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ISSN 2292-9754

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08.03.2016


झीलों के शहर नैनीताल की यात्रा

 

जिन्हें गर्मी की छुट्टियाँ कहा जाता है, इस साल वह बरसात की छुट्टियाँ बन गईं थी। फिर भी बरसाती उमस और पसीने से थोड़ा सा छुटकारा पाने के लिए, बच्चों के होलिडे जोश को क़ायम रखने के लिए, अपने लिए वर्ष भर की स्मृतियाँ सँजोने के लिए ठंडे पहाड़ों की यात्रा पर तो जाना ही था। यूँ तो अपने पंजाब में कोई पर्वतीय पर्यटन स्थल ही नहीं है, फिर भी पड़ोस के राज्य हिमाचल के धर्मशाला, मैकलोडगंज, कुल्लू, मनाली, शिमला, डलहौज़ी और उनके आसपास के सेटेलाइट स्थल धर्मकोट वगैरह काफी नज़दीक पड़ते हैं। एक बार गाड़ी में बैठो और ठीक होटल के सामने आकर उतरो। सामान को बार-बार उतारने, चढ़ाने, सँभालने की कोई दिक्क़त नहीं।

धर्मशाला, मैकलोडगंज, कुल्लू, मनाली, शिमला, डलहौज़ी से उकताए बच्चे इस बार उत्तराखंड का मन बना चुके थे और उधर टी.वी., इंस्टा न्यूज़, समाचार पत्र वर्षा, बाढ़, भूमि स्खलन, रास्तों का बंद होना आदि की अपनी ख़बरों से सब के इरादे ध्वस्त कर रहे थे। 2012 की उत्तराखंड की त्रासदी की ओर भी बार-बार मन जा रहा था। सुझाव तो यह भी था कि कहीं जाना ही है तो डलहौज़ी तक हो आते हैं। चार-साढ़े चार घंटे का रास्ता, दो दिन रुको और पहाड़ की सैर की मोहर भी लग जाएगी। शिमला तक का दिलासा भी दिया जा रहा था। इधर तीन-चार दिनों से समाचार सबका मूड बदलने में लगे थे। निर्णय समुन्द्र तट से 1938 मीटर की ऊँचाई पर स्थित उत्तराखंड के झीलों के नगर नैनीताल का हुआ।

समस्या यह थी कि नैनीताल के लिए न सीधी रेल सेवाएँ हैं और न हवाई सेवाएँ। नज़दीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम 34 किलोमीटर दूर है और न्ज़दीकी एयरपोर्ट पंतनगर 55 किलोमीटर। सब तरह की सुविधाअसुविधा का ध्यान रखते हुए यू.पी. के मुरादाबाद के लिए और मुरादाबाद से वापसी की रेल गाड़ी की टिकटें बुक करवा दी गई। दोनों तरफ़ रात का सफ़र था। भले ही आगे की यात्रा (उत्तरप्रदेश से उत्तराखंड)132 किलो मीटर यानी साढ़े चार घंटे की थी। 12 जुलाई को शाम के पौने सात बजे अमृतसर से हावड़ा पकड़नी थी। कैब से परिवार रेलवे स्टेशन पहुँच गया। गाड़ी आध-पौन घंटा देरी से थी। लेकिन जाने के उत्साह में समय का पता ही नहीं चला। भारत में रहते हैं, इतना तो चलता ही है।

ए.सी. के कारण एकदम ठंडा कंपार्ट्मेंट था। बैठते ही चैन पड़ गया। थोड़ी रात होते ही रेलवे कर्मचारी खाने के ऑर्डर का पूछने लगे। रात का खाना हम साथ ही लेकर आए थे, फिर भी बिरयानी वगैरह मँगवा ली। इसी बीच रेलवे कर्मचारी लिफ़ाफ़ों में बंद साफ़-धुली चादरें और खुले सिरहाने-कंबल लाने लगे। टू-टायर स्लीपर थे। बच्चे मज़े के मूड में थे। गाड़ी में सोना उन्हें एडवेंचर लग रहा था।

