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| 03.22.2009 |
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मानव-मुक्ति और वैचारिक प्रतिबद्धता के कवि
:
डॉ. महेंद्र भटनागर डॉ. श्रीनिवास शर्मा (कोलकाता) |
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कवि के
बारे में प्रसिद्ध है कि वह निर्बन्ध-स्वच्छंद होता है। वह किसी प्रकार का
अनुशासन नहीं मानता। कवि स्वयंभू कहलाता है।
संस्कृत में कहा गया है :
अपारे
काव्य-संसारे कवि रेकः प्रजापतिः।
कवि की
तुलना प्रजापति ब्रह्मा से की जाती है। ब्रह्मा सृष्टि का कारक है। कवि
काव्य के माध्यम से नये लोक का निर्माण करता है। कवि भावनाओं-कल्पनाओं के
जगत का स्वामी है। उसकी कल्पना गगन में उन्मुक्त विचरा करती है। अन्य लोगों
की तुलना में कवि अधिक भावुक और संवेदनशील होता है। भावुकता,
कल्पनशीलता और संवेदनशीलता मनुष्य को कवि बनाती है। संस्कृत में कहा गया है
कि इस संसार में पहले तो मनुष्य होना ही एक दुर्लभ गुण है,
तिस पर भी विद्वान बनना और विद्वता के साथ कवि होना तथा काव्य रचने की
शक्ति पाना और दुर्लभ है —
नर त्वं
दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा।
कवि त्वं
दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा।।
कविता
करने वाले को ‘कवि’
कहा गया है। ‘कवि’
शब्द ‘कुवर्णे’
अथवा ‘कुङ्शब्दे’
धातु से ‘ई’
प्रत्यय लगाने से बनता है। राजशेखर कवि का अर्थ
‘वर्णनकर्ता’
मानते हैं। कवि रस तथा भाव का विमर्शक होता है। संस्कृत आलोचना में कवि का
प्रधान कार्य ‘वर्णन’
है। मम्मट के अनुसार ‘काव्य’
लोकोत्तर वर्णना में निपुण कवि का कर्म है।
(‘लोकोत्तर
वर्णना-निपुण कवि-कर्म’)।
(‘संस्कृत
आलोचना’/बलदेव
उपाध्याय)
कवि किसी
वस्तु का वर्णन मात्र कर देने से संतुष्ट नहीं होता। वह उसमें लोकोत्तर
भावों का भी प्रवेश करता है। इसलिए कवियों को
‘क्रांतिदर्शी’
भी
कहा गया है — ‘कवयः
क्रान्तिदर्शिनः’।
तात्पर्य कि ऊपरी आवरण को हटाकर अंतस्तल में पहुँचना कवि का लक्ष्य है।
‘दर्शन’
अच्छे कवि का लक्षण बताया गया है। कवि जब-तक प्रातिभ चक्षु से अनुभूत दर्शन
को सुन्दर शब्दों में प्रकट नहीं करता तब-तक वह कवि नहीं हो सकता। भावों की
शाब्दिक अभिव्यक्ति में ही ‘भावों’
के
‘दर्शन’
की
सार्थकता है।
कवि-कर्म
के लिए प्रतिभा का होना आवश्यक है। वह अपनी प्रतिभा के बल पर इच्छानुसार
काव्य-रचना में प्रवृत्त होता है;
रुचि के अनुसार काव्य-सृष्टि करता है। इसीलिए वह प्रजापति है:
यथास्मै
रोचते विश्वं तथेव परिवर्तते।
कहा गया
है कि कवि भावना और कल्पना-लोक का जादूगर है। तुच्छ,
साधारण तथा नीरस-से-नीरस वस्तु को भी कारयित्री प्रतिभा के बल पर वह सरस,
सजीव तथा आकर्षक बना देता है। कवि अपने काव्य की सामग्री संसार से प्राप्त
करता है।
भारतीय
संस्कृति में कवि को ईश्वर का दर्जा प्राप्त है। संस्कृत में कवि का सम्मान
सर्वतोभावेन विराजमान है। परन्तु कवि काव्य-रचना में निरुद्देश्य प्रवृत्त
नहीं होता। कोई-न-कोई प्रेरणा अवश्य होती है। संसार में निरुद्देश्य कुछ भी
नहीं। तिनके से लेकर पर्वत तक सभी सोद्देश्य है। सबकी अपनी भूमिका है। सुई,
सुई की जगह;
तलवार,
तलवार की जगह। भावना और कल्पना भी निरुद्देश्य नहीं होतीं। उनका भी
कोई-न-कोई आधार होता है। प्रेरक तत्त्व के बिना कोई भी कार्य सम्भव नहीं।
रस-सृष्टि,
आनन्द-सृष्टि सोद्देश्य साभिप्राय होती है।
प्राचीन
ग्रंथों में तीन प्रकार की ‘एषणा’
का
उल्लेख है - पुत्रेषणा,
वित्तेषणा
और लोकेषणा। लोकेषणा अर्थात् यश की प्राप्ति भी काव्य का एक महत् प्रयोजन
है। काव्य-प्रयोजन के बारे में कहा गया है
—
काव्यं
यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदं शिवेतरक्षतये।
सद्यः
परनिर्वृतये कान्ता-सम्मितयोपदेशयुजे।।
कविवर
भिखारी के मत में —
एक लहैं
तप पुंजनि के फल
ज्यों
तुलसी अरु सूर गोसाईं।
एक लहैं
बहु सम्पत्ति केसव
भूषन
ज्यों वर बीर बड़ाई।
एकनि को
जसही सों प्रयोजन
है रसखान
रहीम की नाईं। ‘दास’
कवित्तनि की चरचा
बुधिवन्तनि कों सुख दै सब ठाईं।।
आचार्य
मम्मट ने काव्य के दो ही प्रमुख प्रयोजन स्वीकारे हैं
— (1)
परमानन्द की सद्यः अनुभूति (2) कान्ता के समान उपदेश। अर्थात् काव्य-पाठ
द्वारा रस का आस्वादन और कान्ता के समान कविता में सरसता उत्पन्न कर पाठक
को अपनी ओर आकर्षित करना।
आधुनिक
युग में कवि और काव्य के बारे में उपर्युक्त मान्यताएँ खंडित हो चुकी हैं
अथवा इन्हें आंशिक रूप से ही स्वीकारा जा सकता है। कवि या लेखक संसार में
किसी से प्रतिबद्ध नहीं है,
किसी के
प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं है;
वह
परम स्वतंत्र,
स्वयंभू
है तथा केवल आत्म-संतोष के लिए लिखता है
—
यह आज कोई
नहीं स्वीकारता।
प्राचीन
भारत में भी दो प्रकार की काव्य-परम्परा हम पाते हैं
— (1)
विशिष्ट व्यक्तियों को केन्द्र में रखकर लिखे जाने वाले काव्य,
तथा (2) जीवन और लोक के व्यापक संदर्भों पर केन्द्रित काव्य। अभिजातवर्ग को
केन्द्र में रखकर संस्कृत में अनेक काव्य रचे गये। रामायण,
महाभारत जैसे महाकाव्य व्यापक लोक-जीवन पर आधारित हैं। काव्य का प्रयोजन
लोक-हित रहा है। गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट लिखा है
—
कीरति
भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम
सब कहं हित होई।।
अर्थात्
काव्य का प्रयोजन सब का हित है। काव्य के साथ लोक-मंगल का भाव प्राचीन काल
से ही जुड़ा रहा है।
आधुनिक
युग में आधुनिक समाजों की संरचना जिन आधारों पर हुई है उनका कोई भी तालमेल
प्राचीन मानव-समाजों से नहीं है। आदिम साम्यवाद से क़बीलाई समाज,
क़बीलाई समाज से राजतंत्र,
सामान्तवाद,
पूँजीवाद,
समाजवाद में क्रमशः समाजों का रूपान्तरण अपने में विकास का पेचीदा,
जटिल इतिहास छिपाये हुए है। समाज-विकास की यह प्रक्रिया जटिल तथा
द्वन्द्वात्मक रही है। अतः समाज-विकास की धारणा अमूर्त नहीं है। राजनीति,
धर्म,
कानून,
दर्शन,
कला,
साहित्य आदि के विकास में आर्थिक संरचना का महत्त्वपूर्ण हाथ रहा है।
कवि,
काव्य,
साहित्य,
कला के बारे में आधुनिक विचार पुराने विचारों से मेल नहीं खाते। साहित्य के
प्रतिमान बदल गये हैं। और इसके साथ ही बदल गयी है लेखकों की भूमिका। लेखकों
का दायित्व बदल गया है। आधुनिक युग में इसीलिए कवि-कर्म कठिन और जटिल हो
गया है। आज संसार छोटा हो गया है। विज्ञान,
उद्योग,
तकनीक और
मीडिया ने विश्व के देशों को परस्पर एक दूसरे के बहुत नज़दीक ला दिया है।
कोई भी घटना तुरत विश्व-भर में ज्ञात हो जाती है। संचार-माध्यम और मीडिया
ने देशों की दूरी बिलकुल कम कर दी है। आज का लेखक विश्व में हो रही घटनाओं
की जानकारी तुरत पा जाता है। उसकी चेतना वैश्विक हो गयी है। यह केवल अपने
देश और समाज नहीं;
बल्कि
विश्व और विश्व-मानव-समाज के बारे में सोचता है। आधुनिक वैज्ञानिक युग की
यह सबसे बड़ी उपलब्धि है।
आधुनिक
समाज दो भागों में बँटा है —
शोषक,
शोषित।
पूँजीपति,
शोषक-वर्ग
है और सर्वहारा-वर्ग शोषितों का है। कला,
साहित्य,
संस्कृति
के बारे में भी आधुनिक मनुष्य का दृष्टिकोण वर्गीय हो गया है। कवि,
लेखक और साहित्य पक्षधर हो गये हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी कवि आज अपने को
‘स्वयंभू’
नहीं कहता। आधुनिक समाजों में कवि की स्थिति
‘एकांत’
नहीं है। कवि समाज में जन्म लेता,
पलता और बड़ा होता है। उसके व्यकतित्व के निर्माण और विकास में समाज,
परिवेश का बड़ा हाथ होता है। कोई भी रचनाकार समाज में रहकर समाज-निरपेक्ष
कैसे हो सकता है?
साहित्यिक
निरपेक्षता की बात इसीलिए बेमानी है। वातावरण का कारक प्रभाव लेखक-कवि पर
पड़ता है। परिवेश समाज को प्रभावित करता है। परिवेश और समाज दोनों मिलकर कवि
को प्रभावित करते हैं। लेखक परिवेश को तथा परिवेश लेखक को प्रभावित करता
है।
लेखक और
परिवेश का रिश्ता द्वन्द्वात्मक होता है। लेखक तीन प्रकार के होते हैं
—
यथास्थितिवादी,
पलायनवादी
तथा विद्रोही। यथास्थितिवादी लेखक समझौतावादी प्रकृति का होता है।
पलायनवादी लेखक समाज-निरपेक्ष,
लोक-विमुख होता है। विद्रोही रचनाकार समय,
शासन,
परिवेश के
विरुद्ध संघर्ष करता है। इसीलिए वह विद्रोही कहलाता है। पलायनवादी कवियों
को संस्कृत में ‘रचना-कवि’
कहा गया है। राजशेखर के अनुसार कवि आठ प्रकार के होते हैं- रचना-कवि,
शब्द-कवि,
अर्थ-कवि,
अलंकार-कवि,
उक्ति-कवि,
रस-कवि,
मार्ग-कवि
और शास्त्रार्थ कवि। रचना-कवि केवल कविता करने के ध्येय से रचना-कर्म में
प्रवृत्त होते हैं।
कविता कवि
की मानस-पुत्री है;
क्योंकि
कविता कवि-मानस में ही सृजित होती है। कविता चूँकि मन-मस्तिष्क प्रेरित
होती है,
इसलिए वह
अंतःप्रेरित है। अतःप्रेरित होने के कारण उसका संबंध मनोविज्ञान से भी है।
प्राचीन भारतीय काव्य-शास्त्र में कविता के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर कम विचार
हुआ है। पश्चिम में इस पर विस्तृत विवेचन हुआ है। मनोविज्ञान मन का विज्ञान
है,
मन का
दर्शन है। इसीलिए वह मानसिक दर्शन है। अंतर्मुखी प्रकृति के कवि मन के
अंतर्प्रेदेशों की यात्रा करते हैं। पश्चिम में प्लेटो से लेकर अरस्तू,
पारमेनिडीज़,
एनेक्सेगोरस,
डिमोक्रेट्स,
हिपोक्रेटिज़ आदि ने मन,
शरीर,
विश्व,
सृष्टि के
प्रश्नों पर बहुत विचार किया है। आधुनिक युग में फ्रॉयड,
एडलर,
युंग ने
मनोविश्लेषण के क्षेत्रा में नये कीर्तिमान स्थापित किये। फ्रॉयड के
मनोविश्लेषण-सिद्धान्त ने विश्व में तहलका मचा दिया था। फ्रॉयड ने कला और
साहित्य का संबंध मनुष्य की दमित भावनाओं से जोड़ा था।
आधुनिक
युग की कविता बुद्धि-प्रधान होने के कारण बौद्धिक है। बुद्धिवादी कवि
बहिर्जगत पर बल देते हैं। दूसरे क़िस्म के बुद्धिवादी मन के अंतप्रदेशों में
रमना अधिक पसंद करते हैं। फ्रॉयड,
एडलर और युंग ने आधुनिक कला-साहित्य को भी प्रभावित किया है। आधुनिक
समालोचना में इसीलिए मनोविज्ञान एक निर्णायक कारक-तत्त्व है। मनोविज्ञान
विज्ञान तथा खोज की वह देन है,
जिसने आज के जटिल युग की जटिल समस्याओं को समझने में क्रांतिकारी भूमिका
निभायी है। मनोविश्लेषण की यह प्रक्रिया सामंतवाद के ढूहों से आरम्भ हुयी
थी। इस सदी में ही नेपोलियन ने शरीर-रचना-विज्ञान तथा हार्वे ने
शरीर-क्रिया के क्षेत्र में नये विचार दिये थे। हॉब्स ने लिखा था कि समूचे
ज्ञान का स्रोत संवेदनाएँ होती हैं। जॉन लॉक ने बताया था कि शिशु का मन
कोरे कागज़ के समान होता है;
जिस पर
अनुभव की लेखनी चलती है।
मनुष्य का
स्वभाव प्राचीन काल से ही एक समस्या रहा है। दार्शनिकों ने दर्शन तथा धर्म
के परिप्रेक्ष्य में मानव-स्वभाव का अध्ययन कर उसे समझने का प्रयास किया
है। पश्चिम के दार्शनिकों ने धार्मिक प्रभावों से अलग हटकर
‘मानव-मन’
को
विश्लेषित किया है। भारतीय दार्शनिकों से भिन्न पाश्चात्य दार्शनिक मन को
आत्मा से पृथक मानने के विरोधी हैं। मनोविज्ञान ने मन की अतल गहराइयों में
उतरकर वैज्ञानिक धरातल पर विवेचन किया है। इस क्षेत्र में डॉ. फ्रॉयड का
