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06.03.2012


मेरे हमसफ़र सेनमोशाय

रेलयात्रा की कल्पना से अभी भी मेरा मन स्वप्नलोक में विचरण करने लगता है। बचपन में सुदूर ग्राम में स्थित अपने घर की छत से चार-पाँच मील की दूरी पर गुजरने वाली रेलगाड़ी की झलक एवं उसकी सीटी की ध्वनि से मुझे रोमांच होने लगता था। कालेज स्तर पर पहुँचने पर तत्कालीन थर्ड क्लास के डिब्बे में यात्रा करते समय मैं घंटों गेट पर लगी रेलिंग पकड़कर पीछे भागते हुये क्षितिज, खेत और वृक्षों को देखा करता था। पुलिस सेवा में आने पर जब यदा कदा फर्स्ट क्लास में यात्रा का सौभाग्य प्राप्त होने लगा तो रेल यात्रा के आकर्षण के नये नये आयाम अनुभूत हुये- विशेषतः कूपे में अकेले अथवा पत्नी के साथ यात्रा का आनंद तो सर्वथा अनोखा प्रतीत हुआ। ऐसी यात्रा में आभास होता है कि सम्पूर्ण संसार हमारे लिये ही सृजित किया गया है और हम जो चाहें करने के लिये स्वच्छंद हैं- बैठना चाहें तो चाहे सीट पर बैठें चाहे फर्श पर, खड़े रहना चाहें तो चाहे पैरों पर खड़े रहें या सिर पर, और सोना चाहें तो चाहे ऊपर की बर्थ पर अकेले लेटें अथवा नीचे की बर्थ पर दुकेले। रात में कितनी भी देर तक बत्ती जलाने अथवा जब चाहे बुझा देने के लिये किसी से अनुमति माँगने की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं। आपसी बातचीत के दौरान आप निःसंकोच पत्नी की बात काटकर उन्हें झिड़क सकते हैं और बिना किसी से मुँह छिपाये वह आपसे चिढ़कर दूर बैठ सकतीं है; और फिर जब आप अपने झिड़कने के स्वभाव और वह अपने चिढ़ने के स्वभाव पर नियंत्रण पा चुकें, तो बिना यह सोचे कि ‘कोई क्या कहेगा’ आप दोनों पुनः ऐसे घुलमिल सकते हैं जैसे अभी तक एक दूसरे को ह्यूमर/प्रसन्न करने की चेष्टा/ करते रहे हों। बायोलौजी का एक सिद्धांत है कि आयु और पेट की गैस समानुपाती होते हैं और यदि आप दोनों आयु के हिसाब से वाणप्रस्थ अथवा सन्यास प्राप्त कर चुके हैं, तो एकाकी कम्पार्टमेंट में आवश्यकता पड़ने पर बिना पेट दबाये अथवा बिना किसी से नज़र चुराये गैसोत्सरण का निर्बाध आह्लाद प्राप्त कर सकते हैं।

पर लगता है कि उस दिन दिल्ली से अहमदाबाद जाते हुये हमे ए.सी. कोच में किनारे का कूपेनुमा केबिन केवल इसलिये मिला था कि हम पार्श्व से सेन मोशाय की अनवरत वार्ता का श्रवण सुख प्राप्त कर सकें। उन्होने मेरे बगल के केबिन में पदार्पपण करते ही अपने तीन सहयात्रियों से एकपक्षीय वार्ता ऐसे प्रारम्भ कर दी थी जैसे बरसों से बिछुड़े मित्र अकस्मात मिल गये हों। उनकी संकोचहीनता के फलस्वरूप अन्य तीनों यात्री भी उनकी बातचीत में सम्मिलित होने को उद्यत हो गये थे और बीच बीच में जब कभी सेन मोशाय साँस लेने भर को चुप होते थे तो उस अंतराल में वह अपनी बात शीघ्रता से ऐसे ठोंक देते थे जैसे लकड़ी के पटरों को जोड़ने के लिये बढ़ई कील ठोंक देता है। जब तक यह कील ठुक पाती, सेन मोशाय की जिह्वा पुनः निर्विघ्न शब्दों के गुच्छे हवा में उछालने लगती। सेन मोशाय ने वार्ता का प्रारम्भ तो हम भारतीयों के देश की स्खलित राजनीति एवं बढ़ते भ्रष्टाचार पर नपुंसक चिंता जताने के राष्ट्रीय पास्ट-टाइम/समय-बितावन/से ही किया था, परंतु फिर वह मँजे घुड़सवार की भांति बातचीत की दिशा गेाघरा कांड और गुजरात के दंगों की ओर मोड़ ले गये थे और उनका वर्णन ऐसे सुनाने लगे थे जैसे संजय महाभारत का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हों।

सेन मोशाय उवाच, “आप को मालूम है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के उस डिब्बे में, जो बाद में मुसलमानों द्वारा जला दिया गया था, दो मुसलमान युवक पहले से चढ़ गये थे और हिन्दू औरतों को पकड़कर बाहर खींच रहे थे। यात्रियों ने उन्हें पकड़ लिया था तब मुसलमानों द्वारा डिब्बे में आग लगा देने के कारण वे भी सभी यात्रियों के साथ जल गये थे।”

इस पर बंधक बने श्रोताओं में से एक ने क्षीण प्रतिरोध किया था, “यह बात तो किसी समाचार पत्र में नहीं छपी थी।”

तब सेन मोशाय उसके अल्पज्ञान पर उसे झिड़कते हुये बोल पड़े थे, “आप क्या जानें? आपने आफीशियल जाँच रिपोर्ट पढ़ी भी है?”

