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05.03.2012
 
स्वामी विवेकानंद - युग पुरुष
महेश चन्द्र द्विवेदी

भारत के इतिहास में 19वीं सदी का सातवां दशक युग-पुरुषों का जनक रहा है। इस दशक में गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने जन्म लिया था जो सम्पूर्ण विश्व में साहित्य और कला के क्षेत्र में शिखर पुरुष बने; इसी दशक में मोहनदास कर्मचन्द गाँधी ने जन्म लिया था जो विश्व के परतंत्र देशों एवं त्रसित मानवता के उद्धारक बने और महात्मा गाँधी कहलाये; इसी दशक में 12 जनवरी, 1863 को बंग-भूमि में नरेन्द्र नाथ दत्त ने जन्म लिया था, जो केवल 39 वर्ष की अल्पायु प्राप्त करने पर भी विश्व भर के आध्यात्मिक प्रणेता बने और स्वामी विवेकानन्द कहलाये।

नरेन्द्र नाथ दत्त न केवल एक मेधावी छात्र थे वरन्‌ उनमें सत्य को जानने की अटूट इच्छा, सत्य को पहिचानने का असीम विवेक एवं सत्य को स्वीकारने का अदम्य साहस बचपन से था। वे अपने युग के महान समाज सुधारक राम कृष्ण से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने वर्ष 1886 में राम कृष्ण बंधुत्व की स्थापना की थी, जो शैने: शैने: रामकृष्ण मिशन के रूप में पल्लवित होकर आज देश-विदेश में मानवता की सेवा एवं ज्ञान के प्रसार में अनवरत कार्यरत है।

भारत के धरातलीय यथार्थ को जानने-समझने हेतु नरेन्द्र नाथ दत्त ने सन्यासी वेश में भारत-भ्रमण किया और कन्याकुमारी में भारत के दक्षिणी छोर के निकट समुद्र के अंदर स्थित एक शिला पर राष्ट्र-ध्यानकिया। यह शिला उनकी बोध-शिलाके रूप में विवेकानंद-रॉकके नाम से विश्व विख्यात है, जहाँ प्रतिदिन सैंकड़ों दर्शनार्थी श्रद्धा-सुमन अर्पित करने आते हैं।

मित्रों एवं प्रशंसकों की सहायता से वर्ष 1893 में उन्होंने चीन, जापान के रास्ते से शिकागो प्रस्थान किया और 11 सितम्बर, 1893 को वहाँ आयोजित विश्व-स्तरीय धर्म संसद में ऐसा अविस्मरणीय सम्बोधन दिया जिसने भारतीय अध्यात्म की गुरुता के समक्ष अनेकों पाश्चात्य विद्वानों को नतमस्तक कर दिया। अमेरिका को समाचार पत्रों ने उनके विषय में टिप्पणी करते हुए लिखा-

"उन्हें भेजने के लिये अमेरिका भारत का आभार व्यक्त करता है और अनुनय करता है कि ऐसी और विभूतियाँ भेजे।"

उनके विषय में एक तत्कालीन धर्मज्ञ जान हेनरी राइट ने लिखा- "यह व्यक्ति हमारे समस्त पंडित प्रोफेसरों से भी बड़ा पंडित है।"

शिकागो के सम्बोधन का उनका यह वाक्य 19वीं सदी में व्याप्त धर्मांधता को खुली चुनौती थी, जो आज भी यथावत लागू है-

"साम्प्रदायिकता, धर्मांधता और उनके दुराग्रहवाद ने लम्बे समय से इस सुंदर धरा पर अधिकार करके उसे जकड़ रखा है। उन्होंन इस घरा को हिंसा से सराबोर किया है, इसकी सभ्यता नष्ट की है और राष्ट्रों को अंधकार में ढकेला है।"

स्वामी विवेकानन्द की आशावादिता एवं जीवंतता उनके निम्नांकित विश्वास में परिलक्षित होती है-

लाखों युवा स्त्री-पुरुष जिनमें पवित्रता की आग है, ईश्वर के प्रति चिरश्रद्धा का दुर्ग है, जिनमें गरीबों और दलितों के प्रति सहानुभूति का सिंह जैसा साहस है, भारत भूमि के कोने कोने तक पहुँचकर मुक्ति, सहायता और सामाजिक उत्थान का संदेश देंगे।"

युवा पीढ़ी में उनका यह विश्वास युवाओं में सदैव उस पवित्रता, श्रद्धा एवं सहानुभूति का प्रवाहक बना रहेगा।

 



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