महत्त्वपूर्ण योगदान है। फ्रॉयड का अभिप्रेरणा (Motivation)
पर
विशेष बल है। अभिप्रेरणा का मनोविज्ञान भूख,
प्यास,
काम आदि
से संबंधित है। मानव अभिप्रेरणा के बारे में डॉ. फ्रॉयड के अलग विचार हैं।
ट्रोलेण्ड ने तीन प्रकार के सुखवाद का उल्लेख किया है
—
वर्तमान,
भविष्य और अतीत का। अभिप्रेरणा के संबंध में फ्रॉयड के विचार भविष्य के
सुखवाद से ही संबंधित हैं। फ्रॉयड मानते थे कि मन के विज्ञान का जैव आधार
ही हो सकता है। फलस्वरूप उन्होंने मनोविश्लेषणात्मक सम्प्रदाय के
अभिप्रेरणात्मक पक्ष की स्थापना जनन-मूलप्रवृत्ति के आधार पर की थी। इसे
उन्होंने ‘लिबिडो’
कहा। ‘लिबिडो’
एक
मनोवैज्ञानिक प्रत्यय है। इसका संबंध काम मूलप्रवृत्ति के शारीरिक तथा
मानसिक दोनों पक्षों से है। ‘लिबिडो’
अपक्व कामुकता तथा लैंगिक संबंधों की उत्कट अभिलाषा है। इसको
‘ईड’
की
शक्ति कहा जा सकता है। ‘ईड’
काम मूल प्रवृत्ति है। यह भावात्मक है। इसकी नाप-जोख असंभव है। फ्रॉयड के
अनुसार काम-प्रवृत्ति इतनी व्यापक है कि उसमें प्रेम की ओर केन्द्रित रहने
वाले समस्त आवेग सम्मिलित हैं। फ्रॉयड ने
‘लिबिडो’
के
मानसिक पक्ष पर विशेष बल दिया है। व्यक्ति के उत्थान-पतन में इच्छाओं का
विशेष महत्त्व है। इच्छाएँ महत्त्वाकांक्षा होती हैं या फिर काममूलक। अचेतन
में दमित इच्छाएँ ही आगे चलकर उद्भासित होती हैं। कलाकार कल्पना-चित्रों का
संस्कार कर उसे एक ऐसा रूप देता है ताकि दमन के अवरोध बह जाएँ। फ्रॉयड के
अनुसार कलाकार दमित काम-वासना को,
कल्पना-चित्रों के संसार को एषणा-सृष्टि में रूपान्तरित करता है। इस प्रकार
फ्रॉयड ने काम-वासना को कला के उत्स के रूप में स्वीकारा था।
‘मानसिक
अचेतन’
में
फ्रॉयड का दृढ़ विश्वास था। फ्रॉयड की मान्यताओं पर उसके पूर्वकालीन फ्रांस
के मनोवैज्ञानिकों का काफ़ी प्रभाव था। अचेतन के संबंध में अपने विचारों के
फलस्वरूप फ्रॉयड इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि अचेतन मन मुख्य रूप से
प्रेरणाओं से निर्मित होता है। वे मानते थे कि कोई भी व्यवहार अकारण नहीं
होता।
फ्रॉयड का
विरोध उनके समकालीन युंग तथा एडलर ने किया था। युंग ने तो यहाँ तक कह दिया
कि उनके विचार अस्पष्ट हैं। एडलर का भी फ्रॉयड से तीव्र मतभेद था।
‘लिबिडो’
को
फ्रॉयड मुख्य प्रेरक मानते थे। एडलर के मत में
‘उत्कृष्टता’
और
‘प्रभुत्व’
की
भावना मूल में है। ‘प्रभुत्व’
की
कामना सब में होती है। अतः ‘काम-आवेग’
की
तुलना में ‘स्वाग्रही
आवेग’
मुख्य
कारक है।
एडलर
प्रयोजनवादी थे। युंग ने दोनों का विरोध किया। युंग ने काम-वासना को जीवन
की सामान्य शक्ति माना। वह जैविक प्रक्रियाओं की शक्ति है। एक अभेद्य
जीवन-शक्ति है;
जिसकी
अभिव्यक्ति सृजनात्मक गतिविधियों के माध्यम से होती रहती है।
मन के तीन
भाग किये जा सकते हैं —
चेतनात्मक,
अचेतनात्मक और सामूहिक अचेतनात्मक। युंग के अनुसार अचेतन ही अधिक सक्रिय
रहता है। युंग ने दो प्रकार के व्यक्तियों में प्रभेद किया है
—
बहिर्मुखी
और अन्तर्मुखी। सामाजिक रुचि-प्रधान व्यक्ति बहिर्मुखी तथा स्वकेन्द्रित
अंतर्मुखी होता है।
आधुनिक
हिन्दी साहित्य पर फ्रॉयड,
एडलर और
युंग का काफ़ी प्रभाव है। स्वानुभूतिपरक कविता की एक लंबी परम्परा है।
उपन्यास,
कहानी भी
अपवाद नहीं। जैनेन्द्र,
इलाचंद्र
जोशी,
अज्ञेय
तथा नयी कविता,
नयी कहानी
के अनेक ऐसे हस्ताक्षर हैं। मनोविश्लेषण के अतिरिक्त मार्क्सवाद,
अस्तित्ववाद,
शैली-विज्ञान,
संरचनावाद
का भी काफ़ी प्रभाव है। आधुनिक हिन्दी कविता पूर्व से अधिक;
पश्चिम से प्रभाव ग्रहण करती है। प्रभाव-ग्रहण की यह प्रक्रिया आयातित,
आरोपित है। प्रगतिवाद पर भी यह आरोप है। परन्तु मार्क्सवाद,
एक
समग्र जीवन-दर्शन है,
समाज-व्यवस्था है;
जो समाज
को दो वर्गों के रूप में देखता है
—
शोषक-शोषित। साहित्य,
कला पर
ऐसे जीवन्त दर्शन का प्रभाव स्वाभाविक है। मार्क्सवाद समाज,
जीवन की गतिशीलता में विश्वास करता है। गतिशीलता परिवर्तनकामी होती है। जड़,
चेतन सभी परिवर्तन के अधीन हैं। गौतम बुद्ध भी वस्तुओं के नित्य परिवर्तन
को मानते थे। बुद्ध-दर्शन में इसे
‘प्रतीत्व
समुत्पाद’
कहा गया
है। मार्क्सवाद में संस्कृति आत्मा नहीं,
अधिरचना है। आधार अधिरचना को प्रभावित करता है। प्रभुत्वशाली वर्ग कथा,
साहित्य,
संस्कृति
का उपयोग अपने हित में करता आया है। सत्ता का विरोध करने वाले साहित्यकार
अतीत में बहुत कम हुए हैं। भक्ति-साहित्य अपवाद है। भक्तिकाल का साहित्य
सत्ता-प्रतिष्ठान के विरोध का साहित्य है।
मध्य-युग
राजशाही,
सामन्तशाही का था। आधुनिक युग पूँजीवाद का है। रूस,
चीन,
विएतनाम
जैसे देशों में पूँजीवाद के खिलाफ़ समाजवाद आया। 1917 की रूसी राज-क्रांति
ने समाजवाद को पृथ्वी पर सम्भव किया। चीन,
विएतनाम जैसे देश समाजवादी बन गये। मार्क्स,
एंगेल्स,
लेनिन के
विचारों का वैश्विक प्रभाव पड़ा था। भारतीय स्वाधीनता-संग्राम को रूस के
समाजवादी विप्लव से काफ़ी बल मिला था। इसके पहले योरोप में दो क्रांतियाँ हो
चुकी थीं। फ्रांस की राज-क्रांति,
इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रांति। औद्योगिक क्रांति ने आधुनिकीकरण की
प्रक्रिया को तेज़ किया।
मार्क्स-पूर्व विचारक समझते थे कि जनता वर्गों में विभाजित है। समाज में
वर्ग-संघर्षों को भी देखते थे। परन्तु वस्तुगत आधारों की खोज में असमर्थ
थे। वर्ग-विभाजन के कारक तत्त्वों का पता भौतिक उत्पादनों के क्षेत्र में
सबसे पहले मार्क्स,
एंगेल्स
ने ही लगाया था। लेनिन ने लिखा —
‘वर्ग
जना के बड़े समूह हैं;
जिनमें
उत्पादन की इतिहास द्वारा निर्दिष्ट किसी व्यवस्था में अपने विशिष्ट स्थान
द्वारा,
उत्पादन
के साधनों के प्रति अपने संबंध द्वारा,
श्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका द्वारा,
और
परिणाम-स्वरूप इस चीज़ द्वारा कि वह सामाजिक सम्पदा का कितना बड़ा भाग अर्जित
करते हैं और किस तरीक़े से अर्जित करते हैं
—
एक दूसरे
से भिन्नता होती है। वर्ग जनता के ऐसे समूह होते हैं जिनमें से एक इस चीज़
की बदौलत कि वे सामाजिक अर्थ-व्यवस्था की किसी ख़ास प्रणाली में
भिन्न-भिन्न स्थान रखते हैं,
दूसरों के श्रम को हड़प सकता है।’
यह
वर्ग-विशेष उत्पादनों के साधनों पर ही कब्ज़ा नहीं करता;
कला,
साहित्य,
संस्कृति को भी हड़पने की कोशिश करता है। हड़पना इस मायने में कि वह कलाकारों
से अपेक्षा करता है कि वे प्रभु-वर्ग के विचारों का ही विस्तार करें। इस
प्रकार न केवल भौतिक उत्पादन बल्कि साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी
वैमनस्यपूर्ण वर्ग समाजों के विकास का आधार तैयार करता है। वैमनस्यपूर्ण
वर्ग-समाजों का आधार अन्तर्विरोधी होता है। वर्ग-समाज में उत्पीड़क और
उत्पीड़ित का द्वन्द्व कला,
साहित्य
में भी प्रतिबिम्बित होता है। क्योंकि मार्क्स,
एंगेल्स के अनुसार- ‘वह
वर्ग जो समाज की शासक भौतिक शक्ति होता है,
वही शासक बौद्धिक शक्ति भी हुआ करता है।’
समाजवादी विचार भारतीय स्वाधीनता-संग्राम को प्रेरित-प्रभावित कर रहे थे।
नेताओं का एक बड़ा वर्ग समाजवाद से प्रभावित था। नेहरू इसके प्रवक्ता के रूप
में उभरे थे। 1936 के लखनऊ के कांग्रेस-अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने
समाजवादी लक्ष्यों की घोषणा की थी। फैजपुर के कांग्रेस-अधिवेशन 1937 में
नेहरू ने जनता के बीच यहाँ तक कहा था
— "जैसा
कि आम लोगों को मालूम है कि मुझे हर समस्या के प्रति समाजवादी दृष्टिकोण
में भारी दिलचस्पी है।''
कांग्रेस के नेता एक तरफ़ समाजवादी लक्ष्यों की घोषणा कर रहे थे;
दूसरी तरफ़ एक ऐतिहासिक साहित्यिक-सांस्कृतिक आन्दोलन भारत में जन्म ले रहा
था;
जिसने आने
वाले वर्षों में कला-साहित्य में क्रांतिकारी परिवर्तन किया।
सन्
1935-36 का राजनीतिक वातावरण बड़ा गर्म था। कई तरह के विचार राजनीति को
प्रभावित कर रहे थे। सर्वाधिक प्रभाव समाजवाद का था। सन् 1917 ई. की रूसी
राज-क्रांति ने विश्व के अनेक देशों को प्रभावित किया था। आज़ादी के लिए
संघर्षरत एशिया,
अफ्रीका
के देशों को इससे बड़ा बल मिला था। समाजवादी विप्लव ने राजनीति के साथ-साथ
समाजार्थिक संरचना,
कला-साहित्य,
संस्कृति
को भी प्रभावित किया था।
भक्ति
आन्दोलन के बाद भारत के सांस्कृतिक इतिहास में यह सबसे बड़ा आन्दोलन था।
प्रेमचंद ने साहित्यकारों से कहा था कि उनकी सच्ची अदालत जनता है तथा जनता
की इस अदालत में उनकी अर्ज़ी इसी तरह सुनी जायगी कि वह मानवता,
सज्जनता,
न्याय और
अधिकार का निर्भय होकर समर्थन करे। प्रेमचंद के अनुसार साहित्य राजनीति का
पिछलग्गू नहीं;
बल्कि
राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। प्रेमचंद ने अपने लेखन कि ज़रिए स्वयं इस
सत्य को प्रमाणित किया था। साहित्य की इस मशाल का नेतृत्व वे स्वयं कर रहे
थे। सज्ज़ाद ज़हीर ने प्रेमचंद के बारे में लिखा है
— "उनकी
गांधीवादी राजनीति के असफल अनुभवों और उनके मानव-प्रेम ने उन्हें इस हद तक
पहुँचा दिया था कि जो लोग केवल बड़े-बड़े धार्मिक और चारित्रिक सिद्धान्तों
का आन्दोलन चलाकर आदमी की भौतिक और आध्यात्मिक कठिनाइयों को दूर करना चाहते
हैं वे सफल नहीं हो सकते। आज के युग में न्याय और सज्जनता और मानवता का
सृजन उसी स्थिति में सम्भव है जब कि एक ऐसी नयी आर्थिक और राजनीतिक
व्यवस्था बनायी जाये जिसमें आदमी द्वारा आदमी का शोषण सम्भव न हो सके।"
हम देखते हैं कि सन् ’30
के उत्तरार्द्ध का समय साहित्य,
कला,
संस्कृति
के इतिहास का ऐसा काल-खण्ड है जिसमें सर्वथा नवीन,
क्रांतिकारी भावनाओं का आश्चर्यजनक विकास हुआ। सन् 1942 में दिल्ली में
फासीवाद-विरोधी सम्मेलन हुआ था तथा इसी वर्ष बंबई में भारतीय जन-नाट्य संघ
(इप्टा) की स्थापना हुई थी। नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में
‘इप्टा’
का
पदार्पण एक नये युग का आरम्भ था। ‘इप्टा’
की
स्थापना के फलस्वरूप साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना का प्रवाह तीव्र हुआ।
अब
छायावाद उतार पर था। डा॰ देवराज ने
‘छायावाद
का पतन’
पुस्तक
लिख कर छायावाद के अवसान की घोषणा कर दी थी। छायावाद के अन्तर्गत निराला
एकमात्र ऐसे कवि थे जो छायावाद के होकर भी छायावाद से बाहर थे। निराला की
मशाल नागार्जुन,
केदारनाथ
अग्रवाल,
शील,
शमशेर बहादुर सिंह,
मुक्तिबोध,
शिवमंगलसिंह, ‘सुमन’,
रांगेय राघव,
डा॰
रामविलास शर्मा,
गिरिजाकुमार माथुर,
नेमिचंद्र
जैन,
त्रिलोचन
जैसे परवर्ती काल के कवियों में और प्रखर हुयी थी।
‘हंस’
ने
प्रगतिशील आन्दोलन को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया था। ये सारे
कवि डा॰ महेन्द्र भटनागर की अग्रज पीढ़ी के कवि थे;
जिन्हें अपने समय में प्रगति-विरोधी ताक़तों से जमकर लोहा लेना पड़ा था।
महेन्द्र
भटनागर प्रगतिवाद के द्वितीय उत्थान के केन्द्रीय कवि के रूप में माने जाते
हैं। ‘हंस’
पत्रिका के माध्यम से महेन्द्र जी प्रगतिवादी काव्यान्दोलन से जुड़े थे। उस
समय कथाकार अमृतराय और त्रिलोचन शास्त्री
‘हंस’
से
संबंधित थे। सन् 1947 ई॰ में पहली बार
‘हंस’
