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तुमने कहा था
पुरुष विचार है
स्त्री भाषा।
पुरुष अग्नि है
स्त्री ईंधन।
पुरुष सूर्य है
स्त्री आभा।
पुरुष संगीत है
स्त्री स्वर।
पुरुष आत्मा है
स्त्री शरीर।
पर सुनो
मेरे विष्णु, मेरे ब्रह्म, मेरे परम पुरुष
एक छोटी सी
हल्की सी जिज्ञासा कि
भाषा के बिना
विचार
निष्प्राण तो नहीं रह जाते कहीं?
ईंधन के बिना
अग्नि
शीत तो नहीं रह जाती कहीं?
स्वर के बिना
संगीत का क्या होगा?
आभाहीन सूर्य को
कौन कहेगा सूर्य?
बिना शरीर की
आत्मा से साक्षात्कार
किस-किस के बस में होगा।
सुनो
मेरे ब्रह्म, मेरे सृष्टि सर्जक
जगत जननी ही
मेरी सृष्टि का सत्य है।
यह बात मुझे
युगों पहले समझनी चाहिए थी
चलो आज ही सही
इक्कीसवीं शती के इस पूर्वाद्ध में
क्योंकि कहते हैं
तुम्हारे घर में देर है
अंधेर नहीं।
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