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05.03.2012
 
मेघ-गीत
डॉ. महेंद्र भटनागर

उमड़ते-गरजते चले आ रहे घन
घिरा व्योम सारा कि बहता प्रभंजन,
अँधेरी उभरती अवनि पर निशा-सी
घटाएँ सुहानी उड़ी दे निमंत्रण!

कि बरसो जलद रे जलन पर निरन्तर
तपी और झुलसी विजन भूमि दिन भर,
करो शांत प्रत्येक कण आज शीतल
हरी हो, भरी हो प्रकृति नव्य सुन्दर!

झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी पर, झड़ी हो
जगत-मंच पर सौम्य शोभा खड़ी हो,
गगन से झरो मेघ ओ! आज रिमझिम,
बरस लो सतत, मोतियों-सी लड़ी हो!

हवा के झकोरे उड़ा गंध-पानी
मिटा दी सभी उष्णता की निशानी,
नहाती दिवारें नयी औ' पुरानी
डगर में कहीं स्रोत चंचल रवानी!

कृषक ने पसीने बहाये नहीं थे,
नवल बीज भू पर उगाये नहीं थे,
सृजन-पंथ पर हल न आये अभी थे
खिले औ' पके फल न खाये कहीं थे!

दृगों को उठा कर, गगन में अड़ा कर
प्रतीक्षा तुम्हारी सतत लौ लगा कर—
हृदय से, श्रवण से, नयन से व तन से,
घिरो घन, उड़ो घन घुमड़कर जगत पर!

अजब हो छटा बिजलियाँ चमचमाएँ
अँधेरा सघन, लुप्त हों सब दिशाएँ
भरन पर, भरन पर सुना राग नूतन
नया प्रेम का मुक्‍त-संदेश छाये!

विजन शुष्क आँचल हरा हो, हरा हो,
जवानी भरी हो सुहागिन धरा हो,
चपलता बिछलती, सरलता शरमती,
नयन स्नेहमय ज्योति, जीवन भरा हो!

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