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ISSN 2292-9754

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06.01.2016


नज़र को चीरता जाता है मंज़र

नज़र को चीरता जाता है मंज़र
बला का खेल खेले है समन्दर

मुझे अब मार डालेगा यक़ीनन
लगा है हाथ फिर क़ातिल के खंजर

है मक़सद एक सबका उसको पाना
मिल मस्जिद में या मंदिर में जाकर

पलक झपकें तो जीवन बीत जाये
ये मेला चार दिन रहता है अक्सर

नवाज़िश है तिरी मुझ पर तभी तो
मिरे मालिक खड़ा हूँ आज तनकर


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