अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
तुम....
डॉ. महेंद्र भटनागर

जब - जब
मुसकुराती हो
बहुत भाती हो !

तुम
हर बात पर क्यों
मुसकुराती हो !

जब - जब
सामने जा स्वच्छ दर्पण के
सुमुखि !
श्रृंगार करती हो,
धनुषाकार भौंह - मध्य
केशों से अनावृत भाल पर
नव चाँद की
बिन्दी लगाती हो,
स्वयं में भूल
फूली ना समाती हो
               बहुत भाती हो !

नगर से दूर जा कर
फिर
नदी की धार में
मोहक किसी की याद में
दीपक बहाती हो
               बहुत भाती हो !
मुग्धा लाजवंती तुम
               बहुत भाती हो !
जब बार - बार
           मधुर स्वरों से
मर्म-भेदी
     चिर-सनातन प्यार का
            मधु - गीत गाती हो-
                   पूजा - गीत गाती हो
                            बहुत भाती हो !


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें