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| 02.17.2008 |
| समता का गान [परिप्रेक्ष्य होली] डॉ. महेंद्र भटनागर |
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मानव समता के रंगों में
आज नहा लो ! सबके तन पर, मन पर है जिन चमकीले रंगों की आभा, उन रंगों में आज मिला दो अपनी मंद प्रकाशित द्वाभा, युग-युग संचित गोपन कल्मष आज बहा दो ! भूलो जग के भेद-भाव सब — वर्ण-जाति के, धन-पद-वय के, गूँजे दिशि-दिशि में स्वर केवल मानव महिमा गरिमा जय के, मिथ्या मर्यादाओं का मद-गढ़ आज ढहा दो ! |
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