मुझे पढ़े-देखे समाचारों के संदर्भ याद आ रहे थे। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट, वाजपेयी सरकार में 1999 से 2004 तक इंडस्ट्री, ऊर्जा और पर्यावरण मंत्री रहे सुरेश प्रभु वर्तमान मोदी सरकार के रेल मंत्री हैं। सरकार ने रेलवे का भारी-भरकम बजट पास किया है। सुरेश प्रभु ने कहा है कि रेलवे को जनसामान्य के जीवन का महत्वपूर्ण एवं उपयोगी अंग बनाने पर काम करेंगे। शब्दों से अधिक उनका काम बोलेगा। खानपान को लेकर बदलाव होगा। सी.सी.टी. वी॰ कैमरे से लैस गाड़ी चलेगी, वगैरह-वगैरह। पर यहाँ कुछ ख़ास महसूस नहीं हुआ। वही आधे-अधूरे, टूटे-फूटे, गंदे-बदबूदार वाशरूम, वही कचरे से भरे प्लेटफ़ार्म, वही कचरे को रेलवे प्लेटफ़ार्म से रेलवे पटरी पर फ़ेंकते सफ़ाई कर्मचारी, वही वर्षा के जल से कीचड़ बने रेलवे ट्रैक और उन पर तैरता कचरा।

सफ़र रात का था। 13 जुलाई प्रात: पाँच के आसपास हम गाड़ी से उतरे। टैक्सी तैयार थी और हम झीलों के शहर नैनीताल के लिए रवाना हो गए। कहते हैं कि कभी यहाँ 60 ताल थे। नैनी झील का निचला भाग तल्लीताल और ऊपरी भाग मल्लीताल कहलाता है। दस बजे तक हम तल्लीताल को मल्लीताल से जोड़ने वाली सड़क माल रोड पर स्थित होटल अल्का पहुँच चुके थे। पूरा माल प्राइवेट होटलों से भरा पड़ा है। हमारे अपार्टमेंट दूसरे तल्ले पर थे और बल्कोनी से पल-पल रंग बदलती नैनी झील के जलवे दिख रहे थे। उसके पीछे के घने जंगल दूर से और भी घने लग रहे थे। यात्रा की थकान को दूर करने के लिए शाम तक हम सबने विश्राम किया।

झील की रंगबिरंगी नौकाएँ अल्का होटल की बालकोनी से ही अपना जादू बिखेर रहीं थी। बच्चों के लिए तो अपने पर नियंत्रण करना कठिन हो रहा था। हमारा पहला कार्यक्रम नौकायन का ही बना । रंग-बिरंगे याट थे, पैडल वाली नौकाएँ थीं, माँझी भी पर्यटकों को नौका में झील के चक्कर लगवा रहे थे। हमें तो माँझी वाली नौकाएँ ही ठीक लगीं। पानी मे मछलियाँ तैर रही थीं। चक्कर लगाते-लगाते माँझी से बातचीत भी चलती रही कि ताल की गहराई 15 से 156 मीटर तक मापी गई है, हालाँकि सही-सही जानकारी किसी को भी नहीं है। लंबाई 1358 मीटर और चौड़ाई 458 मीटर है। ताल के चारों ओर सड़क है, जहाँ लोग सैर भी करते हैं। कभी-कभार जंगल से कोई भालू झील तक आ भी जाए तो स्वयं लौट जाता है, जैसे कि दो-एक दिन पहले समाचार पत्र में ख़बर आई थी। नौकायन के इलावा झील का प्रमुख आकर्षण वहाँ का मंत्र-मुग्ध कर देने वाला सफ़ेद बतखों का झुंड था। जिसे हम नित्य सुबह-शाम होटल अल्का की बालकोनी से मस्त विहार करते देखा करते थे। रात के दृश्य और भी नयनाभिराम थे। ताल में आसपास की पड़ रही रोशनियाँ हज़ारों बल्बों के रूप में जगमगा सौंदर्य को बहुगुणित कर रही थी।