साहस बटोर कर वह यात्री मिमियाता सा बोला था, “पर अभी तक तो कोई आफीशियल जाँच रिपोर्ट आई ही नहीं है।”

“आप को क्या मालूम? मैं रिटायर्ड आई.ए.एस. अधिकारी हूँ- मैं यह सब जानता हूँ। मैंने अपने सेवाकाल में पोलिटिशियन्स को हमेशा अपने ठेंगें पर रखा है। उनको आता ही क्या है? शासन तो मैं चलाता था।” सेन मोशाय धौंसियाते हुये बोले थे।

अब सम्पूर्ण वार्तालाप पर सेन मोशाय का एकछत्र अधिकार हो चुका था। वह कृष्ण के समान निर्बाध चीर को बढ़ाते जा रहे थे और तीनों श्रोतागण दौपदी के समान आर्तभाव से उन्हें निहार रहे थे। यदि सेन मोशाय को लगता कि उनके द्वारा साँस लेने हेतु लिये गये अंशविराम के दौरान कोई श्रोता उनकी बात पर संशय की कील ठोंकने का प्रयत्न कर रहा है तो वह बड़ी सफाई से बात की दिशा बदल देते थे। इस प्रकार बात की दिशा बदलते बदलते वह बातों बातों में ही अपने पुत्रों, पुत्रियों, पौत्रों, पौत्रियों, पुत्रवधुओं, एवं उनकी संतानों की शिक्षा दीक्षा, विवाह, नौकरी, कार, बंगला आदि के विषय में ऐसे बताते गये जैसे अन्य यात्री यही जानकारी प्राप्त करने हेतु रेलगाड़ी की यात्रा कर रहे हों । छोटे बेटे का ज़िक्र करते हुये वह सगर्व बोले थे,

“मेरा छोटा बेटा शौ वैलेस में मैनेजर है। आप जानते हैं शौ वैलेस क्या है? यह एक कम्पनी है जो भारत की सबसे बढ़िया शराब बनाती है। वैसे मेरे बड़े बेटे की बहू को भी वाइन बनाने का शौक है। वह घर में रोज वाइन बनाती है। उसकी माँ भी फर्स्ट क्लास वाइन बनाती थी।”

यह सुनकर मेरे मन में विचार आया था कि अच्छा है कि मैं पुलिस से सेवानिवृत हो चुका हूँ, नहीं तो अपने समक्ष अपराध की संस्वीकृति किये जाने के बाद भी कानूनी कार्यवाही न करने का अपराध-बोध सहना पड़ता।

 फिर मुझे लगा कि उन्होंने बोतल निकाली होगी क्योंकि वह बोले थे, “यह बोतल मेरा छोटा बेटा हाल में मुझे दे गया था। मैं इसमे से रोज पीता हूँ। आज भी पियूँगा। मैं आपसे डरता थोड़े ही हूँ; मैं तो आप सबके गार्जियन की तरह हूँ।”

फिर वह व्हिस्की पीने लगे होंगें क्योंकि उनकी जुबान पर व्हिस्की सवारी गाँठती जा रही थी। जयपुर में गाड़ी रुकते ही वह एक सहयात्री से बोल थे, “व्हिस्की में मिलाने को पानी खत्म हो गया है। जाओ देखो कि पानी कहाँ है।”

व सहयातरी उनका लिहाज कर उठ गया और कुछ देर में लौट कर बोला था, “प्लेटफार्म पर पास में कहीं पानी नहीं है।”

लगभग दो मिनट बाद सेन साहब की कड़क आवाज फिर सुनाई दी, “मैंने कहा न कि पानी ले आओ । तुम अभी तक पानी नहीं लाये?”

कभी कभी पिटते पिटते गधा भी दुलत्ती मारने लगता है- उस सहयात्री का क्रोधपूर्ण स्वर सुनाई दिया था, “मिस्टर सेन! आइ ऐम योर कोपैसेंजर, नौट योर सर्वेंट।”

यह सुनना था कि सेन मोशाय जैसे आसमान से धरती पर आ गिरे हों और उनका मिमियाता स्वर सुनाई दिया, “सौरी, आई ऐपोलोजाइज। सौरी आई ऐपोलोजाइज।..... नाउ आई विल नौट अटर ए वर्ड....नाउ आई विल नौट..................”

और ये शब्द वह तब तक बोलते रहे जब तक हमारे कान पक नहीं गये, और उनकी पलकें झपक नहीं गईं।


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