जनतंत्र के उद्घोष से गुंजित दिशाएँ ! -
आज जन-जन अंग शासन का, बढ़ गया है मोल जीवन का, स्वाधीनता के प्रति समर्पित भावनाएँ !
अब नहीं तम सर उठाएगा, ज्योति से नभ जगमगाएगा,
उद्देश्य-प्रेरित दृढ़ हमारी धारणाएँ । मूक होगी रागिनी दुख की, मूर्त होगी कामना सुख की, अब दूर होंगी हर तरह की विषमताएँ!