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05.03.2012
 
जनतंत्र-आस्था
डॉ. महेंद्र भटनागर

जनतंत्र के उद्घोष से गुंजित दिशाएँ !
        -  आज जन-जन अंग शासन का,
                 बढ़ गया है मोल जीवन का,
                      स्वाधीनता के प्रति समर्पित भावनाएँ !
अब नहीं तम सर उठाएगा,
ज्योति से नभ जगमगाएगा,
उद्देश्य-प्रेरित दृढ़ हमारी धारणाएँ ।
            मूक होगी रागिनी दुख की,
                  मूर्त होगी कामना सुख की,
                       अब दूर होंगी हर तरह की विषमताएँ!


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