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| 01.17.2009 |
| गणतंत्र-स्मारक डॉ. महेंद्र भटनागर |
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गणतंत्र -दिवस की स्वर्णिम किरणों को मन में भर
लो !
आलोकित हो अन्तरतम, गूँजे कलरव - सम सरगम, गणतंत्र-दिवस के उज्ज्वल भावों को मधुमय स्वर दो ! आँखों में समता झलके, स्नेह भरा सागर छलके, गणतंत्र -दिवस की आस्था कण-कण में मुखरित कर दो ! पशुता सारी ढह जाये, जन-जन में गरिमा आये, गणतंत्र-दिवस की करुणा-गंगा में कल्मष हर लो |
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