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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


‘समाजवाद’ का एक कैदी

 मैँ मुकेश दीक्षित, ‘समाजवाद’ का एक कैदी हूँ।

मैँ फतेहगढ़ की ज़िला जेल की उस बैरक में बंद हूँ जिसमें केवल गम्भीर अपराधी रखे गये हैं। बिचारे जेलर मुझे साधारण कैदियों के साथ रखने का दुस्साहस कर भी कैसे सकते हैं? थाना कायमगंज के ‘समाजवादी’ इंस्पेक्टर ने मुझे हत्या के इरादे से अपहरण करने एवं अवैध हथियार रखने जैसे जघन्य अपराधोँ में जो बंदी बनाया है। मैँ बी.एस.सी., बी.एड., एल.एल.बी. पास हूँ, और सहित्यिक गोष्ठियाँ आयोजित करता रहता हूँ। कभी किसी अपराध से दूर-दूर तक सम्बंधित नहीं रहा हूँ और एक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक, जो एक साहित्यकार हैं, से मेरी अच्छी जान-पहिचान है। थाने में मेरे द्वारा ये बातेँ बताने पर ‘समाजवादी’ इंस्पेक्टर ने मुझ पर ‘विशेष कृपा’ करते हुए मेरा मोबाइल छीनकर गाली देते हुए मुझे कुछ अतिरिक्त बेंत रसीद कर दिये थे। यद्यपि मैँ चाँदी की चम्मच मुँह में दबाकर पैदा नहीं हुआ था, परंतु जहाँ तक मुझे स्मरण है मुझे कभी रेंगते कीड़ों-मकोड़ों के बीच धरती पर सोने का पूर्व अनुभव नहीं रहा है, परंतु ‘समाजवादी’ न्याय व्यवस्था के भोगस्वरूप अब दिन में लू के थपेड़े सहते और रात में उमस भरी गर्मी मे पसीना पोंछते और मच्छर उड़ाते हुए ज़मीन पर सोने की ऐसी आदत पड़ गई है कि सोच नहीं पाता हूँ कि ‘रिहाई मिलेगी, तो कैसे सो पायेंगे’।

मेरे प्रदेश में समाजवादी शासन है, जिसका पुलिस विभाग के संदर्भ में बड़ा अद्वैत अर्थ है - जहाँ तक और जिस प्रकार हो सके, केवल ‘समाजवादी’ जाति के इंस्पेक्टर/सब-इंस्पेक्टर/एस.पी. को थाने/ज़िले का प्रभारी बनाया जाय, जिससे वे ‘समाजवादी’ जाति के अपराधियों को प्रश्रय देते रहें और चुनाव में ‘समाजवादी’ नेताओं को जिताने के लिये सभी नियमों/कानूनों को तोड़ने में किसी प्रकार की आत्मग्लानि न महसूस करें। मैँ किसी वाद अथवा दल से सम्बंधित नहीं हूँ, परंतु मेरे उपनाम का जातिसूचक शब्द मुझे ‘समाजवाद’ का प्राकृतिक शिकार होने की घोषणा करता रहता है।

