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08.20.2007
 
विरह की अगन जलाये रे!
महावीर शर्मा


फागुन की मस्त बयार चले, विरह की अगन जलाये रे।
हरे वसन के घूँघट से तू सरसोँ क्यों मुस्काये रे!

चाँद की शीतल किरणों से, श्रृंगार किया मैं ने अपना,
अँसुवन से नयनों का काजल, बार बार धुल जाये रे!

नगर नगर और ग्राम ग्राम में अबीर के बादल छाये,
प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे!

फगुआ, झूमर औ चौताला जब परवान चढ़ी जाये,
ढोल, मँजीरे और मृदँगा, तुम बिन जिय धड़काये रे!

बीत न जाये ये फागुन भी, जियरा तरसे होली खेलन,
गीतों की गमक, नृत्यों की धमक, सब तेरी याद दिलाये रे!

कागा इतना शोर मचाये, लाया है सन्देश पिया का,
मधुकर भी मधु-रस पी पी कर, फूलों पर मँडराये रे!
हरे वसन के घूँघट से सरसों भी मुख चमकाये रे!!

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