में महेन्द्रभटनागर की कविता प्रकाशित हुई थी। बहुत कम समय में ही महेन्द्र
भटनागर की गिनती प्रगतिवाद के प्रमुख कवियों में होने लगी थी। ‘तार
सप्तक’
और
‘सप्तक’
द्वितीय-तृतीय के प्रकाशन के बाद प्रगतिवादी आन्दोलन को कुछ झटका अवश्य लगा
था। प्रयोगवाद,
अस्तित्ववाद,
क्षणवाद,
नयी कविता,
लघु मानव
की प्रतिष्ठा के सवाल साहित्य में अहम हो गये थे। प्रगतिवाद को
व्यक्ति-विरोधी घोषित किया गया था। अज्ञेय,
धर्मवीर भारती,
लक्ष्मीकांत वर्मा,
श्रीकांत
वर्मा,
जगदीश
गुप्त जैसे कवियों ने प्रगतिवाद को आयातित सिद्ध किया था।
महेन्द्रभटनागर जैसे कवियों ने प्रगतिवाद की खोयी हुई प्रतिष्ठा को पुनः
स्थापित किया था। महेन्द्रभटनागर की कविताएँ बहु-स्तरीय हैं। उनकी कविताएँ
परत-दर-परत समय और समाज की विपरीतताओं को अनावृत्त करती हैं। साथ ही,
महेन्द्र जी ने रचनाओं के माध्यम से प्रमाणित किया कि प्रगतिवाद स्वस्थ
परंपरा का विरोध नहीं करता। अलबत्ता परंपरा के नाम पर कूड़े-करकट का समर्थन
भी नहीं करता। प्रगतिवादी कवि परंपरा की उपलब्धियों के प्रति हमेशा से सजग
रहते आये हैं। अतीत,
वर्तमान
और भविष्य तीनों पर उनकी समान दृष्टि रही है। सच तो यह है कि परंपरा के
प्रति एकमात्र प्रगतिवादी कवियों की ही दृष्टि वस्तुपरक तथा वैज्ञानिक रही
है। महेन्द्र जी ने प्रगतिवादी कविता को
‘नारा’
बनने से बचाया था। उन्होंने भाषा,
छंद,
प्रतीक
तथा बिम्बों के नये प्रयोगों द्वारा प्रगतिशील कविता को समृद्ध किया। अकेले
महेन्द्र जी ने कविता के क्षेत्र में जितने तरह के प्रयोग किये हैं;
वह
विविधता तथाकथित प्रयोगवादी कवियों में भी देखने को नहीं मिलती। उन्होंने
खुले तौर पर प्रयोगवाद के प्रयोगधर्मी और शिल्पधर्मी स्वरूप का विरोध किया
था।
महेन्द्रभटनागर कविता में शिल्प और प्रयोग के विरोधी नहीं हैं। उनका विरोध
प्रयोगवाद,
शिल्पवाद
और रूपवाद से है। महेन्द्र जी ने स्वयं नये-नये प्रयोग किये हैं। परन्तु
उन्होंने कविता को शिल्पधर्मी-प्रयोग-धर्मी होने से बचाया है। उनकी कविताएँ
जीवनधर्मी हैं। महेन्द्र जी के ही शब्दों में
— "आज
की कविता ‘प्रगति’
और
‘प्रयोग’
के
दृष्टिकोण से देखी जाती है। मैं प्रयोग करता हूँ;
लेकिन प्रयोग से मेरा अभिप्राय प्रयोगवादियों से भिन्न है;
जो
प्रयोग के चमत्कारिक प्रदर्शनों से साहित्य की जनवादी विचार-धारा को दबा
रहे हैं। प्रयोगों का सामाजिक संबंध होना अनिवार्य है। प्रगतिशील दृष्टिकोण
से जन-जीवन के भावों की अभिव्यक्ति यदि नाना रूपों में की जाती है तो यह एक
स्वस्थ और जीवनदायी परम्परा कही जाएगी। मैं यह देख रहा हूँ कि हिन्दी के
अनेक प्रगतिशील-जनवादी कवियों में आज वह तेज़ी नहीं रही जो पहले थी। उनमें
से बहुत से प्रयोग-शैली के भँवर में फँसकर जनवादी परम्पराओं से दूर होते जा
रहे हैं। उनकी कविताएँ दुरूह,
कलाहीन और अप्रभावशाली होती जा रही हैं। मैं जहाँ कविता में नये-नये
प्रयोगों का समर्थक हूँ;
वहाँ
दूसरी ओर उसके विचार-पक्ष में प्रगतिशील-दर्शन की छाया भी देखना चाहता हूँ
—
तभी कविता
राष्ट्रीय तथा सामाजिक चेतना दे सकेगी;
ऐसा मेरा विश्वास है। अन्यथा,
वह
थोड़े-से व्यक्तियों की चीज़ बनकर रह जाएगी और स्रष्टा युगधर्म निभाने में
असफल रहेगा।“
महेन्द्र
जी की रचना-प्रक्रिया,
रचना-दृष्टि और चिन्तन को समझने के लिए उपर्युक्त कथन का बहुत उपयोग है।
‘प्रगतिशील
दृष्टिकोण’, ‘प्रगतिशील
दर्शन’
और
‘युग-धर्म’
शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। कवि ने किसी
‘वाद’
विशेष का समर्थन नहीं किया है। वह जीवन और समाज की गतिशीलता,
परिवर्तनशीलता में विश्वास करता है। स्थिर समाज जड़ होता है। स्थिर जीवन
स्पंदनहीन हो जाता है। मनुष्य का जीवन एक सतत गतिशील प्रक्रिया है।
मानव-समाज स्थिर कभी नहीं रहा है। स्थिर,
जड़
समाज इतिहास से ग़ायब हो जाता है। सामंतवादी समाजों में परिवर्तन की
प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी होती है। औद्योगक समाजों में द्रुतगति से
परिवर्तन होते हैं। कला,
साहित्य,
संस्कृति पर इन परिवर्तनों का निर्णायक प्रभाव पड़ता है। प्रगतिशील कवि युग
और समाज के अनुरूप अपने को बदलता है। काव्य-प्रतिमान,
काव्य-भंगिमा बदलती है। यही कवि का
‘युग-धर्म’
है। कबीर,
सूर,
तुलसी का कोई वाद नहीं था। परन्तु उनकी कृतियों पर तत्कालीन युग और समाज की
तस्वीर स्पष्ट है। ‘तटस्थता’
भ्रामक शब्द है। जड़ और चेतन कुछ भी तटस्थ नहीं।
‘निरपेक्षता’
भी
इसी प्रकार का शब्द है। तटस्थ और निरपेक्ष तो शायद देवता रह सकते हैं;
मनुष्य नहीं। रचनाकार के लिए तटस्थता,
निरपेक्षता जैसे शब्द कोई माने नहीं रखते। तटस्थ और निरपेक्ष होना जड़ता का,
मृत्यु का सूचक है। सर्जनात्मक और वैचारिक उत्तेजना से परिपूर्ण कविता ही
श्रेष्ठ होती है। तटस्थ और निरपेक्ष कवि की कविता में जीवन का ताप नदारद
होता है। प्रसिद्ध माक्र्सवादी समीक्षक कोडवेल ने लिखा है,
"विज्ञान
बाह्य यथार्थ की आवश्यकता की चेतना है और कला मूलभूत प्रवृत्तियों की
आवश्यकता की चेतना। इस द्वन्द्वात्मकता में साहित्य किसी उद्देश्य का
अधीनस्थ नहीं है,
न ही उसके
लिए विवादमूलक भूमिका निर्धारित है। यह
‘विचारों’
और
‘विश्वासों’
को
वाणी देकर उस भविष्य की सृष्टि करता है,
जिसे काल के आयाम में प्राप्त किया जा सकता है।"
विचारों
और विश्वासों की वाणी देना कवि का प्रमुख कर्तव्य है। विचारहीन,
विश्वासहीन कवि समाज को क्या दे सकता है?
ऐसे कवि आत्मकेन्द्रित,
पलायनवादी,
कुंठित तथा प्रतिक्रियावादी होते हैं।
महेन्द्र
जी की कविताओं का धनात्मक पक्ष है
—
विचारों,
विश्वासों
की निर्भीकता। शुरू से ही वे लेखन में विद्रोही,
क्रांतिकारी रहे हैं। कवि का विद्रोह ओढ़ा हुआ या आरोपित नहीं है। महेन्द्र
जी को छल-छद्म में ज़रा भी विश्वास नहीं है। कविताओं में विदेशीपन,
शब्दों में लफ्फ़ाज़ी नहीं है। वे जातीय चेतना के कवि हैं। उनकी रगों में
देश-प्रेम,
आज़ादी,
समाजार्थिक समानता और जातीय संस्कृति का रक्त सदा प्रवाहित होता रहता है।
वे जीवन की ऊष्मा के कवि हैं। उनकी कविताएँ पाठकों को गुदगुदाती नहीं,
झकझोरती हैं,
उद्बुद्ध
करती हैं। बदलाव की बेचैनी,
परिवर्तन
की कामना से उद्वेलित कवि का मन जनता को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए सदा
तत्पर रहता है। सामाजिक न्याय,
सामार्थिक समानता के बिना समाज की मुक्ति संभव नहीं। लोक-मुक्ति की कामना
उनके कवि-कर्म की प्राथमिकता है। महेन्द्र जी ने कहीं भी कविता का संबंध
जीवन की वास्तविकताओं से टूटने नहीं दिया है। महेन्द्रभटनागर उन थोड़े-से
गिने-चुने कवियों में हैं जिनका रचना - कर्म स्वाधीनता आन्दोलन से लेकर
स्वाधीनोत्तर भारत के एक लम्बे काल खंड को घेरता है। राष्ट्रीय आन्दोलन के
महत्त्वूपर्ण कवियों में तो वे हैं ही। राष्ट्रीय आन्दोलन ज्यों-ज्यों
तीव्र होता गया था,
जनता का
मुक्तिकामी संघर्ष त्यों-त्यों ज़ोर पकड़ रहा था;
कवि की कविताएँ उतनी ही व्यजंक,
धारदार होती गयी थीं। उनकी कविता उन दिनों भी मुक्ति-संघर्षों को धार दे
रही थी। ‘स्वातंत्र्य-झंझावात’
में कवि के उद्गार देखिए —
चल रहा है
वेग से स्वातंत्र्य - झंझावात!
आज जन-जन
की पुकारें,
अग्नि की
बरसात!
आज जन-जन
की दहाड़ें,
मृत्यु का
आघात!
दासता की
शृंखलाएँ तोड़ देंगे आज,
घोर
प्रतिद्वन्द्वी हवाएँ मोड़ देंगे आज,
निज
निराशा,
फूट,
जड़ता छोड़ देंगे आज!
.
अंतिम छंद
में कवि कहता है —
रुक नहीं
सकते चरण दृढ़ द्रोहियों के आज,
मिट नहीं
सकते दमन की आँधियों से आज,
इन्क़लाबी
स्वर दबे कब साथियों के आज?
कविताओं
में इनक़लाब का यह तेवर उनकी चिन्ता का सहज उद्वेग है। कविताओं का प्रवाह
कवि की चेतना के समानान्तर चलता है। स्वाधीनता उस समय की राष्ट्रीय
आवश्यकता थी;
परन्तु
‘जॉन’
की
जगह कहीं ‘गोविंद’
न
बैठ जाय,
यह भी
लोगों की चिन्ता के के्द्र में था। प्रेमचंद काफ़ी पहले ही यह आशंका कर
चुके थे। प्रगतिशील कवि,
प्रेमचंद
की इस चिन्ता के प्रति सजग थे। राष्ट्रीय और लोक-आकांक्षाओं की यह व्याप्ति
—जो
महेन्द्र जी की कविताओं में है —
अन्यत्र दुर्लभ है।
कविता की
भूमिका युगानुरूप बदलती आयी है। उसके कथ्य,
भाव,
भंगिमा
में भी परिवर्तन स्वाभाविक है। कवि समय की पुकार,
अपेक्षाओं को अनदेखा नहीं कर सकता। विचार,
दर्शन,
परिवर्तन
का प्रभाव आधुनिक युग के साहित्य पर तीव्रता से पड़ा है। कवियों,
कलाकारों ने समय,
समाज की
आवश्यकतानुसार साहित्य की भूमिका में परिवर्तन किया है। छायावादी युग के भी
कवि साहित्य की सामाजिक भूमिका के इस दायित्व के प्रति सजग थे।
‘रूपाभ’
के
सम्पादकीय में कवि सुमित्रानन्दन पंत ने लिखा था
— "इस
युग में जीवन की वास्तविकता ने जैसा उग्र आकार धारण कर लिया है,
उससे प्राचीन विश्वासों में प्रतिष्ठित हमारे भाव और कल्पना के मूल हिल गये
हैं। अतएव इस युग की कविता स्वप्नों में नहीं पल सकती।....उसकी जड़ों को
अपनी पोषण-सामग्री ग्रहण करने के लिए कठोर धरती का आश्रय लेना पड़ रहा है।
हमारा उद्देश्य उस इमारत में चूनिया लगाने का कदापि नही है;
जिसका कि गिरना अवश्यम्भावी है। हम चाहते हैं उस नवीन के निर्माण में सहायक
होना जिसका प्रादुर्भाव हो चुका है।"
छायावादी कवि पंत की ये पंक्तियाँ कला-साहित्य की सामाजिक भूमिका और
साहित्य की सामाजिक उपादेयता के संदर्भ में विशेष महत्त्व की हैं। आलोचकों
ने कला की भूमि पर प्रगतिवाद की भूमिका को छायावाद से श्रेष्ठ सिद्ध किया
है। प्रगतिवादी साहित्य की निर्विवाद मान्यता है कि सामाजिक,
आर्थिक,
परिवर्तनों के साथ-साथ साहित्य की भूमिका,
उसके प्रतिमान भी बदलते हैं। इसी धारणा और विश्वास के अनुरूप प्रगतिवादी
साहित्यकारों ने भाव,
प्रकार और
शैली में परिवर्तन किये थे।
महेन्द्र
जी उन रचनाकारों में नहीं हैं जो भावुकतावश नवीन के स्वागत में प्राचीन की
उपलब्धियों को नकारते हैं। उनकी दृष्टि अतीत,
वर्तमान और भविष्य पर भी टिकती है। वे इकहरे भाव-बोध के कवि नहीं हैं।
अभिव्यक्ति की अनेकानेक दिशाएँ उनकी कविताओं में दर्शनीय हैं। नये
काव्य-विवेक,
नये
भाव-बोध से युक्त महेन्द्र जी की कविताएँ जन-चेतना की व्यापक पीठिका पर
आधृत हैं। मुक्तिबोध,
शमशेर,
नागार्जुन,
मदन
वात्स्यायन,
विष्णुचंद्र शर्मा,
रणजीत,
राजीव सक्सेना जैस प्रगतिवादी कविता के प्रतिनिधि कवियों में
महेन्द्रभटनागर का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता की
प्रगतिशील धारा को भाव,
वस्तु और
शिल्प के स्तर पर नयी ऊँचाई प्रदान की तथा सामाजिक जीवन के बहुरंगी यथार्थ
को नया आधार और संदर्भ दिया।
कवि
महेन्द्र नवयुग का अग्रदूत,
नयी
व्यवस्था का निर्माता और नव जीवन का गायक है।
‘अभियान’
काव्य-कृति की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं
—
परिवर्तन
का आकांक्षी हूँ,
मंथन कर
सकता सागर का,
वह भीषण
आँधी हूँ जिससे कँपता वक्षस्थल अम्बर का,
मैं नवयुग
का अग्रदूत हूँ,
नयी
व्यवस्था का निर्माता,
मैं
नवजीवन का गायक हूँ,
साधक
अभिनव प्राणद स्वर का,
सजग
चितेरा;
नव समाज
को मैं चित्रित करने वाला हूँ!
