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08.20.2007
 
दो फूल
महावीर शर्मा

खिले एक डाली पर दो फूल।
आई एक वासंती बाला, पड़ती जल बून्दें अलकों से
विकसित सुमनों की सुवास पा, नयनों को ढकती पलकों से
कुछ खोल नयन फिर हाथ बढ़ा, दो सुमनों से एक तोड़ लिया
डलिया के रखे फूलों में एक और सुमन भी जोड़ लिया
मदिर चाल से चली पवन से लहरा उठा दुकूल।
खिले एक डाली पर दो फूल।

पहुंची गौरी के मन्दिर में श्रद्धा से मस्तक नत करके
माँ को फिर फूल किए अर्पित अपने को भी विस्मृत करके
गौरी की पूजा में आकर, वह सुमन भाग्य पर इठलाया
मुस्का कर कहने लगा ’अहा’! कितना स्वर्णिम अवसर पाया
उस डाली पर मिलता मुझ को, हर पग पग पर एक शूल।
खिले एक डाली पर दो फूल।

डाली से नीचे गिरा फूल, अगले दिन जब आँधी आई
मिट्टी पर पड़ कर सूख गया, मुख की मंजुलता मुरझाई
वह बाला पुन: वहाँ आई , नव विकसित सुमन चयन करने
पैरों के नीचे कुचल गया तो लगा फूल आहें भरने
जिस ने जीवन दिया अन्त में मिली वही फिर धूल।
खिले एक डाली पर दो फूल।

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