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| 08.20.2007 |
| वो लम्हे ! महावीर शर्मा |
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चश्म है पुरनम मैं शब-ए-ग़म गुज़ारता हूँ, जज़्बात के तूफ़ान में तुझ को पुकारता हूँ । पूछो न अश्क मेरे, आतिशी दरिया है ये, सिला निगाहे क़हर का तेरी मिला है ये, ज़ख़्मे दिल शग़ुफ्ता बार बार उभारता हूँ। ज़िंन्दगी के वो लम्हे, यादों से निखरे हुए, ले रहा था हाथ में कि ज़ुल्फ़ वो बिखरे हुए, गेसू न तेरे, ज़िंन्दगी अपनी सँवारता हूँ। अब तो उन से कोई उम्मीद-ए-वफ़ा नहीं है, दिल को ज़ख़्म देना, क्या इन्तहा नहीं है, उम्मीदवार बन तुझे फिर भी पुकारता हूँ। बर्क़ अब तकलीफ़ न दूँगा तुझे कभी, क़ब्र में बना लिया है आशियाँ अभी, लिपटा हुआ मैं कफ़न में, चादर सँवारता हूँ। आ न जाये नींद यूँ आगोश-ए-तुर्बत में मुझे, चाहता हूँ देखना हमराह-ए-रक़ीबा तुझे, फ़रेब थी ये ज़िंन्दगी, फ़ना से हारता हूँ। |
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