मैं
विद्रोही कवि,
मैं नवयुग
को निर्मित करने वाला हूँ!
कहा जा
चुका है कि कवि महेन्द्रभटनागर इकहरे भाव-बोध के कवि नहीं हैं। उनकी
काव्य-दृष्टि किसी एक ही बिन्दु पर जाकर नहीं अटक जाती। कविताओं में जीवन
के साथ प्रकृति भी लगी चलती है। प्रकृति हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।
मनुष्य अपने भौगोलिक परिवेश की उपज है। भौगोलिक परिवेश की निर्माता प्रकृति
है। मनुष्य का खान-पान,
वेश-भूषा,
रहन-सहन,
सभ्यता-संस्कृति,
भाषा,
आचार-विचार सब-कुछ पर प्रकृति का प्रभाव है। प्राकृतिक व्यापारों का,
प्रकृति के विभिन्न रूपों का सभी कवियों ने भरपूर चित्रण किया है। निराला,
नागार्जुन,
मुक्तिबोध,
केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन की तरह उनके काव्य में भी वैविध्य है।
महेन्द्र जी को अपने देश,
समाज,
जनता,
पशु-पक्षी,
वृक्ष,
लता,
नदी,
वन,
पर्वत,
उपत्यका
सबसे उतना ही गहरा प्रेम और लगाव है। उनका मन जीवन-संघर्षों के साथ ही
प्रकृति में उतना ही रमता है। प्रकृति उनके काव्य-व्यक्तित्व की ऊर्जा है।
प्रकृति केवल मनुष्य का मनोरंजन नहीं करती। वह उसके जीवन का आधार है।
आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया है। प्रकृति से दूर
मनुष्य का जीवन अप्राकृतिक हो गया है।
हिन्दी
कविता में एक ऐसा भी दौर आया था जब यथार्थवाद के फेर में कवियों ने प्रकृति
को कविता से बहिष्कृत कर दिया था। यथार्थ और यथार्थवाद सम्बन्धी उनकी
अधकचरी,
अपरिपक्व
अवधारणा कविता का काफ़ी अनिष्ट कर चुकी थी। परन्तु यह स्थिति बहुत दिनों तक
नहीं रही। कवियों को पुनः प्रकृति की ओर लौटना पड़ा था। पुराने खेवे के
प्रगतिशील कवि नये प्रगतिशीलों की कमज़ोरी समझते थे। उन्होंने कभी भी यह भूल
नहीं की। निराला,
मुक्तिबोध,
नागार्जुन,
शमशेर,
केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रकृति विविध रूपों,
संदर्भों में उपस्थित है। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ प्रकृति की अनुपम
छटा का सुन्दर उदाहरण हैं।
महेन्द्रभटनागर भवानीप्रसाद मिश्र,
मुक्तिबोध,
हरिशंकर
परसाई के प्रदेश के कवि हैं। कविताओं में उन्होंने प्रकृति का भरपूर उपयोग
किया है। ‘अभियान’
काव्य-संग्रह की भूमिका में लिखा है,
"कविता
लिखने की प्रेरणा मुझे सर्वप्रथम प्रकृति से मिली। उत्तर मध्य-भारत के
वनाच्छादित गाँवों में खूब भटका हूँ। उस समय सातवीं कक्षा में पढ़ता था। तभी
से कविताएँ लिखने लगा था। इन कविताओं के विषय जंगल,
फूल,
वर्षा,
उषा आदि हुआ करते थे।"
मध्य-प्रदेश अपने घने जंगलों,
प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए विख्यात है। यहाँ के मेघों की अपनी निराली छटा
है। प्रेम-सौन्दर्य के अद्वितीय कवि कालिदास को
‘मेघदूतम्’
की
प्रेरणा यहीं से प्राप्त हुई थी।
प्रकृति
महेन्द्र जी की कविताओं को विस्तृत आयाम देती रही है। प्रकृति जीवन का
शृंगार करती है। कवि महेन्द्र प्रकृति से शक्ति और प्रेरणा प्राप्त करते
हैं। रीतिकालीन कवियों की तरह उनके काव्य में प्रकृति कामोद्दीपन का हेतु
नहीं। प्रगतिशील कवियों ने परम्परा से चले आ रहे प्राकृतिक बिम्बों,
प्रतीकों को नया संदर्भ,
नया आयाम
दिया है। केदार,
नागार्जुन,
महेन्द्रभटनागर ने प्रकृति को नये दृष्टिकोण से देखा है। प्रकृति का संघर्ष
मानव-जीवन के संघर्ष से एकमेक हो उठा है।
महेन्द्र
जी परम्परा के प्रगतिशील तत्वों को स्वीकारते हैं। परम्परा के नाम पर
उन्होंने रूढ़ियों,
अंधविश्वासों का विरोध किया है। उनकी कविता जीवन के सकारात्मक पक्षों को ले
कर चली है। वे निषेध के कवि नहीं हैं। युग के नये यथार्थ,
आधुनिकता का उन्होंने सर्वत्र स्वागत किया है। आधुनिकता के प्रगतिशील
तत्वों से कवि का कहीं भी विरोध नहीं है। परन्तु,
आधुनिकता के विकृत मूल्यों का कवि ने सदैव विरोध किया है। प्रगतिवाद द्वारा
निर्देशित नयी भाव-भूमि पर कवि दृढ़ता और विश्वास के साथ आगे बढ़ता है। कवि
की दृष्टि में संकीर्णता नहीं है। जीवन-विवेक और काव्य-विवेक में अद्भुत
वैचारिक संगति है। सत्य और विवेक का आग्रह कवि को कहीं बँधने नहीं देता।
परन्तु,
महेन्द्र
जी स्वच्छन्दतावादी कवि नहीं हैं। विवेक के साथ जीवन-सत्यों को स्वीकारते
हुए चलने वाले कवि हैं। छायावाद के कवि निराला भी स्वच्छन्दतावादी कवि थे;
परन्तु अराजकतावादी नहीं। निराला जी की तरह महेन्द्रभटनागर भी अराजकता को
प्रश्रय नहीं देते। निराला के पास एक प्रतिबद्ध जीवन-दृष्टि थी। वही
प्रतिबद्धता महेन्द्र जी में देखने को मिलती है। प्रतिबद्ध दृष्टि,
कवि को जगत से पलायन का मौक़ा नहीं देती। धरती उसे बार-बार अपनी ओर पुकारती
है और कवि धरती और धरती-पुत्रों की पुकार को कहीं भी अनदेखा नहीं करता। वह
धरती पर बार-बार आने,
बार-बार
विप्लव करने का संकल्प लेता है। महेन्द्र भटनागर संस्कृति के मोर्चे पर
अपराजेय योद्धा की तरह डटे रहते हैं। उनमें निराला का तेज और प्रेमचंद की
प्रतिबद्ध दृष्टि है।
जीवन और
यथार्थ की कठोर भूमि पर चलने वाला कवि गगन-विहारी कैसे हो सकता है।
प्रगतिशील जीवन-दृष्टि के साथ ही कविताएँ राष्ट्रीयता की भावनाओं से
ओतप्रोत हैं। राष्ट्र-प्रेम और लोक-चेतना कविताओं का धनात्मक पक्ष है।
प्रगतिशीलता और राष्ट्र-प्रेम ओढ़ा हुआ न हो कर संस्कारगत है।
हर बड़े
रचनाकार में उसका युग,
समय और
परिवेश संजीदगी के साथ उपस्थित रहता है। कविता शुद्ध कविता ही नहीं होती,
अपने समय का इतिहास भी होती है। कविता में इतिहास की तरह घटनाओं का
लेखा-जोखा नहीं होता। कविता भाव-जगत की वस्तु होती है;
पर
बुद्धि-तत्त्व को तिरस्कृत कर नहीं चलती कविता। आधुनिक कविता की तो यह ख़ास
विशेषता है। क्योंकि आधुनिक युग बौद्धिकता का युग है। आज की कविता इसीलिए
बौद्धिकता से पलायन नहीं करती। बौद्धिकता आधुनिक कविता का सर्वाधिक
महत्त्वपूर्ण पहलू है। प्रगतिशील कवियों ने भाव-तत्त्व के स्थान पर
बौद्धिकता को विशेष महत्त्व दिया है। आगे चल कर प्रगतिवादी कविता का यह एक
कमज़ोर पक्ष सिद्ध हुआ था। बौद्धिकता के शुष्क प्रवाह ने कविता को एक आयामी
बना दिया था। कविता नीरस,
उबाऊ और
बोझिल हो चली थी। बाद के कवियों ने इस कमी को पहचाना था। केदारनाथ अग्रवाल,
नागार्जुन,
त्रिलोचन
बहुत पहले से ही सजग थे। नागार्जुन की बाद की कविताओं में राजनीतिक पैनापन
अधिक देखने को मिला था। कारण उनका राजनीति से दिलचस्प सरोकार था। महेन्द्र
जी अपने समय की राजनीति और राजनीतिक विचार-धाराओं से बेख़बर कवि क़तई नहीं
हैं। परन्तु उनका राजनीतिक सरोकार कविताओं पर हावी नहीं होता। राजनीतिक
संचेतना के साथ ही कवि में काव्य-विवेक भी उतना ही प्रखर है। यही कारण है,
महेन्द्र जी की कविताओं में वे कमियाँ नहीं दिखतीं। फिर भी,
महेन्द्र जी मानते हैं कि वैचारिक उत्तेजना से परिपूर्ण सर्जनात्मकता ही
सार्थक तथा महत्त्व की होती है। कविता का दायित्व ही है अनुभूतियों,
विचारों,
विश्वासों
को वाणी देना।
महेन्द्रभटनागर की कविता का घोषित लक्ष्य है अनुभूतियों और विचारों को शब्द
देना। अनुभूतियाँ केवल निजी अर्थात् निजी जीवन की नहीं हैं। कवि के अनुभव
का दायरा बहुत विस्तृत है। अनुभूतियों और अनुभवों का संस्कार रचनाओं में
निरन्तर व्यापक तथा प्रौढ़ होता गया है। व्यापक जीवनानुभव ही कवि की
अनुभूतियों और संवेदनाओं को विस्तार देते हैं। महेन्द्र जी कविताओं में
परत-दर-परत ज़िन्दगी के अनुभवों को उघाड़ते गये हैं। वे किसी एक ही बिन्दु
पर टिकना नहीं जानते। कविताओं की भी यही विशेषता है। उनकी कविता बहुस्तरीय
तथा बहुआयामी है। प्रेम,
प्रकृति-वर्णन,
सौन्दर्य
के चित्रों के साथ ही कविताओं में आक्रोश,
बेचैनी,
विद्रोह
और विप्लव के तेवर भी दर्शनीय हैं। स्वाधीनता आन्दोलन,
आर्य-समाज के सुधारवादी प्रयासों का भी यथेष्ट प्रभाव है। कविताओं में
मुक्ति की चेतना रह-रह कर हिलोरें लेती है। आज़ादी के साथ ही कवि समाज की
बेहतरी के सपने भी देखता है। केवल राजनीतिक आज़ादी में कवि का विश्वास नहीं
है। आर्थिक,
सामाजिक
आज़ादी के बिना राजनीतिक आज़ादी लँगड़ी है। इसीलिए कवि राजनीतिक आज़ादी के साथ
सामाजिक आज़ादी पर भी उतना ही बल देता है। कवि की मुक्तिकामी चेतना कविता के
स्तर पर उसी तीव्रता और सघनता के साथ मनुष्य के मुक्तिकामी संघर्षों को धार
देती है।
महेन्द्र
जी इकहरे भावबोध के कवि नहीं हैं। अभिव्यक्ति की अनेकानेक दिशाएँ उनकी
कविताओं में मौज़ूद हैं। ज़िन्दगी के चैराहे पर खड़े होकर कवि ने अनेक तरह के
अनुभव प्राप्त किये हैं। अनुभव-विस्तार ही कविता को व्यापक व असरदार बनाता
है। शासकीय सेवा में कार्यरत रहने के फलस्वरूप कवि महेन्द्रभटनागर को
बार-बार स्थानान्तरणों से गुज़रना पड़ा। इससे उन्हें भ्रमण के अनेक अवसर
प्राप्त हुए। मध्य-प्रदेश के अनेक अंचलों की जनता के रीति-रिवाज़,
समाजार्थिक,
राजनीतिक
तथा सांस्कृतिक विशेषताओं और समस्याओं को गहराई से अध्ययन करने के अवसर,
इन
स्थानान्तरणों,
से उन्हें
अनायास प्राप्त हुए। चम्बल अंचल,
बुन्देलखण्ड और मालवा के लोक-जीवन को उन्होंने निकट से देखा है। अनुभव
काव्य को विस्तार देता है। मनुष्य एक सम्पूर्ण इकाई है। एक ही पक्ष जीवन को
प्रभावित नहीं करता। ठीक है,
कुछ समस्याएँ बुनियादी होती हैं;
जो
मनुष्य के नैतिक,
भौतिक और
सामाजिक जीवन को दूर तक
प्रभावित करती हैं। जिस रचनाकार में देश और समाज की समस्याओं का जितना
व्यापक तथा गहरा अनुभव होगा;
उसकी कृतियों में वह उसी व्यापकता और गहराई से अभिव्यक्त होगा। महेन्द्र जी
ऐसे ही रचनाकार हैं। जीवन-वास्तव तथा नये सौन्दर्य-बोध के विकास में उनकी
बड़ी भूमिका है। वर्तमान समाज-व्यवस्था कवि को अप्रासंगिक लगती है।
ग़ैर-बराबरी का समाज उसे रास नहीं आता। क्रांतिकारी परिवर्तन विप्लव के
माध्यम से ही सम्भव है।
उनकी
कविताओं में जगह-जगह विद्रोह के तेवर देखे जा सकते हैं। विद्रोह का स्वर
आंतरिक प्रेरणा का परिणाम है। परिवर्तन की आकांक्षा ज्ञानात्मक स्तर पर
कल्पनाओं को मूर्त एवं ठोस आकार देती है। महेन्द्र जी का चिन्तन विधायक तथा
कल्पना रचनात्मक है। कल्पना और भावना की भूल-भुलैया में कवि अपने लक्ष्यों
से नहीं भटकता।
आधुनिक
युग ने मनुष्य के भौतिक जीवन को एक तरफ़ आसान और मनोरंजक बनाया है;
वहीं दूसरी तरफ़ उसने नयी समस्याएँ भी उत्पन्न की हैं। ये समस्याएँ आधुनिकता
की समस्याएँ हैं। महेन्द्र जी ने आधुनिकता का स्वागत किया है। क्योंकि
वर्तमान युग में कोई भी समाज अनाधुनिक नहीं रह सकता। अनाधुनिक समाज प्रगति
की दौड़ में पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त है। कवि ने आधुनिकता की विसंगतियों पर
भी उतना ही नोकदार प्रहार किया है। वे परम्परा के साथ आधुनिकता के रुग्ण
पक्षों की भी भर्तस्ना करते हैं। परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्वों को भी
उन्होंने उजागर किया है। द्वन्द्व-बोध काव्य-प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।
द्वन्द्व प्रगति को सम्भव बनाता है। द्वन्द्व का चित्रण प्रगतिवादी काव्य
की प्रमुख विशेषता है। प्रगतिवाद द्वारा निर्देशित नयी भूमि पर महेन्द्र जी
विश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं। परन्तु,
उनकी दृष्टि में संकीर्णता नहीं है। कवि का काव्य-विवेक उसे कहीं बँधने
नहीं देता। उसमें निराला का तेज,
कबीर की फटकार और प्रेमचंद की प्रतिबद्धता है।
देश-प्रेम,
राष्ट्रीयता कविताओं का धनात्मक पक्ष है। महेन्द्र जी राष्ट्रवादी कवि हैं।
सजग काव्य-विवेक,
ऐतिहासिक
चेतना,
प्रतिबद्ध
जीवन-दृष्टि कविताओं का फलक-विस्तार करती है। वैचारिक उत्तेजना को कवि की
ज्ञानात्मक संवेदना ऊर्जा और ताप देती है।
प्रकृति
कवि की सर्जनात्मक चेतना का विधायक तत्त्च है :
उषा की
चमकती हुई
लाल
किरणें मिलेंगी,
नयी
ज्योति ऐसी
कि
हिल-हिल सरल नेह कलियाँ खिलेंगी!
