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| 08.20.2007 |
| हूक उठी दिल में. . . महावीर शर्मा |
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हूक उठी दिल में कुछ ऐसी, दूर क्षितिज तक चलता जाऊँ। उच्च शैल आनंद शिखर तक, अविचल होकर बढ़ता जाऊँ।। घनन घनन घन सघन गगन हो, दामिनी चमके दिग्दाहों से, तरल तिमिर ना रोक सकेगा, मुझ को मेरी इन राहों से, स्वच्छंद सुमन हों जहाँ खिले, गीत प्यार के गाता जाऊँ। गरल जलद की झड़ी लगी हो, गूँज रहे हों सुर-श्मशान, चिर-निद्रा का अट्टहास भी, गरज रहा हो प्रलय समान प्रलयंकारी अंधकार में, बन आलोक बिखरता जाऊँ अरुण अधर, नयनों का जादू, विघ्न बने पथ में छल बन के, छीन रहे विश्वास-अडिग को, मन की परवशता सी बन के, बुद्धि-चेतना जागी क्षण में, छल प्रपंच से बचता जाऊँ। रास्ते में देखा तो: दूर नगर से इक कुटिया में, टूट रहा था जीवन-बंधन, जीर्ण-शीर्ण रोगी था पीड़ित, मिटती सी रेखा सा जीवन, जीवन के मिटते रंगों में, रंग खुशी के भरता जाऊँ। नि:स्वार्थ भाव से सेवा-रत, आनंद-शिखर बन जाता है, जीवन के निर्जन उपवन में, स्वच्छंद सुमन खिल जाता है, जहाँ भूख से विकल दलित हो, दु:ख निवारण करता जाऊँ।। हूक उठी दिल में कुछ ऐसी, दूर क्षितिज तक चलता जाऊँ। उच्च शैल आनंद शिखर तक, अविचल होकर बढ़ता जाऊँ।। |
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