उस दुर्दिन मैँ थाना कायमगंज, जनपद फतेहगढ़ अपने जीजा के यहाँ गया हुआ था और उनसे सम्बंधित तीन अन्य व्यक्तियों के साथ गंगा किनारे स्नानोपरांत खड़ा हुआ था। तभी जीजा से भूमि सम्बंधी दुश्मनी रखने वाले परिवार के दो व्यक्ति वहाँ आ गये। उन्होंने कुछ कहा और दोनों पक्षोँ में पहले विवाद और फिर हाथापाई प्रारम्भ हो गई। दूसरे पक्ष के एक व्यक्ति ने कट्टा निकाल लिया, जिसे फायर करने से पहले हम लोगोँ ने पकड़ लिया। तब उसका साथी भाग गया। मुझे न तो यह ज्ञात था कि उन दोनों व्यक्तियों पर ‘समाजवाद’ का वरद हस्त है, और न ‘समाजवादी-न्यायिक-व्यवस्था’ का भलीभाँति ज्ञान था। अतः मैंने पुलिस कंट्रोल रूम एवं थाना कायमगंज को फोन पर घटना की सूचना देने की अक्षम्य भूल कर दी। चौकी प्रभारी सब-इंस्पेक्टर आये, हमारी बात सुनी और हम सबसे थाना कायमगंज चलने को कहा। हमारे थाने में पहुंचने पर वहाँ ‘समाजवादी’ इंस्पेक्टर के पास समाजवादी नेता का फोन आ गया, और शुरू हो गई हमारी ओर के लोगोँ की पिटाई। इस बीच वहाँ के सी.ओ. साहब भी आ गये, जिनसे चौकी के सब-इंस्पेक्टर ने कहा भी कि मुकेश दीक्षित बाहर का है और इसी ने फोन पर पुलिस को सूचना दी थी, परंतु सी.ओ. साहब भी ‘समाजवादी’ निकले। वह बड़ी ‘समझदारी’ का परिचय देते हुए बोले, “अब जब मुकेश की पिटाई कर उसके शरीर पर इतने निशान बना दिये हैं और यह सेवानिवृत डी.जी.पी. से अपनी जान-पहिचान भी बताता है, तो क्या इसे छोड़कर अपनी गर्दन फंसानी है।”

हमारे विरुद्ध और मसाले की जुगाड़ करने के लिये सब-इंस्पेक्टर को पुनः गाँव जाकर घरों में दबिश देने को भेजा गया, और पुलिस ने ‘वांछित’ कारगुज़ारी दिखाते हुए तीन और अवैध हथियार बरामद कर लिये। फिर इन तीन हथियारों एवं हमारे पक्ष के लोगों द्वारा पकड़े गये व्यक्ति से बरामद कट्टे को एक-एक करके हम चारों के पास से बरामद होना दिखाकर हम पर अवैध शस्त्र रखने एवं उस व्यक्ति की हत्या के उद्देश्य से उसका अपहरण करने का आरोप जड़ दिया गया। तब मेरी समझ में आया कि यदि निर्दोष को फंसाने का कार्य करना हो तो ‘समाजवादी’ पुलिस का कोई सानी नहीं है। हम चारों की रात ‘समाजवाद’ का ‘गुणगान’ करते हुए थाने की हवालात में बीती – वहाँ हमने अनुभव किया कि पुलिस की हवालात के मच्छर भी उनसे कम रक्तपिपासु नहीं होते हैं।

अगले दिन हमें न्यायिक हिरासत में जेल का कैदी बना दिया गया, जो हमारी न्यायिक व्यवस्था के दांव-पेंचों के कारण धीरे-धीरे मेरा स्थायी निवास बनता जा रहा है। मेरे वकील ने ज़मानत का प्रार्थना-पत्र प्रारम्भ में ही लगा दिया था और मेरे सहित वह आश्वस्त था कि हत्या हेतु अपहरण की घटना का दूर-दूर तक कोई आधार न होने के कारण और मेरे द्वारा पुलिस को किये गये टेलीफोनों का रिकार्ड प्रस्तुत करने पर मिनटोँ में मेरी ज़मानत हो जायेगी, परंतु हमें व्यवस्था के खेल का अनुमान नहीं था। यद्यपि ज़िला जज ने मेरे ज़मानत के प्रार्थना पत्र पर विचार हेतु तिथि शीघ्र निश्चित कर दी थी, परंतु उससे पूर्व उनका स्थानांतरण हो गया। फिर सभी वकील अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गये और हमारे वकील ने ज़मानत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने से मना कर दिया। अतः मैंने जेल से ज़िला जज के कार्यालय में प्रार्थना पत्र भेजा कि बिना वकील के मेरी बात मुझसे ही सुनकर ज़मानत पर निर्णय ले लिया जाये।