व जीवन
हमारा बदलता चलेगा,
समुन्दर
हृदय का लहरता चलेगा!
कि आभा
सुनहरी
नयी
सृष्टि सारी
हमें फिर
प्रकृति
नव दमकती
दिखेगी,
सुखद भाव
सुन्दर
चमकती
दिखेगी !
प्रभात का
स्वागत कवि इन शब्दों में करता है:
रंगीन गगन
/ ऊँचे पर्वत / घाटी मैदान
कि फैला
है सुनसान !
हरे-हरे
अगणित पेड़ कतारों में / खड़े सघन
हिलते
पल्लव / प्रतिपल-प्रतिक्षण
बहता शीतल
मंद पवन !
रंगीन गगन
!
उपर्युक्त
पंक्तियों में कवि ने प्रकृति का उल्लासमय चित्रण किया है। प्रकृति न केवल
स्वयं उल्लसित है;
बल्कि
मानव-जीवन में भी हर्ष और उल्लास का संचार करती है। विश्व के सभी बड़े कवि
प्रकृति को साथ लेकर चले हैं। वाल्मीकि,
कालिदास,
तुलसीदास,
शेक्सपीयर,
वर्डस्वर्थ जैसे कवियों ने प्रकृति का मनोहारी वर्णन किया है। वर्डस्वर्थ
तो प्रकृति में परोक्ष सत्ता की उपस्थिति महसूस करता है। निराला,
पंत जैसे कवि प्रकृति से निरन्तर प्रेरणा ग्रहण करते रहे हैं। प्रकृति जीवन
का,
सृष्टि का
विधायक तत्त्व है। मुक्तिबोध,
भवानीप्रसाद मिश्र की कविताएँ प्रकृति की बहुरंगी छटाओं से युक्त हैं।
प्रकृति विप्लव,
विजय और
परिवर्तन का भी प्रतीक है। माखनलाल चतुर्वेदी,
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’,
रामधारी सिंह ‘दिनकर’
ने
प्रकृति के माध्यम से विप्लव का बिगुल बजाया था।
महेन्द्रभटनागर ने भी प्रकृति को क्रांतिकारी संदर्भों से जोड़कर देखा है।
नदी में ज्वार जन-जन की चेतना को उद्बुद्ध करता है। उत्ताल तरंगें जन-चेतना
के ज्वार और जन-विप्लव की प्रतीक हैं :
नदी में
ज्वार भर आया!
प्रलय
हिल्लोल ऊँची
व्योम का
मुख चूमने प्रतिपल उठी बढ़ कर !
किनारे
टूटते जाते
शिलाएँ बह
रही हैं साथ,
भू को
काटतीं... गहरी बनातीं
तीव्र गति
से दौड़ती जातीं अमित लहरें
नहीं हो
शांत,
आ कर एक
के उपरांत !
भर-भर बह
रही सरिता
कि मानों
लिख रहा कवि वेग से कविता-
बुलाता
क्रांति की घड़ियाँ,
भयंकर नाश
का सामान
जन-विद्रोह,
भीषण आग !
भावावेश-गति ले ज्वार भर आया !
नदी में
ज्वार भर आया !
वाम कविता
के सौन्दर्यशास्त्र के विरोधी आलोचकों की समस्त अवधारणाएँ महेन्द्र भटनागर
की कविताएँ निरस्त करती हैं। महेन्द्रभटनागर उन कुछेक महत्त्वपूर्ण
प्रगतिशील कवियों में हैं;
जिन्होंने
वाम कविता का नया सौन्दर्यशास्त्र रचा है। मुक्तिबोध,
शमशेर,
नागार्जुन,
केदारनाथ अग्रवाल,
त्रिलोचन
जैसे अग्रिम पंक्ति के कवियों की तरह महेन्द्र भटनागर जी ने वाम कविता के
सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमानों के साथ-साथ प्रगतिशील-जनवादी काव्य-धारा का
विकास भी किया है। मनुष्य और समाज के साथ-साथ प्रकृति भी महेन्द्र जी की
कविताओं में जीवन के साथ लगी चलती है। वाम कविता की विशेषता रही है कि वह
सुन्दर और श्रेष्ठ के साथ ही असुन्दर और कुरूप को भी साथ लेकर चलती है। वाम
कवियों की दृष्टि में महत्त्वहीन और तुच्छ कुछ भी नहीं है। किसान,
मज़दूर,
मेहनतकश,
औरतें,
समाज का
उपेक्षित-शोषित वर्ग सभी वाम कविता के दायरे में हैं। वाम कविता ने
उपेक्षितों-तिरस्कृतों को शीर्ष स्थान पर रखा है। श्रम में
—
श्रम-सीकर
में सौन्दर्य देखना वाम कवियों ने ही सिखाया। वाम कविता का यह नया
सौन्दर्य-शास्त्र है। मोहदत्त ने ‘हिन्दी
की वाम कविता का सौन्दर्य-शास्त्र’
शीर्षक निबंध में लिखा है, "इस
संसार में जो कुछ श्रेष्ठ तथा सुन्दर है और जो मनुष्य तथा समाज को
श्रेयस्कर है,
उस सबका
सरोकार वाम कविता से है और जो अकल्याणकारी,
निकृष्ट,
जघन्य तथा
निम्नतम है;
जो शोषण,
दमन एवं अन्याय से बावस्ता है,
जो
आदमी को पशुवत और आजीवन दासत्व के घेरे में बाँधता है,
उन
सबका विरोध-प्रतिरोध वाम कविता ही करती है और उस सबके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना,
जनमत तैयार करना तथा दुनिया भर के पीड़ित,
दलित और शोषितों को उनके
ख़िलाफ़ खड़े करने का काम भी वाम कविता ही करती है। वाम कविता रूढ़ियों को
तोड़ती है,
संस्कारों
को जन्म देती है,
परम्परा
को संरक्षण तथा संस्कृति को गति प्रदान करती है।"
प्रगतिशील
कविता ने न केवल रूढ़ियों को तोड़ा है;
अपितु परम्परा को नया आयाम भी दिया है। इससे पहले कला,
साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में इतने बड़े और व्यापक पैमाने पर ऐसा
दृष्टान्त संत-साहित्य को छोड़कर कहीं देखने को नहीं मिलता। छायावादी कविता
के दौर में यह कार्य निराला ने किया था।
‘कुकुरमुत्ता’,
‘झिंगुर
डर कर बोला’, ‘वह
तोड़ती पत्थर’, ‘महँगू
महँगा रहा’
जैसी
कविताएँ दृष्टव्य हैं। उपन्यासों और कहानियों के क्षेत्र में भी निराला
सबसे अलग खड़े हैं। वस्तुतः निराला का काव्य-साहित्य ऐसा चैराहा है जिससे हो
कर एक तरफ़ प्रगतिशीलता निकल जाती है तो दूसरी तरफ़ आधुनिकता,
एक
तरफ़ प्रयोगवाद निकल जाता है तो दूसरी ओर नयी कविता।
कविता का
यह बहुरंगी तेवर प्रगतिशील कविता की दूसरे उत्थान
के प्रमुख कवि महेन्द्रभटनागर में दर्शनीय
है। महेन्द्र जी की कविताओं का जन-चरित्र स्वरूप उनकी समस्त
काव्य-कृतियों में उभरा है। कथ्य और शिल्प के क्षेत्र में उन्होंने इस
दृष्टि से बड़ा काम किया है। अनन्त मौलिक उद्भावनाओं से परिपूर्ण है उनकी
कविताओं का संसार।
इतिहास-बोध को दुरुस्त करने के लिए कवि के पास इतिहास-दृष्टि का होना
आवश्यक है। इतिहास-दृष्टि के अभाव में कवि न आधुनिक बन सकता है,
न
प्रगतिशील। महेन्द्र जी ऐतिहासिक चेतना के कवि हैं। वे इतिहास को पुराण के
रूप में नहीं देखते। उनका प्रखर इतिहास-बोध उन्हें नयी दृष्टि प्रदान करता
है। प्रेमचंद की तरह महेन्द्र जी परम्परा की सामंतीय समझ पर निर्मम प्रहार
करते हैं। परन्तु परम्परा के प्रगतिशील तत्त्वों को उन्होंने कहीं भी नकारा
नहीं है। इतिहास,
परम्परा,
संस्कृति की उनकी समझ गहरे अध्ययन और जीवनानुभवों पर आधारित है। अपरिपक्व
हाथों में पड़कर परम्परा विकृत होती है। निरन्तर संस्कारित होते हुए संस्कार
को बदला जा सकता है।
मनुष्य के
भाव,
विचार,
संस्कार सब कुछ परिवर्तन के अधीन हैं। शाश्वत कुछ भी नहीं। विकास और संघर्ष
की जय-यात्रा में आधुनिक मानव वहीं नहीं खड़ा है जहाँ शताब्दियों पूर्व था।
भाव,
विचार,
संस्कार,
सौन्दर्य-संबंधी उसकी अवधारणा सब कुछ बदली है। कला के प्रतिमान,
नैतिकता संबंधी उसकी चेतना में भी व्यापक बदलाव आया है।
हम
सौन्दर्य की स्थिति वस्तु में ही स्वीकारते हैं। अगोचर,
अनिर्वचनीय में सौन्दर्य की स्थिति कहाँ?
उसे केवल (कुछ के अनुसार) अनुभव किया जा सकता है। संसार में जो कुछ भी
सुन्दर,
श्रेष्ठ
है वह मनुष्य-कृत अथवा प्रकृति की देन है। प्रकृति और पुरुष
—
दो ही
सत्य हैं;
शेष सब
अनुमान। प्रगतिशील कवियों ने मनुष्य,
समाज और प्रकृति को केन्द्र में रख कर ही अपना सौन्दर्य-शास्त्र रचा है।
‘ईश्वर
की अनुभूति का वर्णन’
कविता का
लक्ष्य नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक ने भी कविता को अध्यात्म से
बाहर ही रखा है।
जीवन केवल
संघर्ष ही नहीं है। उसमें प्यार,
मनुहार,
सौन्दर्य,
शृंगार के लिए भी पर्याप्त गुंजाइश है। जीवन सुख-दुख का,
हार-जीत का,
राग-विराग
का समुच्चय है। महेन्द्र जी की दृष्टि जीवन के सभी पक्षों पर गयी है। प्रेम,
रोमांस,
राग के
स्वर भी कविताओं में मौज़ूद हैं। मधुर-मोहक गीतों में भी कवि,
प्रेम के पथ पर,
उसी
उत्साह से चलता है।गीतों में सौन्दर्य के इंद्रधनुषी रंग अपनी निराली छटा
बिखेरते हैं :
जवानी लहर
कर जगी मुसकरायी
सिमटती-बिखरती चली पास आयी
बड़े
मान-मनुहार भी साथ लायी
सुमुखि!
अब स्वयं को न बरबस सँभालो!
नयी
चाँदनी में नहा लो,
नहा लो!
