भिन्न भिन्न पार्टनर्स केा बदलते रहने का परिणाम स्वयं एवं
पार्टनर हेतु भी तो दुखदायी हो सकता है?‘
मीता प्रश्नवाचक दृष्टि से माइक को देखती हुई बोली।
‘बिल्कुल
सही है। ऐेसे उदाहरण हमारे यहाँ भी प्रायः सुनने में आते रहते हैं।‘
माइक ने सहमति जताई।
‘अँधेरा
हो रहा है। अब वापस चलें।‘
मीता ने कहा और दोनों मंदिर की ओर लौट पड़े।
वापसी में दोनों शांत रहे। दोनों में से किसी को यह पता नहीं चला कि योगी
कहीं दूर से छिपकर उनके खुले पारस्परिक व्यवहार को देख रहा था और उनकी
बातों को आधा-अधूरा सुन भी रहा था। कहते हैं कि
‘भय
का भूत बन जाता है‘-
सो योगी जो भी सुन पा रहा था,
उसका अर्थ मीता और माइक में प्रेमालाप होना लगा रहा था। उसकी उद्विग्नता
चरम सीमा पर पहुँच रही थी।
**
रात्रि के दो पहर बीत चुके हैं। मंदिर के अंदर एवं बाहर अँधकारमय शांति छाई
हुई है- निशिदिवस बहने वाली बयार भी आज शांत है,
बस साल के वृक्ष की खोह में बसेरा बनाये हुए उलूक की
‘घू....
घू.....‘
की आवाज यदाकदा इस नीरवता को भंग कर देती है। मीता भी निश्चिंतता से गहन
निद्रा में सो रही है। इसके विपरीत उसके बगल में लेटे योगी के मन में एक
झंझावात उठा हुआ है। बेचैनी के सहन की सीमा के पार हो जाने पर योगी निशब्द
पलंग से उठता है और कमरे से बाहर आकर हाल में विराजमान भगवत-मूर्ति के
समक्ष जलते दीपक के प्रकाश में निम्नलिखित पत्र लिखने लगता हैः
मीता! /प्रिये से सम्बोधित करने का अधिकार खो चुका हूँ,
अतः केवल मीता ही/
तुम जब अमेरिका से लौट आईं थीं,
तब से तुमने कभी अकस्मात वहाँ चले जाने और फिर वापस आ जाने का कारण मुझे
बताने की आवश्यकता नहीं समझी। इससे मुझे स्पष्ट हो गया था कि तुम्हारे जीवन
में मेरा महत्व पहले जैसा नहीं रह गया है,
परंतु तुम्हारे आत्मीयता के प्रदर्शन से मैं अपने मन को
आश्वस्त कर लेता था कि तुम आकर्षण के एक झोंके में बहकर वहाँ चली गई
होगी,
एवं तद्जनित आत्मग्लानि के कारण उस विषय पर बात नहीं करना चाहती होगी।
परंतु कल माइक के पुनरागमन पर तुम्हारे मुख पर उतर आये उत्फुल्लता के
अतिरेक ने मुझे अपने मन को समझाने के लिये स्वयं को दिये जाने वाले आश्वासन
की सच्चाई के सम्बंध में आशंकित कर दिया है। आज सायं वनभ्रमण के दौरान माइक
से तुम्हारी आत्मीयता एवं उसके प्रति उफनते प्रेम को देखकर मरे मन में शंका
का कोई कारण नहीं बचा है और तुम्हारे जीवन में अपनी स्थिति की वास्तविकता
का स्पष्ट ज्ञान हो गया है /क्षमा करना सायंकाल तुम्हारे एवं माइक के
वन-भ्रमण के दौरान मैं तुम लोगों को छिपकर देख रहा था और यथासम्भव तुम्हारे
बीच की बातें भी सुन रहा था/।
मैं आज रात ही आश्रम छोड़ कर जा रहा हूँ - कहाँ एवं कब तक के लिये?
