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08.20.2007
 
कविता
महावीर शर्मा


कवि हृदय विकल जब होता है तो भाव उमड़ ही आते हैं।
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।।

आते वसंत को जब देखा, हो विकसित कवि का मन बोला
आई उपवन में हरियाली, सुमनों ने दृग अंचल खोला
मुस्का कर देखा ऊपर को, जहाँ अंशुमालि थे घूम रहे
अपनी आल्हादित किरणों से सुमनों को मुख से चूम रहे
मधुमास में उनकी किरणों से पल्लव श्रृंगार बनाते हैं।
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।।

हो कर ओझल क्षण भर में ही, स्वप्नों का खंडन कर डाला
क्षण भर को ही क्यों आई थी, बोलो वासंती बाला
अब नयनों में ले भाव सजल, अधरों पर ले कम्पित वाणी
क्या हुआ तुम्हारे यौवन को पतझड़ में बोलो कल्याणी
कवि की वीणा के सुप्त तार बस वीत राग अब गाते हैं।
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।।

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