ओ विपथगे ! जग-तिरस्कृत, आ माँग को सिन्दूर से भर दूँ !
सहचरी ओ ! मूक रोदन की - कंठ को नाना नये स्वर दूँ !
ओ धनी ! अभिशप्त जीवन की - आ तुझे उल्लास का वर दूँ !
ओ नमित निर्वासिता ! आ आ नील कमलों से घिरा घर दूँ !
वंचिता ओ ! उपहसित नारी- अरे आ रुक्ष केशों पर विकंपित स्नेह-पूरित उँगलियाँ धर दूँ !