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| 08.20.2007 |
| यादों के नग़मे महावीर शर्मा |
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वो लम्हे विसाल के, अश्क-ए-रवाँ में बह गये क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ए-ग़म सह गये। यूँ तो तेरा हर लम्हा, यादों के नग़मे बन गये वो ही नग़मे साज़े-ए-ग़म पर, गाते गाते रह गये। जब मिले वो, रुक गया जज़्बातों का इक कारवाँ इज़्हार-ए-ग़म न हो सका, हम और ही कुछ कह गये। दो ही क़दम बस दूर थे, मंज़िंल को जाने क्या हुआ फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-ए-क़दम ही रह गये। पूछते हैं रास्ते, आँखों में आँसू देख कर अब कहाँ है हमसफ़र, तुम क्यों अकेले रह गये। दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गये। दीदार हो जाता कभी ख़्वाब में तस्वीर का नींद क्यों आती नहीं, ये भी सहारे रह गये।। |
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