अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
06.03.2012


हिंदुस्तान अगर आज़ाद न हुआ होता

हिंदुस्तान अगर आज़ाद न हुआ होता,
तो आज इस देश का क्या हुआ होता?
रुढ़ियों का शिकंजा जकड़ता ही जाता,
ज्ञान का दीपक पूरा बुझ गया होता।

अनपढ़ों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती रहती,
कहीं कोई-नया विद्यालय न खुला होता।
पंडित, पुरोहित और ओझा गाँव गाँव होते,
अंधविश्वासों का नया रंग जम गया होता।

सब निर्धनों, निर्बलों की दशा यथावत रहती,
हर गरीब, जमींदार के आसरे जी रहा होता।
गाँव की गलियों में नाली व खरंजे न होते,
घर घर मे गंदा पानी बजबजा रहा होता।

ऊसर और बंजर गाँव गाँव बढ़ रहे होते,
गेहूँ एक बीघे मे आधा मन पैदा होता।
थोड़े से लोग तो जरूर उफन-पेट खाते,
आम इंसान तो भूख से तड़प रहा होता।

हैजा, मलेरिया जैसी महामारी के चलते,
जनसंख्या का आँकड़ा स्थिर रुका होता।
सूखा व पीलिया से मर रहे होते बच्चे,
घर-घर मे मौत का कहर बरपा होता।

जगह जगह नगर महानगर न दिखते,
हर गाँव यथास्थिति मे रह रहा होता।
नगर मे भी उन्नति की आशा न होती,
गाँव का जीवन वहीं ठहरा हुआ होता।

टेलीफोन, टी. वी., ट्रैक्टर, कम्प्यूटर न होते,
हंडे की रोशनी मे नौटंकी का जमावड़ा होता।
भाखड़ा, भिलई, राउरकेला और नरौरा न होते,
चूल्हा जलाने को गोबर का धुंआता कंडा होता।

खरगू खलासी का बेटा कलक्टर न होता,
परागू दूधवाले का चीफ मिनिस्टर न होता।
पश्चिमी देशों में हिंदुस्तानी साइंसदां न होते
देश के बाहर भारत का नामलेवा न होता।

अखंड, परंतु अंग्रेजों के अधीन होता भारत,
पाकिस्तान और बांगलादेश न बना होता।
भगतसिंह और अशफाकुल्ला तो और भी होते,
आई.एस.आई. और जिया का न निशां होता।

माता पिता को बच्चे मम्मी डैडी न कहते,
अपनेपन को उनका मन तरसता न होता।
शिक्षक, माफिया बन खुद नकल न कराते,
छात्रों का विश्वास उनसे उठ गया न होता।

निशिदिन लूट, हत्या और अपहरण न होते,
कोइ- अपराधी शासन का सरवरा न होता।
यदि हिंदुस्तान आज आज़ाद न हुआ होता,
भाई ही भाई का जानलेवा न बना होता।

पर गुलामी के अंधेरे में खोया होता भारत,
दुनिया मे हमारा कोई नामलेवा न होता।



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें