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ISSN 2292-9754

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05.04.2016


नज़र में रौशनी है

नज़र में रौशनी है
वफ़ा की ताज़गी है

जियूँ चाहे मैं जैसे
ये मेरी ज़िंदगी है

ग़ज़ल की प्यास हरदम
लहू क्यों माँगती है

मिरी आवारगी में
फ़क़त तेरी कमी है

इसे दिल में बसा लो
ये मेरी शा'इरी है


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