इस बीच मेरे परिचित सेवा-निवृत डी.जी. पुलिस ने वर्तमान डी.जी. पुलिस से तथ्यों की जांच का अनुरोध किया और उनके निर्देश पर पब्लिक-ग्रीवांसेज़ सेल ने जांचकर रिपोर्ट दी कि हत्या के लिये अपहरण का कोई अपराध घटित ही नहीं हुआ और मेरे कब्ज़े से कोई अवैध हथियार बरामद नहीं हुआ था। दोनों आरोप राजनैतिक प्रभाव में लगाये गये हैं। डी.जी.पी. महोदय ने इस रिपोर्ट को एस.पी., फतेहगढ़ को इस निर्देश के साथ भेज दिया कि जांच के निष्कर्ष के अनुसार आगे विवेचना की जाये। एस.पी. ने विवेचना तो थाना कायमगंज से जनपदीय क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित कर दी परंतु न तो डी.जी.पी. ने और न उन्होंने थाना कायमगंज की ‘समाजवादी’ पुलिस के विरुद्ध मेरी अनुचित गिरफ्तारी के अपराध में कोई कार्यवाही की। नये विवेचनाधिकारी से मेरे एक हितैषी द्वारा बात करने पर उन्होंने बताया कि सम्बंधित समाजवादी नेता इस बीच एस.पी. को धमका गये हैं कि न तो किसी पुलिसजन के विरुद्ध कोई कार्यवाही होगी और न मेरे विरुद्ध फाइनल रिपोर्ट लगायी जायेगी। तदनुसार नये विवेचक ने मेरे एवं अन्य सभी के विरुद्ध दो आरोप-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर दिये - एक अवैध शस्त्र हमारे कब्ज़े से बरामद होने का और दूसरे वास्तव में कट्टा के साथ पकड़े गये व्यक्ति को गलत ढंग से रोके रखने, धमकाने और पीटने आदि का आरोप लगाकर। ‘हत्या के लिये अपहरण’ का.‘समाजवादी’ इंस्पेक्टर द्वारा लगाया गया आरोप इतना बेबुनियाद था कि ‘समाजवादी’ नेता की धमकी के बावजूद विवेचक उसकी पुष्टि करने में असमर्थ रहा। डी.जी.पी. के मुख्यालय की जांच रिपोर्ट एवं उनके आदेश को ‘समाजवादी’ पुलिसजनों ने रद्दी की टोकरी में फेँके जाने योग्य ही समझा।

नये ज़िला जज आये और अपनी बात कहने हेतु मुझे उपस्थित होने का आदेश भी दिया। परंतु मेरे पहुँचने पर उन्हें ज्ञात हो गया था कि विवेचक ने ‘हत्या के उद्देश्य से अपहरण’ के आरोप के बजाय साधारण धाराओं में ही चार्ज-शीट लगा दी है, अतः उन्होने स्वयं मुझे न सुनकर प्रकरण को सी.जे.एम. को प्रेषित कर दिया। तभी सी.जे.एम. महोदय लम्बे अवकाश पर चले गये। जेल से मैंने एक प्रार्थना-पत्र इस आशय से भेजा कि प्रभारी सी.जे.एम. मेरी बात सुन लेँ,परंतु सी.जे.एम. के लम्बी छुट्टी से लौटने के उपरांत ही मुझे बुलाया गया।

अब मैँ ज़मानत हेतु बड़ी रकम की जुगाड़ कर रहा हूँ।

यहाँ मुझे यह ज्ञान भी हो गया है कि मैँ मुकेश दीक्षित ‘समाजवाद’ का एक सामान्य कैदी हूँ, क्योंकि मेरे जैसे कुछ अन्य ‘समाजवाद के कैदी’ मेरे साथ इसी जेल में बंद हैं।


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