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| 08.17.2008 |
| आज़ादी का त्योहार डॉ. महेंद्र भटनागर |
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लज्जा ढकने को
मेरी खरगोश सरीखी भोली पत्नी के पास नहीं हैं वस्त्र, कि जिसका रोना सुनता हूँ सर्वत्र ! घर में, बाहर, सोते-जगते मेरी आँखों के आगे फिर-फिर जाते हैं वे दो गंगाजल जैसे निर्मल आँसू जो उस दिन तुमने मैले आँचल से पोंछ लिए थे ! मेरे दोनों छोटे मूक खिलौनों-से दुर्बल बच्चे जिनके तन पर गोश्त नहीं है, जिनके मुख पर रक्त नहीं है, अभी-अभी लड़कर सोये हैं, रोटी के टुकड़े पर, यदि विश्वास नहीं हो तो अब भी तुम उनकी लम्बी सिसकी सुन सकते हो जो वे सोते में रह-रह कर भर लेते हैं ! जिनको वर्षा की ठंडी रातों में मैं उर से चिपका लेता हूँ, तूफ़ानों के अंधड़ में बाहों में दुबका लेता हूँ ! क्योंकि, नये युग के सपनों की ये तस्वीरें हैं ! बंजर धरती पर अंकुर उगते धीरे-धीरे हैं ! इनकी रक्षा को आज़ादी का त्योहार मनाता हूँ ! अपने गिरते घर के टूटे छज्जे पर कर्ज़ा लेकर आज़ादी के दीप जलाता हूँ ! अपने सूखे अधरों से आज़ादी के गाने गाता हूँ ! क्योंकि, मुझे आज़ादी बेहद प्यारी है ! मैंने अपने हाथों से इसकी सींची फुलवारी है ! पर, सावधान ! लोभी गिद्धो ! यदि तुमने इसके फल-फूलों पर अपनी दृष्टि गड़ाई, तो फिर करनी होगी आज़ादी की फिर से और लड़ाई ! |
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