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| 02.17.2008 |
| होली डॉ. महेंद्र भटनागर |
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नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली,
उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली ! आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली, छायी निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली ! रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली, अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली ! उर में बरबस आसव री ढाल गयी होली, देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली ! स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली, हो कर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली ! |
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