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| 11.27.2007 |
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निउट्टू भैया महेश चन्द्र द्विवेदी |
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एक आदमी के सात बेटे थे जिनमें सातवाँ नेवला था। जब सब बेटे बड़े हो गये तो उसने कहा, “अब तुम लोग कहीं जाकर नौकरी करो और पैसे कमाकर लाओ।” जब छः बड़े भाई चलने लगे तो निउट्टू बोला, “हमऊँ संग चलययैं।” इस पर बड़े भाई बोले, “धत! तू वहाँ जाकर क्या करेगा।” नेवले ने कोई जवाब नहीं दिया पर चुपचाप छिपते हुए उनके पीछे पीछे चल दिया। दोपहर होने पर सब भाइयों को भूख लगी और तभी एक बेर का पेड़ दिखाई दिया। इस पर छठा भाई बोला, “अगर निउट्टू को साथ लाये होते, तो बेर के पेड़ पर चढ़कर बेर खिला देता।” नेवला पीछे छिपकर बात सुन रहा था और बोल पड़ा,”भैया! हम तौ संगईं लगे हैं।” सब भाई उसे देखकर प्रसन्न हो गये और बोले, ”फिर देरी क्या है? जल्दी से पेड़ पर चढ़ जाओ और बेर खिलाओ।” नेवला चढ़ गया और ऊपर जाकर बेर खाने और नीचे गिराने लगा। पर नेवला बड़ा चालाक होता है और वह बढ़िया पके बेर तो खुद खाता था और कम पके नीचे गिराता था। तब बड़े भाई ने नीचे से डाँटा, “निउट्टू सारे जू का कर रहो है? पके पके बेर गिरा।” तब नेवला अपना पेट भर जाने पर पके बेर गिराने लगा। खापीकर सब भाई आगे चल दिये और फिर एक शहर में जाकर पहुँचे। वहाँ सब भाई जब नौकरी ढूँढने गये तो बड़े छः भाइयों को तो दूकान पर या घरों में नौकरी मिल गई पर नेवला को किसी ने नहीं रखा। तब नेवला एक धोबी के यहाँ गया और कहा, ”मुझे नौकरी पर रख लो। मैं तुम्हारे गधे जो पीठ पर धुलाई के कपड़े लाद कर जाते हैं, उनकी रखवाली करूँगा और उन्हें इधर उधर नहीं जाने दूँगा।” धोबी ने कहा, “तुम कहते हो तो मैं तुम्हें रखे तो लेता हूँ, लेकिन खाना पीना के अलावा कोई वेतन नहीं दूँगा।” नेवला को यह बात अच्छी तो नहीं लगी पर मजबूरी में उसने कह दिया ,”ठीक है, मुझे मंजूर है।”
धीरे धीरे
एक साल बीत गया और सब भाइयों ने घर वापस जाने का सोचा। छः बड़े भाइयों
को तो उनका वेतन मिल गया था पर नेवले को धोबी ने साल भर काम का कुछ भी
नहीं दिया था,
इसलिये शहर छोड़ने के दिन जब धोबी बाहर गया हुआ था तो उसने धोबी द्वारा
जमीन में गाड़े हुए सारे सिक्के खोद डाले और उन्हें आटे में सानकर लंगड़ी
गदहिया को खिला दिया। जब वह चलने लगा तो धोबी से कहा,
”मैंने
इतने दिन काम किया है,
मुझे अपनी लंगड़ी गदहिया ही दे दो।”
धोबी उस लंगड़ी गदहिया से खुद परेशान था क्योंकि वह कपड़े ढो नहीं पाती
थी। अतः खुश होकर बोला,
“जरूर
ले जाओ।”
घर
पहुँचकर सब भाइयों ने अपने द्वारा कमाये पैसे माँ-बाप को दिये पर नेवले
ने कुछ नहीं दिया। लेकिन वह बोला,
”कथा
कराओ,
फिर बताऊँगा।”
कथा पूरी होने के बाद नेवले ने पिता से कहा,
”बताओ
छर्र करें या भर्र।”
पिता ने कहा,
”धत,
भर्र क्या करेगा,
छर्र कर।”
तब
नेवले ने गदैहिया की पीठ पर एक डंडा मारा और गदैहिया ने छर्र करते हुए
उसे खिलाये गये सभी सिक्के निकाल दिये। सिक्के सोने चाँदी के थे
जिन्हें पाकर उसके माता पिता धनी हो गये और मजे में रहने लगे।
कहानी खतम
पैसा हजम।
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