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ISSN 2292-9754

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07.14.2017


डॉ. शंकर शेष के नाटकों में चित्रित नारी जीवन

नाटक, साहित्य की सबसे सामाजिक विधा है। मनुष्य-जीवन और जगत् को उसमें प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। इसलिए वह उसकी अनुभूतियाँ का प्रामाणिक, सजीव और रचनात्मक चित्र हैं। नाटक की संरचना में मनुष्य के जीवन और उसके समस्या को उभारने की विशिष्ट क्षमता है। पूर्व और पश्चिम के नाट्य-चिंतक इस तथ्य का समर्थन करते हैं विश्व के कालजयी नाटक इसका पुष्ट प्रमाण है।

समय के साथ भारतीय समाज और मनुष्य में परिवर्तन आया। जीवन जटिल और चिंतन क्षेत्र व्यापक हुआ। जिससे नाटक में आदर्श और संतुलन की जगह मानव जीवन की समस्या और तनाव केंद्र में आ गया। शंकर शेष के नाटक समकालीन असंगत स्थितियों में जीवित व्यक्ति की जीवन समस्याओं के साक्षी हैं। उनमें मनुष्य की पीड़ा यातना और हताशा ही नहीं उसकी अदम्य जिजीविषा और समस्या का समाधान भी प्रस्तावित हुआ है।

भ्रष्टाचार, महंगाई, ग़रीबी, भुखमारी स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज की कटु सच्चाइयाँ हैं। समाज में अपसंस्कृति बढ़ने से सामाजिक समस्याएँ जटिल होती गयीं। शंकर शेष ने इन्हें संघर्षशील पात्रों के रूप में ढाला है। जीवन के छल-प्रपंच में घिरे इनके पात्र अपनी लड़ाई में टूटते नहीं है।

"रत्नगर्भा" की इला संबंधों पर हावी होती गई अर्थ संस्कृति से लड़ती है। "रत्नगर्भा" में नायिका इला को अपने पति के साथ अपने सम्बन्ध बनाकर रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। शादी के बाद इला का चेहरा एक दुर्घटना से कुरूप होने के कारण उसका पति उससे नफ़रत करता है। इला का पति सुनील ख़ुद कहता है "मैंने सौन्दर्य को अलौकिक शक्ति माना है। पर आज आकाश को मुझ पर ही टूटना था।"1 कुरूपता को सृष्टि की छाती पर लगा दाग़ समझनेवाला सुनील यह भूल जाता है कि यदि सौन्दर्य तथ्य है तो कुरूपता भी उतना ही बड़ा सत्य है। इला की कुरूपता को लेकर सुनील इला के पर अत्याचार करना शुरू करता है। अंत में इला की सम्पत्ति के लिए उसे मार डालने को भी तैयार हो जाता है। यह मालूम होने पर इला कहती है "लाओ मुझे दो ज़हर.....यदि मेरी मौत से तुम्हें सुख मिलता हो तो घोंट दो मेरा गला...बढ़ाओ हाथ।"2 इला इन अंतिम दो पंक्तियों में मृत्यु के लिए प्रस्तुत पराजित स्त्री के रूप में सामने आती है। जीवन संघर्ष व परिवार के प्रति असीम प्रेम के बावजूद उसे अविश्वास और नफ़रत ही मिलती है, तब निराश होकर अपने आप जीवन यात्रा समाप्त करना चाहती है।

नाटक "रत्नगर्भा" स्त्री-पुरुष संबंधों को आधार बनाकर लिखा गया है। नेटल के माध्यम से मानुष के सूक्ष्म आत्मिक सौन्दर्य और स्थूल बाह्य शारीरिक सौन्दर्य की समस्या और संघर्ष को चित्रित किया गया है। मन का सौन्दर्य एवं समर्पण श्रेष्ठ है अथवा तन का आकर्षण एवं विलास? यही मुख्य प्रश्न नाटककार दर्शाना चाहता है। नारी हृदय की कोमल निःस्वार्थ भावनाओं समर्पण एवं त्याग को पुरुष किस प्रकार अपनी वासनापूर्ति तथा अर्थ-पिपासा के अंधेपन में खंडित कर देता है। नारी घर परिवार से संघर्ष करती नज़र आती है।

"बिन बाती के दीप" नाटक में भी शंकर शेष ने पति-पत्नी के संबंधों को उद्घाटित किया है। भारतीय समाज में वैवाहिक जीवन के साथ ही स्त्री-पुरुष अर्थात पति-पत्नी के माध्यम से पारिवारिक जीवन की शुरुवात होती है। वैवाहिक जीवन के बाद पत्नी-पति को एक दुसरे को समझकर रहना, एक दुसरे के प्रति आत्म विश्वास रखना, मिल-जुल काम करना, दोनों के बीच स्नेह और सहानुभूति आदि आवश्यक हैं। लेकिन इसमें कुछ कमी होने पर पति-पत्नी के बीच कई समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

