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05.03.2012
 
याचना
डॉ. महेंद्र भटनागर

शैल हो तुम
हैं कसे सब अंग,
विकसित-वय भरे नव-रंग !

प्रत्यूष ने
जब स्वर्ण किरणों से छुए
सुगठित कड़े उन्नत शिखर
प्रति रोम रजताचल
गया सहसा सिहर,
द्रुत स्वेद-मंडित तन
द्रवित मन,
शीर्ष चरणों तक
हुई सद्-संचरित रति-रस लहर !

शैल हो तुम
नेह-निर्झर-धार धारित,
प्राण हरिमा भाव वासित !
एक कण प्रिय नेह का
एक क्षण सुख देह का
मन-कामना
वर दो !
अनावृत पात्र अन्तस्
भावना भर दो !


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