महेन्द्र
जी का काव्य-फलक व्यापक इसीलिए है कि उन्होंने हर रंग और तेवर की कविताएँ
लिखी हैं। संक्षेप में,
उनकी
कविताओं का रंग इंद्रधनुषी है। कविता उनकी किसी भी रंग की हो,
जीवन का रंग सबसे गाढ़ा,
गहरा और
चटकदार है। जो कवि प्रेम नहीं कर सकता;
वह
संघर्ष भी नहीं कर सकता। प्रेम —
संघर्ष और त्याग की शक्ति देता है।
प्रगतिशील
कवियों ने प्रेम और सौन्दर्य को व्यापक फलक पर चित्रित किया है। ग़लत आरोप
है कि प्रगतिशील और मार्क्सवादी कवियों को प्रेम के नाम पर उबकाई आती है;
तथा वे केवल हँसिया-हथौड़ा,
किसान-मज़दूर,
ग़रीबी-भुखमरी आदि को ही कविता का कर्म-धर्म-मर्म समझते हैं। प्रगतिवाद के
आरम्भिक दौर में यह आरोप लगा था। इसमें एक हद तक सच्चाई भी थी। परन्तु यदि
तत्कालीन स्थितियों-परिस्थितियों,
पर
दृष्टि डाली जाए तो इस भ्रम का निराकरण सहज ही सम्भव होगा।
प्रगतिशील
कविता का संघर्ष परम्परा से चले आ रहे सामंतीय-पूँजीवादी काव्य-मूल्यों और
प्रतिमानों से था। हमारे साहित्य के इतिहास ने उस दौर को देखा है जब कविता
दरबारों तक सिमटकर रह गयी थी। सारी प्रतिभा नायिका-भेद में ही उलझ कर रह
गयी थी। साहित्य लोक-जीवन से अलग-थलग पड़ गया था। कविता को केवल मनोरंजन की
वस्तु समझा जाता था। प्रगतिवादी रचनाकारों ने इस प्रवृत्ति का जमकर विरोध
किया। काव्य-साहित्य के पारम्परिक प्रतिमानों को अपदस्थ कर उसका संबंध
व्यापक लोक-जीवन से स्थापित किया गया। काव्य-साहित्य के ये प्रतिमान काफ़ी
हद तक मार्क्सवादी सौन्दर्य-शास्त्र और उसके प्रतिमानों से प्रभावित थे।
मार्क्सवादी रचनाकारों ने पश्चिम के काव्य-मूल्यों का भी घोर विरोध किया।
पूँजीवादी समाजों में छायी काव्य-साहित्य की
‘अवास्तविक
शून्य धारणाएँ’
क्रमशः
निरस्त होने लगी थीं। काव्य-क्षितिज पर साहित्य के प्रतिमानों का नया सूरज
चमकने लगा था। ‘चाँद
का मुँह टेढ़ा है’
काव्य-संकलन में गजानन माधव मुक्तिबोध ने पारम्परिक सौन्दर्य-मूल्यों पर
प्रश्न-चिन्ह लगा दिया था। मुक्तिबोध न केवल कविता;
बल्कि आलोचना के स्तर पर भी संघर्ष कर रहे थे।
‘एक
साहित्यिक की डायरी’
ने
साहित्य-जगत में तहलका मचा दिया था। कला और सौन्दर्य के प्रतिमानों की
दुनिया में एक हलचल-सी मच गयी थी। नयी कविता के कवियों में और भी प्रगतिशील
कवि थे। मुक्तिबोध का संघर्ष सबसे अलग था। काव्य और कला के संदर्भ में
प्रतिमानों को ले कर इतना बड़ा संघर्ष रचना और आलोचना के स्तर पर मुक्तिबोध
के अतिरिक्त किसी अन्य कवि ने नहीं किया है। मुक्तिबोध एक स्वतंत्र
मार्क्सवादी चिन्तक थे। मार्क्सवाद के समर्थक होते हुए भी वे जड़ता और
संकीर्णता से मुक्त थे। सौन्दर्य-बोध की मार्क्सवादी अवधारणाओं को जहाँ
उन्होंने स्पष्ट किया वहीं दूसरी ओर साहित्य-कला में आलोचना और मूल्यांकन
की समस्याओं से भी वे जूझते रहे थे।
जहाँ तक
कविता में आत्म-संघर्ष का प्रश्न है,
इसे कोई अस्वीकार नहीं करता;
परन्तु आत्म-संषर्घ,
आत्म-संघर्ष में अन्तर होता है। निराला,
मुक्तिबोध नागार्जुन,
शील,
महेन्द्र भटनागर जैसे कवियों ने भी आत्म-संघर्ष किया;
पर
वह भिन्न कोटि का है। भाववादी रचनाकारों का आत्म-संघर्ष बेहद वैयक्तिक
क़िस्म का होता है। निराला,
मुक्तिबोध,
नागार्जुन,
और
महेन्द्रभटनागर जैसे कवियों का आत्म-संघर्ष निजता और मोक्ष की भावना से
ग्रसित नहीं है। अज्ञेय,
धर्मवीर
भारती जैसे कवियों का आत्म-संघर्ष से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। निराला
की ‘वह
तोड़ती पत्थर’, ‘कुकुरमुत्ता’,
‘सरोज-स्मृति’,
‘राम
की शक्ति-पूजा’,
मुक्तिबोध
की ‘चाँद
का मुँह टेढ़ा है’, ‘ब्रह्मराक्षस’,
त्रिलोचन की ‘नगई
महरा’,
महेन्द्रभटनागर की ‘निवेदन’,
‘कश-म-कश’,
‘संधान’,
‘महत्त्वपूर्ण’,
‘अन्तर्ध्वन्सक’,
‘इतिहास
का एक पृष्ठ’ ‘परिणति’,
‘आज़ादी
का त्योहार’
आदि
अनेक-अनेक कविताएँ,
तथा
अज्ञेय की ‘कितनी
नावों में कितनी बार’, ‘हरी
घास पर क्षण भर’
का फ़र्क
ध्यान में रखना होगा। कोई इसलिए दुःखी है कि उससे प्रियतमा बिछुड़ गयी। किसी
को निजी जीवन के संताप आकुल-व्याकुल करते हैं,
कोई प्रेम में पराजित हो विरही बन गया। किसी का मन इसलिए आहत है कि पूरा
युग ही आहत है। आहत युग की व्यथा महेन्द्रभटनागर को व्यथित कर देती है।
निराला,
मुक्तिबोध,
नागार्जुन,
महेन्द्रभटनागर जैसे कवि समाज के दुःख के सामने अपने दुःखों का विसर्जन कर
देते हैं। ‘आहत
युग’
का कवि
महेन्द्र भटनागर परिस्थितियों से मुठभेड़ के लिए लोगों को जागते रहने का
संदेश देता है :
जागते
रहना,
जगत में
भोर होने तक !
छा रही
चारों तरफ़ दहशत
हो रही
इंसानियत आहत
वार सहना,
संगठित जन-शोर होने तक!
मुक्त हो,
हर
व्यक्ति कारा से
जूझना
विपरीत धारा से
जन-विजय
संग्राम के घनघोर होने तक!
मौत से
लड़ना,
नहीं थकना
अंत तक
बढ़ना,
नहीं
रुकना
हिंसकों
के टूटने कमज़ोर
होने तक!
यहाँ कवि
विपरीत धारा से घनघोर संग्राम के लिए लोगों को ललकारता है। कवि उस विशाल
जन-समुदाय का प्रवक्ता बन सामने आता है जो हर प्रकार से उपेक्षित,
पीड़ित और शोषित है। इस स्थिति से उबरने का एकमात्र रास्ता संघर्ष,
केवल संघर्ष है। इस संघर्ष में बहु-संख्यक वर्ग का कोई अहित होने का नहीं।
क्योंकि वह तो सर्वहारा है। सर्वहारा वर्ग के पास गँवाने के लिए कुछ नहीं
होता। कार्ल मार्क्स ने श्रमिक वर्ग के बारे में लिखा था कि पूँजीवाद के
विरुद्ध संघर्ष में श्रमिक वर्ग के पास गँवाने के लिए उसकी बेड़ियों के
अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सम्पत्ति पर आधारित समाज भेद-विभेद के सिद्धांत
पर टिका है। संचय शोषण-आधारित होता है। शोषण हर प्रकार की विषमता का कारण
है। कवि महेन्द्र ऐसी व्यवस्था पर खिन्न हैं। मनुष्य की हैसियत का बँटवारा
उन्हें पसंद नहीं। कवि कहता है :
करना होगा
नष्ट-भ्रष्ट
ऐसे
व्यक्ति को / ऐसे समाज को
जो
आदमी-आदमी के मध्य
विभाजन
में रखता हो विश्वास
अथवा
निर्धनता
चाहता हो रखना क़ायम।
समाज में
निर्धनता क़ायम रखने के मूल में सम्पत्ति-संचय की ही भावना है। संचय की
व्यवस्था पर टिका समाज वर्ग-भेद को जन्म देता है और वर्ग-भेद विषमता को।
ऐसे रक्त-पिपासु समाज का अंत ज़रूरी है।
‘रक्षा’
शीर्षक कविता में कवि के शब्द हैं :
देश की नव
देह पर
चिपकी
हुईं
जो अनगिनत
जौंकें-जलौकें,
रक्त-लोलुप / लोभ मोहित / बुभुक्षित
—
आओ,
उन्हें नोचें-उखाड़ें,
धधकती आग
में झोंकें!
ऐसे
विषमता भरे समाज में कोई कवि तटस्थ कैसे रह सकता है?
यह
तटस्थता किस काम की?
और ऐसा
साहित्य किस काम का?
लेनिन ने
इसीलिए ज़ोर दे कर कहा था — ‘हमारे
साहित्य और हमारी कला को लाखों-करोड़ों मेहनतकश लोगों की सेवा करनी चाहिए।’
प्रेमचंद,
लू शुन,
टालस्टाय किसी खेमे के नहीं थे। परन्तु उनका साहित्य उनके समाज का वस्तुगत
आकलन प्रस्तुत करता है। आज का रचनाकार इसीलिए तटस्थ या निरपेक्ष नहीं है।
उसकी सहानुभूति-सम्वेदना लाखों-करोड़ों मेहनतकश वर्ग के साथ है। प्रगतिशील
कवियों की यह पक्षधरता कला-साहित्य के नये प्रतिमानों की पक्षधरता है।
डॉ.
हरिचरण शर्मा ने अपनी सम्पादित समीक्षा-पुस्तक
‘सामाजिक
चेतना के शिल्पी कवि महेन्द्रभटनागर’
की
भूमिका में लिखा है, "एक
समय था जब कविता का स्वप्न-जगत हमें बाँधे रखता था और हम उन सपनों की छाँह
में बैठते भी थे,
डूबते भी
थे;
पर ऐसी
दुनिया की उम्र के वर्ष अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं। वे वर्ष हमने गिने
हैं या कहूँ कि गिन-गिन कर काटे हैं तो ग़लत नहीं होगा। आख़िर,
सपनों के रंगमहल में कोई कब तक ठहर सकता है?
ज़ाहिर है,
जब सपने
टूटते हैं तो वह दुनिया आपके सामने होती है जिसमें रहना और जीना नियति बन
जाती है। आप विवश हो जाते हैं उस धरती पर खड़े होने के लिए जो कहीं
सपाट-समतल है तो कहीं बेहिसाब खड्डों से पटी पड़ी है। वह स्थिति,
हमें जीवन की सच्चाइयों से जोड़ती हुई,
अनगिनत भ्रमों को तोड़ती हुई,
उन
मोड़ों पर ले जाकर छोड़ देती है;
जहाँ से आगे का रास्ता,
कठिनाई से
ही सही,
बनने
अवश्य लगता है। यह तो आम आदमी के साथ भी होता है;
पर
यही सब जब सर्जक के सामने आता है तो उसकी संवेदना के रंग बदलने लगते हैं;
उसकी सोच प्रश्निल मुद्रा धारण कर लेती है और उसकी आँखें इन सबको देखकर
गीली नहीं होती,
बल्कि एक
ऐसी चमक से भर उठती हैं जिसमें संघर्ष के रंग होते हैं,
जिजीविषा की झलक होती है तथा जैसे वे आँखें आगे का रास्ता तय करने के लिए
शक्ति जुटाती हैं। ऐसी चमक,
ऐसी
संघर्षशीलता,
ऐसी
जिजीविषा और उसी में उपजी शक्ति के कवि हैं महेन्द्रभटनागर।"
महेन्द्र जी की कविताएँ हमें स्वप्नों के संसार से हटाकर सत्य की पगडंडी पर
ले आती हैं। बेशक,
यह पगडंडी
सरल-सपाट न होकर ऊबड़-खाबड़ तथा काँटों से भरी है। महेन्द्रभटनागर रंगमहल के
कवि नहीं,
निराला की
तरह राग-विराग के कवि हैं। उनकी कविता ज़िन्दगी से प्यार भी करती है और
झगड़ती भी है। ग़लत होगा यह कहना कि उसमें विरासत के प्रति मोह नहीं है।
परम्परा और विरासत के प्रति उनमें उतना ही प्यार है;
परन्तु परम्परा और विरासत के प्रति उनकी दृष्टि जड़ न हो कर गतिशील है। जड़
व्यक्ति परम्परा का विनाश ही करता है,
उसे आगे नहीं बढ़ाता। महेन्द्र जी उन कवियों में हैं जिन्होंने परम्परा की
रक्षा के लिए संघर्ष करके उसे आगे बढ़ाया है।
परम्परा
एक विकासशील प्रक्रिया है। अतीत और परम्परा में सब कुछ ग्राह्य नहीं होता।
समय के बहाव में बहुत-कुछ,
जो
अप्रासंगिक,
जड़ तथा
प्रगतिविरोधी होता है,
बह जाता
है। जड़ तथा अप्रासंगिक हो चुके तत्त्वों को पुनः परम्परा में शामिल करने का
प्रयास उसे पीछे ले जाने का प्रयास है। विकास की प्रक्रिया गतिशील और
द्वन्द्वात्मक होती है। उसकी दिशा ऊर्ध्वमुखी होती है,
अधोमुखी नहीं। जैसा कि एक स्थल पर फ्रेडेरिक ऐंगेल्स ने कहा है
— "छोटी-से-छोटी
वस्तु से ले कर बड़ी-से-बड़ी वस्तु तक,
रेत के एक कण से ले कर सूर्य तक,
प्रोटिस्ट (जो कि प्रारम्भिक जीवाणु है) से लेकर मनुष्य तक,
सम्पूर्ण प्रकृति अस्तित्व में आने और अस्तित्व के समाप्त होने की गतिशील
प्रक्रिया में रहती है,
निरन्तर
प्रवाह,
गति और
परिवर्तन की स्थिति में रहती है।"
समाज तथा भौतिक जगत के विकास का भी इतिहास यही है। राष्ट्र और समाज को
स्थिर तथा जड़ बनाने वाली शक्तियों का विरोध भारत में राजनीतिज्ञों से अधिक
रचनाकारों ने किया है। प्रगतिवादी और जनवादी आन्दोलन की इसमें ऐतिहासिक
भूमिका रही है। महेन्द्रभटनागर प्रगतिशील आन्दोलन के दूसरी उठान के उन
महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में हैं जिन्होंने संस्कृति के साथ-साथ समाज के
उत्थान के लिए भरपूर प्रयत्न किया है। "सामाजिक प्रगति से प्रतिबद्ध कोई
भी लेखक या आलोचक,
जो तेज़ी
से बदलते हुए और प्रगति करते हुए समाज के प्रति अपने दायित्व को समझता है,
आधारभूत सामाजिक-राजनीतिक सवालों पर ठुलमुल समझौतावादी रवैया अख़्तियार करना
नहीं चाहेगा।"
ई॰ एस॰एस॰ नम्बूदिरिपाद का उपर्युक्त कथन महेन्द्र भटनागर जैसे कवि पर ठीक
