महावीर उत्तरांचली

दीवान
आपने क्या कभी ख़याल किया
आपको मैं मना नहीं सकता
काश! होता मज़ा कहानी में
ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश की घुट्टी
चढ़ा हूँ मैं गुमनाम उन सीढ़ियों तक
जां से बढ़कर है आन भारत की
जो व्यवस्था भ्रष्ट हो
तलवारें दोधारी क्या
तसव्वुर का नशा गहरा हुआ है
तीरो-तलवार से नहीं होता
दिल मिरा जब किसी से मिलता है
दिल से उसके
नज़र को चीरता जाता है मंज़र
नज़र में रौशनी है
फ़न क्या है फ़नकारी क्या
बड़ी तकलीफ़ देते हैं ये रिश्ते
बाज़ार मैं बैठे मगर
बीती बातें याद न कर
यूँ जहाँ तक बने
रेशा-रेशा, पत्ता-बूटा
साधना कर यूँ सुरों की
सोच का इक दायरा है
हार किसी को भी स्वीकार नहीं होती
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