इस नाटक में शिवराज और विशाखा दोनों प्रेमी-प्रेमिका हैं शिवराज एक औसत श्रेणी का लेखक भी है। वहीं विशाखा एक प्रतिभावान एवं संवेदनशील लेखिका है। उसका लेखन शिवराज से उच्च श्रेणी का है। शिवराज अपनी लेखन क्षमताओं को भलीभाँति समझाता है। यद्यपि वह राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित होना चाहता है। दुर्भागयवश शिवराज की प्रेयसी विशाखा एक दुर्घटना में अंधी हो जाती है। परन्तु उसकी संवेदनशील लेखनी समाज के विभिन्न पहलुओं को बड़ी गहराई से उभारती है। महत्वाकांक्षाओं का दास शिवराज विशाखा के विवाह कर लेता है। वह विशाखा के अंधेपन का लाभ उठाकर उसके उपन्यासों को अपने नाम में छपवा लेता है। साहित्य जगत में वह एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।

प्रसिद्धि की महत्वाकांक्षा में वह इतना गिर जाता है कि विशाखा की आँखों के इलाज के नाम पर उसकी आँखों में ऐसी दवा डालता रहता है, जिससे उसकी आँखें ठीक ही न हों। वह अपनी टाइपिस्ट मंजू से कहता है, "विश्वास रखो, मंजू विशाखा अच्छी नहीं होगी तीन साल तक जो गलत दवा तुमने और मैंने डाली है; वह विशाखा की आँखें अच्छी न होने देगी। विशाखा अंधी रहेगी।"3

अंत में विशाखा सच्चाई जानकर दुखी अवश्य होती है, परन्तु वह स्वयं को अपनी पति से अलग नहीं मानती वह कहती है "तुम मुझ अंधी से प्यार कर सके तो क्या मैं तुम्हारा एक अपराध भी क्षमा नहीं कर सकती?"4 परिवार विघटन की समस्या उत्पन्न होने पर भी विशाखा जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखती है।

"मूर्तिकार" आधुनिक मध्यवर्गीय परिवारों की अर्थ समस्या को उभारनेवाला नाटक है। शेखर अंत्यत प्रतिभावन किन्तु आदर्शवादी मूर्तिकार है। वह अपने आदर्शवादी सिद्धांतों के कारण ग़रीब है। शेखर की पत्नी ललिता को अपने घर की गृहस्थी में दो वक़्त की रोटी की चिंता ही लगी रहती थी। ललिता समाज में अन्य संपन्न कलाकारों को देखती है। वह भी चाहती है कि उसका पति शेखर भी अपने आदर्शवादी सिद्धांतों को छोड़कर व्यवहारिक मार्ग अपनाए।

शेखर अपने आदर्शों से गिरकर, कलाकार से व्यापारी बनना नहीं चाहता। दूसरी ओर ललिता पारिवारिक धरातल से उपजे आर्थिक संकटों का मुकाबला कर रही थी। साथ ही उसे मकान-मालिक सेठ से भी टकराना पड़ता है। ललिता सेठ के मुंशी से कहती है "तू मुझे पैसे से खरीदना चाहता है। तू हमारी गरीबी का फायदा उठाना चाहता है.. तो जा अपने मालिक से कह दे... कि दुनिया भर का पूरा सोना इकट्ठा करके भी ललिता के नख को नहीं छुआ जा सकता"5 वह कहती है ललिता मर जाएगी, पर बिकेगी नहीं। अनेक प्रकार आर्थिक मुसीबत आने पर भी, वह अपने पति के सिद्धांतों के प्रति आदर रखती है।

समाज में नारी की आर्थिक समस्या के बारे में महादेवी वर्मा के शब्दों में "समाज ने स्त्री के सम्बन्ध में अर्थ का ऐसा विषय विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर संपन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही लगने योग्य है।"6

शंकर शेष के नाटकों में दुर्लभ विविधता देखने को मिलती है। इसका एक कारण तो यह है कि वे अपने पात्र, घटनाएँ, भाषा और विषय जीवन से उठाते हैं। जीवन विषयों से भरा है और उसमें कभी न ख़त्म होने वाली समस्याएँ और उसकी लड़ाइयाँ हैं; ख़ासकर नारियों की जीवन में। इसे शंकर शेष के नाटक बेहतर रूप में प्रस्तावित करते हैं। "रत्नगर्भा" में स्त्री-पुरुष संघर्ष के मूल में आर्थिक स्वार्थ सक्रिय है, लेकिन "मूर्तिकार" में अपेक्षाकृत अधिक गहरे एवं प्रामाणिक तरीक़े से शंकर शेष ने इस तथ्य का साक्षात्कार किया है।

"मूर्तिकार" में स्त्री-पुरुष संघर्ष आर्थिक दबाबों से उपज है तो "बिन बाती के दीप" में समाज आर्थिक धरातल पर अभिव्यक्त हुआ है।

संदर्भ

1. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "रत्नगर्भा" पृ.54
2. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "रत्नगर्भा" पृ.91
3. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "बिन बाती के दीप" पृ.128
4. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "बिन बाती के दीप" पृ.141
5. शंकर शेष समग्र नाटक (3) "मूर्तिकार" पृ.45
6. आधे भारत का संघर्ष नलिमणि शर्मा पृ.175

के. महालक्ष्मी
पीएच.डी. छात्रा,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
द.भा.हिं.प्र. सभा, मद्रास


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