लागू होता है। ‘जूझते
हुए’, ‘जीने
के लिए’, ‘आहत
युग’
जैसी
काव्य-कृतियों में कवि महेन्द्र अपने समय के आधारभूत सामाजिक-राजनीतिक
सवालों पर क्रांतिकारी नज़रिये से विचार करते हैं। कवि का यह चिन्तन किसी
बँधी-बँधायी लीक का शिकार नहीं,
बल्कि राष्ट्रीय परिवेश में व्याप्त जन-विरोधी तत्त्वों से जूझने के दौरान
अर्जित व्यापक अनुभवों का प्रतिफल है।
साहित्यकार राजनीतिज्ञ नहीं होता। परन्तु समाज में उसकी हैसियत किसी
राजनीतिज्ञ से बेशक बड़ी होती है। उसकी सोच में राजनीतिक अवसरवादिता नहीं
होती। राष्ट्र और जनता के प्रति उसके गहरे सरोकर उसे अवसरवादी होने से
बचाते हैं। सामाजिक रूपान्तरण व सांस्कृतिक नवोत्थान में साहित्य की
महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। निजतावादी रचनाकार साहित्य की सामाजिक भूमिका
को अस्वीकार करते आये हैं। शैली-विज्ञान और संरचनावादी आलोचक कविता में
शब्द और भाषा के अस्तित्व को ही स्वीकारते हैं। वे शब्द को अर्थ से तथा
भाषा को कथ्य और संवेदना से अलग कर देखते हैं। प्रगतिशील लेखक सदा से ही इन
मान्यताओं का विरोध करते रहे हैं। प्रगतिवादी साहित्यकार शब्द से अधिक अर्थ
तथा शैली से अधिक विषय-वस्तु को महत्त्व देते हैं।
आज देश के
सामने सबसे बड़ा संकट ‘सत्य’
के
उद्घाटन का है। ‘सत्य’
पार्टीगत हो गया है। हर राजनीतिक दल का अपना अलग सत्य है। वे किसी वस्तु का
आकलन वस्तुनिष्ठ ढंग से न कर पार्टी के नज़रिये से करते हैं। जो पार्टी की
नीति के विरुद्ध है वह ‘सत्य’
नहीं है। राजनीतिक चालों में ‘सत्य’
आवरण में ढका रहता है। किसी एक घटना पर विभिन्न राजनीतिक दल अपने चश्मे से
विचार करते हैं। राजनीति के तिलिस्म में
‘सत्य’
किसी कोने में दुबका रहता है। वहाँ किसी तथाकथित नेता की दृष्टि नहीं जाती।
सर्वेक्षण और खुर्दबीन से देखने पर भी वहाँ किसी की नज़र नहीं जाती।
‘सत्य’
को
उसके वास्तविक रूप में रचनाकार ही उद्घाटित करता है। लेखक के लिए ज़रूरी है
कि वह किसी पार्टी के नज़रिये से वस्तुओं को न देखे। लेखकों का इसीलिए तटस्थ
होना आवश्यक है। प्रेमचंद,
लुशुन
जैसे विश्व प्रसिद्ध लेखक किसी पार्टी से संबंधित नहीं थे। प्रगतिशील और
जनवादी लेखकों का पार्टी से जुड़ना आवश्यक नहीं। किसी भी राजनीतिक दल ने आज
तक कोई बड़ा लेखक पैदा नहीं किया। मार्क्सवाद या किसी जीवन-दर्शन में आस्था
रखना तथा पार्टी की सदस्यता दोनों अलग चीजें हैं। पार्टी से जुड़े अधिकांश
लेखक मीडियाकर होते हैं। महेन्द्रभटनागर में वैचारिक कूप-मंडूकता नहीं है।
बंधन और मुक्ति का द्वन्द्वात्मक सातत्य उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है।
विचार की
प्रक्रिया द्वन्द्वात्मक होती है। द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया रचनाकार को
गतिशीलता प्रदान करती है। संसार का तात्पर्य संचरण या गतिशीलता है;
जो
परिवर्तन को सम्भव करती है। बौद्ध-दर्शन में परिवर्तन की प्रक्रिया को
‘प्रतीत्य
समुत्पाद’
कहा गया
है;
जिसके
अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रति क्षण विनष्ट और उत्पन्न हो रही है। ऐसी स्थिति
में विचार कैसे स्थिर रह सकता है?
भौतिक जगत में होने वाले परिवर्तन मनुष्य के विचारों को प्रभावित करते हैं।
चेतना और बाह्य सत्ता का द्वन्द्व निरन्तर चलता रहता है। संवेदनशील होने के
नाते कवि का मानस बाह्य जगत की घटनाओं से प्रभावित होता रहता है।
नये-पुराने,
सत्य-असत्य का द्वन्द्व कवियों को अधिक प्रभावित करता है। उनका जाग्रत
विवेक सदा सत्य का पक्ष लेता है। सत्य की पक्षधरता ही लेखक को राजनीतिज्ञों
से अलग करती है। जिस पर किसी की दृष्टि नहीं जा पाती;
कवि उसे देख लेता है। इसीलिए वह स्रष्टा और दृष्टा दोनों है। ‘सत्य’
के
उद्घाटन की क्षमता सभी लेखकों में नहीं होती। पराश्रित और पार्टी से जुड़े
लेखक न अपने साथ न्याय करते हैं;
न
रचना और समाज के साथ। उनका सत्य खंडित;
इसलिए अपूर्ण होता है। चंद व्यक्तियों के जीवन का सत्य आम जनता का सत्य
नहीं होता। सीमित सत्य की तुलना में व्यापक सत्य का पक्ष अपेक्षणीय है।
भारतीय महाकाव्यों में सदा जीवन के व्यापक पक्ष पर बल है। जीवन की यह
व्यापकता लोक-जीवन से सम्पृक्ति पर निर्भर है।
‘रामायण’
और
‘महाभारत’
राम-रावण और कौरव-पांडव के युद्धों तक ही सीमित नहीं हैं।
‘इलियड’
और
‘ओडिसी’
(होमर)
की तुलना में इनका फलक काफ़ी व्यापक है। दोनों ही संस्कृति और जीवन-मूल्यों
के संघर्ष के महाकाव्य हैं। ‘रामायण’
में दो संस्कृतियों का तथा ‘महाभारत’
में जीवन-मूल्यों का संघर्ष है। ‘महाभारत’
का
निचोड़ ‘गीता’
है;
जो
कर्मवाद के सिद्धांत पर आधारित है। अध्यात्म को हटा देने पर भौतिकवादी
दृष्टि से ‘गीता’
विश्व का अन्यतम ग्रंथ है।
वर्ग-विभाजित समाज में जन-संस्कृति और अभिजन संस्कृति का फ़र्क करना ही
पड़ेगा। ऐसे समाज में पक्षधरता भी विभाजित होने के लिए बाध्य है। भारतीय
महाकाव्यों का लोक आज के वर्ग-विभाजित समाज का बहु-संख्यक वर्ग है। लेनिन
ने लिखा है, "साहित्य
और कला को लाखों-करोड़ों मेहनतकश लोगों की सेवा करनी चाहिए। सीमित वर्ग के
लिए रचा साहित्य जनता के हित में नहीं हो सकता। ऐसा साहित्य हमारी परम्परा
को विकसित नहीं कर सकता और न ही वह धरोहर का रूप ले सकता है। साहित्यकार को
अतीत काल से चली आ रही अपनी समृद्ध परम्परा का अनुसरण करते हुए,
उसके प्रगतिशील तत्त्वों को पचाते हुए,
नयी विषय-वस्तु,
नये रूप
और नये शिल्प के द्वारा साहित्य का पुनः संस्कार करना चाहिए। क्योंकि
कला-साहित्य जन-जीवन के प्रतिबिम्बों की उपज होता है।"
कहना न होगा कि प्रगतिशील और जनवादी रचनाकारों ने ही वास्तव में साहित्य को
उसकी सीमित भूमिका से मुक्त किया है। नयी विषय-वस्तु,
नये शिल्प,
नये रूप
के द्वारा साहित्य को लोक के जीवन से जोड़ने का कार्य
‘प्रगतिशील
लेखक संघ’
के
स्थापना-काल से आन्दोलनात्मक स्तर पर शुरू हुआ था।
महेन्द्र
जी की कविताओं में परिवर्तन की आकांक्षा जितनी बलवती है;
परम्परा के गतिशील तत्त्वों को आत्मसात करते हुए उसे और अधिक समृद्ध करने
पर भी उतना ही बल है। लोक से जुड़े बिना लेखन-कर्म सार्थक नहीं हो सकता।
निराला और
मुक्तिबोध की तरह
महेन्द्रभटनागर भी सामूहिक मुक्ति स्वीकारते हैं। देश का वैभव कुछेक हाथों
में सिमट कर रह जाये तो उससे लोक-हित के मार्ग अवरुद्ध हो जाएंगे। लोक-हित
में ही समाज की मुक्ति निहित है। महेन्द्र जी लिखते हैं :
उठो,
पीड़ित-तिरस्कृत
आज
युग-युग के सभी मानव!
जगाता है
तुम्हें नूतन जगत का अब नया यौवन!
अमर हो
क्रंति! मानव-मुक्ति की नव-क्रांति!
भारतीय
समाज शताब्दियों से जकड़ा रहा है। सामन्तवाद का यह विशेष लक्षण है कि वह
परिवर्तन से कतराता है। यथास्थितिवाद परिवर्तन का विरोधी है। सामन्तीय समाज
यथास्थितिवादी होता है। भारतीय समाज के पिछड़े रह जाने का एक बहुत बड़ा कारण
उसका कूप-मंडूक बने रह जाना है। प्रगतिवादी कवियों ने समाज की जड़ता पर पहली
बार जम कर प्रहार किया था। भले ही अनेकों को यह बात चैंकाने-भड़काने वाली
क्यों न लगी हो। सभी जानते हैं कि क्रांतिकारी परिवर्तनों के बिना बुनियादी
बदलाव सम्भव नहीं। परिवर्तन की इस प्रक्रिया में बहुत-कुछ टूट-फूट जाता है;
पीछे छूट जाता है। परन्तु,
नये सिरे
से सृजन के लिए नये वातावरण का होना ज़रूरी है। नव-निर्माण की यह अनिवार्य
पृष्ठभूमि है। महेन्द्र जी के शब्दों में :
राह
—
जिस पर
कंटकों का जाल,
तम का
आवरण है,
राह
—
जिस पर
पत्थरों की राशि,
अति
दुर्गम विजन है,
राह
—
जिस पर बह
रहा है टायफ़ूनी - स्वर प्रभंजन,
राह
—
जिस पर
गिर रहा हिम मौत का जिस पर निमंत्राण,
मैं उसी
पर तो अकेला दीप बन कर जल रहा हूँ!
मैं
निरन्तर राह नव-निर्माण करता चल रहा हूँ!
नव-निर्माण का कार्य सरल नहीं होता। अनेक बाधाएँ,
अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं। चुनौतियों का सामना किये बिना आगे की राह
तय नहीं की जा सकती। यह जोखिम भरा दायित्व है। परन्तु,
जो
नयी राह बनाना चाहते हैं;
उन्हें यह
जोखिम उठाना पड़ता है।
आधुनिक
भाव-बोध के बिना आधुनिक नहीं बना जा सकता। केवल विज्ञान और तकनीक के सहारे
आधुनिकता सम्भव नहीं। भारतीय समाजों की एक विडम्बना यह भी रही है कि हम एक
तरफ़ सामंतवादी मूल्यों को छोड़ना नहीं चाहते;
दूसरी तरफ़ आधुनिक भी बने रहना चाहते हैं। सामाजिक अन्तर्विरोधों का यही
कारण है। आधुनिकता कोई अवधारणा नहीं;
प्रक्रिया है। आधुनिकता के भी दो रूप हैं
—
व्यक्तिवादी आधुनिकता और सामूहिक आधुनिकता। अपनी प्रक्रिया में आधुनिकता
समष्टिगत है। समाज को आधुनिक बनाये बिना,
व्यक्ति-स्तर की आधुनिकता का कोई अर्थ नहीं। इसीलिए आधुनिकता कोई खंड चेतना
नहीं है। परस्पर संघर्षरत सामाजिक शक्तियों के संदर्भ में आधुनिकता पर बात
की जा सकती है। आधुनिक अर्थ-व्यवस्था,
राजनीतिक,
सांस्कृतिक तथा सामाजिक संरचना के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों की
प्रक्रिया है;
जिसमें
विज्ञान,
तकनीक,
प्रायोगिकी और संचार-माध्यमों की अहम भूमिका है। समाज का बहु-संख्यक
श्रमजीवी वर्ग इसमें भी कारक भूमिका निभाता है। क्योंकि वास्तव में इसका
चरित्र ही राष्ट्रीय है। भारतीय आधुनिकता शहर-केन्द्रित है। भारत का
नागर-वर्ग,
पश्चिम की
समस्त विकृतियों का शिकार है। इसकी जड़ें न अपने देश में हैं,
न
विदेश में। यह त्रिशंकु मानसिकता का दोगला वर्ग है। कला,
साहित्य,
संस्कृति
इसके लिए शग़ल की वस्तुएँ हैं। यह वर्ग संस्कृति को शो-पीस समझता है। भारत
के शहर और शहरों में रहने वाला पॉप-संस्कृति का क़ायल अभिजात-वर्ग भारत की
देशज संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता;
कर
भी नहीं सकता। हमें जन-संस्कृति और अभिजन-संस्कृति में फ़र्क करना ही पड़ेगा।
यह फ़र्क बुनियादी है। हिन्दी के रचनाकारों का एक वर्ग आधुनिकतावादियों का
है;
जो
वैयक्तिकता की बाढ़ में अभिजन-संस्कृति का समर्थक है। महेन्द्रभटनागर जैसे
कवियों ने अभिजन-संस्कृति की तुलना में सदा जन-संस्कृति का पक्ष लिया है।
जन-संस्कृति की यह पक्षधरता ही उन्हें लोक-मानस के क़रीब ले जाती है। उनकी
काव्य-धारा जीवन की ऊबड़-खाबड़ राहों को पार करती पर्वतों-चट्टानों से टकराती
लोक-सागर में जा मिलती है। सरिता का उद्गम कहीं से भी हो,
उसकी सार्थकता सागर में मिल जाने में ही है। प्रगतिवादी काव्य उत्स से अधिक
उद्देश्य पर बल देता है।
महेन्द्रभटनागर अँधेरे से उजाले के कवि हैं। अँधेरे में भटकना या अपने
पाठकों को अँधरे में भटकाना कवि का उद्देश्य नहीं है। प्रेम-रोमांस से कवि
को क़तई परहेज़ नहीं। फिर भी वे केवल प्रेम,
सौन्दर्य और रोमांस के कवि नहीं हैं। मन के अन्तर्प्रदेशों की यात्रा
करना-कराना भी उनका उद्देश्य नहीं। उनकी कविताओं में बहिर्जगत के प्रश्न
बार-बार उभरते हैं। बाह्य जगत में जहाँ इतना तनाव,
दुराव,
वैषम्य,
घृणा और संघर्ष हो,
वहाँ कवि
तटस्थ कैसे रह सकता है?