यह भविष्य के गर्भ में है। जब तक तुम जागोगी मैं दूर निकल चुका होऊँगा।
ईश्वर तुम्हें सुखी रखे।............भुवन‘
ब्राह्मवेला में आँख खुलने पर मीता ने योगी को इधर उधर पुकारा और न दिखाई्र
देने पर भगवतमूर्ति के पैरों पर दृष्टि पड़ने पर योगी द्वारा छोड़ा गया यह
पत्र पाया। इसे पढ़कर मीता के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। योगी ही तो
उसका सब कुछ था एवं अमेरिका से लौटने के उपरांत तो अपनी भूल का भान कर वह
सदैव अपने को योगीमय बनाने का प्रयत्न करती रही थी। योगी के उसे छोड़कर चले
जाने की बात जैसे-जैसे उसके मन में उतर रही थी,
वैसे वैसे उसके नेत्र अश्रुप्लावित हो रहे थे। योगी के मन को सही सही भाँप
पाने की अपनी अक्षमता पर वह अचम्भित भी थी।
तभी मंदिर के एक अनुचर ने आकर बताया कि साधकगण आ चुके हैं एवं आप दोनों के
आगमन हेतु प्रतीक्षारत हैं। मीता किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही थी,
परंतु अपने को संयत कर बोली,
‘साधकों
से कह दो कि आज प्राणायाम नहीं होगा। ऐसा लगता है कि योगी जी रात्रि में
घोर तप हेतु हिमालय की ओर कहीं चले गये हैं। यह उनके स्वास्थ्य के
दृष्टिकोण से वांछनीय नहीं है। यदि किसी ने कहीं देखा हो तो बतायें। अन्यथा
बस स्टेंड,
आस पास के गाँवों एवं अन्य सम्भावित स्थानों से पता लगायें कि वहाँ किसी ने
उन्हें देखा तो नहीं है।‘
अनुचर आश्चर्य से योगिनी की ओर देख रहा था,
परंतु तभी परिस्थिति की गम्भीरता पर विचार कर मीता द्वारा बताई हुई बात
साधकों को बताने चला गया। अनेक साधकों के मुँह से अनायास निकल पड़ा,
‘योगी
जी ने कभी ऐसा कुछ भी तो इंगित नहीं किया था और उनके व्यवहार से भी ऐसा
अनुमान नहीं लगता था।‘
योगी के अप्रत्याशित रूप से चले जाने पर सभी हतप्रभ थे। फिर बिना विलम्ब
किये योगी का पता लगाने का प्रयत्न करने के उद्देश्य से वे वहाँ से चले
गये। माइक अंदर आकर मीता से योगी के विषय में पूछने लगा कि वह कब सोये थे
और उस समय योगी किस प्रकार की मनःथिति में था। मीता ने कहा कि परसों सायं
से कुछ अन्यमनस्क तो दिखाई दे रहे थे परंतु उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही
थी जिससे किसी गहरे अंतर्द्वंद्व का आभास हो। माइक को योगी का अपने प्रति
व्यवहार प्रारम्भ से ही तिरस्कारपूर्ण लग रहा था और वह योगी के समक्ष असहज
भी हो जाता था। वह समझ गया कि हो न हो योगी के पलायन का कारण वही ह। उसने
मीता से स्पष्ट कहा,
‘मुझे
लगता है कि योगी को मेरा यहाँ आना अच्छा नहीं लगा है। ऐसी स्थिति में वह
मेरे यहाँ रहते हुए लौटेगा भी नहीं। अतः मैं आज ही यहाँ से चला जाऊँगा।‘
मीता को माइक की बातों में छिपी वास्तविकता समझ में आ रही थी और वह केवल
इतना बोली,
‘आई
एम सौरी दैट यू हैव टु लीव सो सून।‘
माइक जल्दी-जल्दी अपना सामान इकट्ठा कर मीता से विदा लेकर अल्मोड़ा की बस
पकड़ने के लिये बस स्टेंड चला आया।
मीता अपने अकेलेपन में फूट-फूट कर रो पड़ी- उसे आशंका लग रही थी कि भुवन जिस
अवसाद की मनःस्थिति में गया है,
उसमें पता नहीं वह क्या कर बैठे और यह भी सम्भव है कि आहत-अहम् के वशीभूत
हो कभी भी वापस न आये। |
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