अस्तित्वगत प्रश्न कवि के मानस को भीतर-बाहर से मथते रहते हैं। कवि-आलोचक
डॉ. रमाकान्त शर्मा ने उनके बारे में लिखा है,
"महेन्द्रभटनागर
एक ऐसे कवि का नाम है जो जीवन-समुद्र की लहरियों को दूर खड़ा तटस्थ भाव से
निहारता भर नहीं;
वरन् बिना
नाव-पतवार के समुद्र में कूद पड़ता है। अपने हाथों के बल समुद्र की गहराई और
विस्तार को माप लेता है। सतत संघर्ष और मानवीय सोच ने इस कवि की कविताओं को
धारदार बनाया है। प्रामाणिक अनुभूति और लेखकीय ईमानदारी का ढोल पीटने वालों
से सर्वथा अलग अपनी रचनाधर्मिता को सजग और सचेत बनाये रखना बहुत मुश्किल
काम है;
लेकिन
महेन्द्रभटनागर ने इस मुश्किल को आसान बनाया है। इनकी कविताएँ धरती से उगी
हैं। इसलिए उनमें पौधों की हरियाली,
फूलों का सौन्दर्य,
माटी की
महक,
झरनों का
चांचल्य,
हवाओं की
थरथराहट और पक्षियों का कलरव बड़े ही आत्मीय रिश्ते बनाता है।" मानवीय सोच
कवि की संवेदना का विस्तार करती है :
भाग्य से
अथवा जगत से
हर
प्रताड़ित व्यक्ति को
आजन्म
संचित स्नेह मेरा
है
समर्पित !
कहा जा
चुका है कि महेन्द्र जी उजाले के कवि हैं। जीवन के प्रति गहरी आस्था ही कवि
में उजालों का स्वप्न बुनती है। दृष्टव्य हैं निम्नांकित पंक्तियाँ :
अँधेरा दो
/ पराजय का अँधेरा दो
निराशा का
सघन-गहरा अँधेरा दो!
पर,
विजय की आस मत छीनो,
सुबह की
साँस मत छीनो !
नये संसार
के सुख-साध्य सपनों के सहारे
करुण जीवन
बिता लेंगे,
अभावों से
भरा जीवन बिता लेंगे !
जीवन-पथ
झंझावातों से भरा होता है। एकरसता उबाऊ होती है। ऊबड़-खाबड़ पथ को
सफलतापूर्वक पार करने वाले ही जीवन का मर्म समझते हैं। जीवन की
सरसता-नीरसता का भाव उन्हें ही होता है। किनारे पर बगुलों की तरह बैठे रहने
वाले जीवन का वास्तविक स्वाद नहीं ले पाते। जीवन में निराशा के बाद आशा,
संघर्ष के बाद विजय होना आवश्यक है। आशा-निराशा,
सुख-दुख,
संघर्ष-विजय जीवन के अनिवार्य पहलू हैं। मनुष्य सपनों के सहारे जीता है।
सपने भविष्य का निर्माण करते हैं :
सपने आदमी
को
मुसकराहट
- चाह देते हैं,
आँसू - आह
देते हैं !
हृदय में
भर जुन्हाई-ज्वार,
जीने की
ललक उत्पन्न कर,
पतझार को
मधुमास के रंगीन चित्रों का
नया उपहार
देते हैं !
यह युग
घनघोर विपरीत स्थितियों का युग है। आधुनिक युग ने जहाँ मनुष्य-जीवन को
भौतिक दृष्टि से सरल व आकर्षक बनाया है;
वहीं उसने अनेकानेक जटिलताएँ उपस्थित की हैं। विज्ञान और प्रायोगिकी ने
जीवन को यंत्रवत् बना दिया है। सामाजिक विषमता और आर्थिक असमानता बढी है।
अमृत के साथ विष की कड़वाहट भी है। महेन्द्रभटनागर की कविताएँ वर्तमान युग
की त्रासदी कड़वाहट,
विसंगतियों पर रह-रह कर प्रहार करती हैं। महेंद्र जी प्रतिबद्ध जीवन-दृष्टि
के साथ ही आशा और विश्वास के कवि हैं। प्रतिबद्धता वैचारिक ही नहीं होती।
लोक से गहरा लगाव कवि को प्रतिबद्ध होने के लिए बाध्य करता है। प्रतिबद्धता
लोक-सम्पृक्ति का प्रतिफल है। लोक का दुख-दर्द कवि-चिन्ता का केन्द्र है।
वह सामाजिक विषमता और वर्ग-वैषम्य के स्थान पर सामाजिक न्याय व समानता की
स्थापना चाहता है। उनकी कविताओं में नव-निर्माण का संकल्प और सुनहरे भविष्य
की परिकल्पना सर्वत्र मुखर रही है।
‘संवर्त’
काव्य-कृति मे डा॰ लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय ने लिखा है,
"अंधकारमय
दुनिया में कवि प्रतिबद्ध है हर व्यक्ति का जीवन समुन्नत करने के लिए। वह
संसार में न्याय की व्यवस्था करना चाहता है। इस त्रस्त दुनिया को बदल डालने
के लिए वह सन्नद्ध है"
—
हर
व्यक्ति का जीवन समुन्नत कर
धरा को
मुक्त शोषण से करेंगे,
वर्ग के
या वर्ण के अन्तर मिटा कर
विश्व
जन-समुदाय को
हम मुक्त
दोहन से करेंगे !
उपर्युक्त
पंक्तियों से स्पष्ट है कि कवि की संवेदना केवल अपने राष्ट्र और समाज तक
सीमित नही है। अपनी वैश्विक चेतना में कवि विश्व को समेट लेता है।
मार्क्सवाद के अध्येताओं से यह तथ्य छिपा नही है कि मार्क्सवाद मात्
राजनीति और अर्थशात्र का दर्शन नहीं है। मार्क्सवाद एक विश्व मानव-दर्शन है;
जो
समष्टि को ले कर चलता है। इसी वैश्विक चेतना ने उसे विश्व-स्तर पर
प्रतिष्ठापित किया है। मार्क्स के इस दर्शन से प्रेरणा लेते हुए कवि,
वैश्विक स्तर पर,
शोषण और
असमानता का मूलोच्छेद चाहता है। ‘संवर्त’
आत्मगत और वस्तुगत दानों प्रकार की कविताओं का संकलन है। कवि को
‘तिघिरा
की एक शाम’
में जहाँ
कांीवरम् की साड़ी के फैलाव की याद आती है;
तो
दूसरी तरफ़ ‘आस्थाओं
के शिखर’
बिखर जाने
पर वह उतना ही क्षुब्ध नज़र आता है
—
विनाशक
आँधियों के वेग से
विचलित
किये
उन्नत
गगन-चुम्बी
हमारी लौह
आस्था के शिखर !
नैतिकता
का संकट आधुनिक युग की त्रासदी का एक बड़ा संकट है। आधुनिक मनुष्य
जीवन-मूल्यों के प्रति आस्थाहीन होता जा रहा है। वह क्षणिक उपलब्धि पर
इतराता फिरता है। संतोष,
प्रेम,
भ्रातृ-भावना,
सह-अस्तित्व जैसे सद्गुणों का उसमें अभाव होता जा रहा है। नैतिक मूल्यों का
क्षरण बड़ी त्रासदी है। ‘आत्म-बोध’
शीर्षक कविता की निम्नांकित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं :
लघुता
प्रिय हमें हो,
रजकणों की
अर्थ-गरिमा से
सुपरिचित
हों / परीक्षित हों।
मरण-धर्मा
मृत्यु से
भयभीत क्यों हों ?
चेतना
हत-वेग क्यों हों ?
दुर्मना
हम क्यों बनें ?
सद्सद्
विवेचक
मूढ़ग्राही
क्यों बनें ?
जीवन में
यह आत्म-बोध ज़रूरी है। इस बोध के बिना मनुष्य आगे नही बढ़ सकता। कहते हैं
—
मनुष्य
जीवन बार-बार नही मिलता। यह अध्यात्म की बात हो सकती है;
परन्तु मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता से तो इंकार नहीं किया जा सकता।
महाभारतकार ने भी मनुष्य को इस संसार में सर्वश्रेष्ठ प्राणी घोषित किया
है। ऐसे श्रेष्ठ जीवन को कलह-ईर्ष्या-द्वेष में न गँवा कर,
उच्चतर जीवन-मूल्यों की उपलब्धि हेतु प्रयत्न करने चाहिए
—
क्योंकि :
एक दिन उड़
जायगा सब
फिर न
वापस आयगा !
जीवन
हमारा फूल हरसिंगार-सा
जो खिल
रहा है आज
कल झर
जायगा !
मानव-जीवन
हरसिंगार के फूल की तरह है। फूलना तथा मुरझा कर झर जाना प्रकृति का नियम
है। जीवन और जगत भी इस नियम के अधीन हैं। ‘जूझते
हुए’
काव्य-संकलन सन् 1972-76 तक की रचित कविताओं का संकलन है। जैसा कि शीर्षक
से स्पष्ट है;
इसमें
जुझारू तेवर की कविताएँ हैं;
जो
मनुष्य के जीवन-संघर्षों का दस्तावेज़ हैं। आत्मगत कविताएँ भी इस संकलन में
हैं। कवि ने उन संदर्भों को भी निजता की परिधि से हटा कर,
व्यापक फलक पर चित्रित किया है :
इस बीच
जीये किस तरह —
हम ही
जानते हैं !
कितना
भयावह था लहरता-उफ़नता-टूटता सैलाब
—
हम ही
जानते हैं !
अर्थ
: जीवन का —
जगत का
गूढ़ था जो
आज-तक
अब हम उसे
अच्छी तरह से
हाँ,
बहुत अच्छी तरह से जानते हैं !
असंख्य
परतों को लपेटे आदमी अब पारदर्शी है :
भीतर और
बाहर से उसे हम
सही,
बिलकुल सही पहचानते हैं !
आओ,
तुम्हें हाँफ़ते,
दम तोड़ते
तूफ़ान की
गाथा सुनाएँ !
जलती
ज़िन्दगी से जूझते इंसान की गाथा सुनाएँ !
सत्तर के
दशक में निराशा-अवसाद का माहौल —
जो
राजनीतिक विफलताओं का परिणाम था —
देश में बना था;
वह बाद के
वर्षों में निरन्तर गहराता गया था। साहित्यकारों पर इसकी तीव्र प्रतिक्रिया
हुई थी। राष्ट्र-व्यापी नक्सलवादी आन्दोलन इन्हीं विफलताओं की देन था।
नक्सल-आन्दोलन ने राजनीति के साथ-साथ कला-साहित्य को भी गहरे स्तर पर
प्रभावित किया था। इस आन्दोलन ने चारों तरफ हिंसा का विस्फोटक वातावरण
उत्पन्न कर दिया था। बहुत से गंभीरमना लेखक-चिन्तक भी इस आन्दोलन के प्रभाव
में आये थे। इस काल में परिस्थितियों से जूझना ही मनुष्य की जैसे नियति हो
गयी थी। महेंद्रभटनागर भले ही नक्सलवाद के प्रभाव में न आये हों,
किन्तु उनकी कुछ कविताएँ उस दौर की मानसिकता की उपज हैं। यथा
—
ज़िन्दगी
—
वीरान
मरघट-सी,
ज़िन्दगी
—
अभिशप्त,
बोझिल और एकाकी महावट-सी !
ज़िन्दगी
—
मनहूसियत
का दूसरा है नाम,
ज़िन्दगी
—
जन्मान्तरों के अशुभ पापों का दुखद परिणाम !
कभी-कभी
मनुष्य संघर्ष करते-करते ऊब जाता है। परिस्थितियों और परेशानियों की मार
उसे तोड़ देती है। वह निराश और हताश हो जाता है। व्यर्थता और जीवन के प्रति
निस्सारता का बोध उसे धर दबोचता है। उपर्युक्त पंक्तियाँ कुछ ऐसे ही
मनोभावों का संकेत देती हैं। कवि का यह स्थायी भाव नहीं है। इसे संचारी भाव
के रूप में ही देखना चाहिए। ‘प्रतिरोध’,
‘पतन’,
‘विश्वस्त’,
‘जनवादी’,
‘श्रमजित’,
‘सर्वहारा
का वक्तव्य’
जैसी
कविताएँ जुझारू मानसिकता की हैं। ‘जीने
के लिए’
काव्य-संकलन में सन् 1977-86 तक की कविताएँ संगृहीत हैं। ये कविताएँ भी कवि
की भिन्न मनोदशा और मानसिकता का संकेत हैं। इन्हें अस्तित्ववादी चेतना की
कविताएँ कहा जा सकता है। परन्तु ये
‘नयी
कविता’
के
अस्तित्ववाद से भिन्न हैं। इनमें व्यक्ति का रोना-धोना अथवा निजता की पीड़ा
का इज़हार नहीं है। ‘आतंक
के घेरे में’, ‘धर्मयज्ञ’,
‘अग्नि-परीक्षा’,
‘दरिद्रनारायण’,
‘माहौल’,
जैसी कविताएँ अपने समय के गहरे सामाजिक सरोकारों का अहसास कराती हैं।
महेन्द्र
भटनागर की काव्य-यात्रा स्वाधीनता-पूर्व भारत से शुरू होकर
‘नयी
कविता’
और
समकालीन कविता के व्यापक परिदृश्य को
समेटते हुए चलती है। यह काल-खंड व्यापक विभिन्नताओं और विविधताओं से
भरा हुआ है। विगत पचास-साठ वर्षों में भारत और सम्पूर्ण विश्व में
क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। बीसवीं शताब्दी उपलब्धियों और हलचलों से भरी
शताब्दी रही है। अकेले भारत में अनेकानेक परिवर्तन हुए हैं। इनका इतिहास
रोचक और दिलचस्प है। हिन्दी में बहुत कम ऐसे कवि हैं;
जिनकी कृतियों के माध्यम से स्वाधीनता-पूर्व और बाद के राजनीतिक तथा
सांस्कृतिक घटनाओं का जायज़ा लिया जा सकता है। बेशक,
महेंद्रभटनागर एक ऐसे कवि हैं;
जिनकी रचनाओं में समय और इतिहास की धड़कनों को सुना जा सकता है।
[इस बीच
महेंद्रभटनागर जी निम्नलिखित काव्य-कृतियाँ और प्रकाशित हुईं
— 'अनुभूत-क्षण',
'मृत्यु-बोध
: जीवन-बोध', 'राग-संवेदन'।] |
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