14 जुलाई अर्थात अगले दिन चिड़ियाघर देखने के लिए हमें निकलना था। अल्का होटल से लगभग सौ मीटर की दूरी पर ही चिड़ियाघर के लिए गाडियाँ चलती थीं। दूर तो नहीं था, पर एकदम सीधी चढ़ाई थी। प्रवेश द्वार पर हम उतरे। इस चिड़ियाघर का नाम उत्तरप्रदेश के प्रथम मुख्य मंत्री और स्वतन्त्रता सेनानी गोविंद वल्लभ पंत के नाम पर रखा गया है। यहाँ मोर थे। कई तरह की चिड़ियाँ और दूसरे पक्षी थे। बंदर और लंगूर थे। लेकिन बच्चों का मन जहाँ रमा, वहाँ दो शेर थे, जो कभी मचान पर चढ़ जाते थे और कभी अपने क्षेत्र में घूमने लगते थे। बाहर दो बोर्ड लगे थे, जिन पर लिखा था कि इस शेर का नाम सुंदर है। इसकी माँ का नाम स्वेता था। उसने इसी चिड़ियाघर में सुंदर को अप्रैल 1998 को जन्म दिया। आम तौर पर शेर की आयु 15 से 20 वर्ष तक होती है। देवज्ञ- सर्वज्ञ बार-बार सुंदर को आवाज़ देते थे और सुंदर भी अपना नाम सुन गर्दन उठा कर देखता था। कुछ रास्ते सीढ़ियों और रेलिंग दोनों से थे। रंगबिरंगी मछलियों से भरा एक छोटा सा तालाब था। पीछे कल-कल करता झरना था। नैनीताल में छाते तो लगातार हमारे पास ही रहे। पता ही नहीं चलता था कि कब मूसलाधार वर्षा आ जाए और छमाछम सब तर-बतर हो जाएँ।

शाम को हम झील के ऊपरी हिस्से अर्थात मल्लीताल के लिए निकले। यहाँ बड़े-बड़े खुले मैदान थे। लोग खेल रहे थे। स्टेडियम की तरह बैठने की जगह थी। नयनदेवी का नयनाभिराम मंदिर यहीं पर है। बाहर तरह-तरह की चीज़ें बिक रहीं थी। लोग अपने लिए और अपनों के लिए उपहार खरीद रहे थे। शहर नैनीताल, नैना देवी के मन्दिर और नैनी झील का अपना ऐतिहासिक, पौराणिक, आध्यात्मिक महत्व है। कहते हैं कि नैनीताल की खोज 1841 में चीनी के व्यापारी एक अंग्रेज़ ने की थी। नैनीताल 64 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान शिव माता सती के शव को लेकर पूरे ब्रह्मांड में भटक रहे थे, तो देवी का एक नयन यहाँ गिर गया, इसी से इस जगह का नाम नैनीताल पड़ गया। नैनी झील में लगाई डुबकी मानसरोवर में लगाई डुबकी जितनी ही पवित्र मानी जाती है।

तीसरे दिन, 15 जुलाई को हम फिर रोप वे से म्यूज़ियम पार्क के लिए माल रोड से बड़े बाज़ार की तरफ़ निकले। ट्रॉली स्टेशन पर जाकर टिकट ली और बारी आने पर 2270 मीटर ऊँची चोटी पर जा पहुँचे। ट्रॉली में नयन आकार की स्पष्ट झील दिखने लगी। नीचे सड़कें भी थी, हरियाली भी, घर भी और घरों में घूमते, काम-काज के लिए अंदर-बाहर जाते लोग भी। म्यूज़ियम पार्क में बच्चों के लिए झूले थे, कारें थीं, घुड़सवारी थी, खाने-पीने की चज़ें थी। वापसी का समय टिकट पर ही लिखा था और उसी के हिसाब से ट्रॉली से हम लौट आए।

शाम को फिर नौकायन का मूड बना। अल्का से सड़क क्रॉस करते ही सामने माँझी नौकाएँ लिए बैठे थे। इस बार पैडल वाली नौकाओं पर बैठे, लेकिन जल्दी ही मौसम बिगड़ गया। मूसलाधार बारिश शुरु हो गई। घने कोहरे जैसा कुछ था कि नज़दीकी स्थल भी स्पष्ट नहीं दिख रहे थे। नौकाओं से उतर लौटना पड़ा। यह पंद्रह जुलाई की शाम थी। सोलह को सावन का प्रथम दिन था, पर उसने पूर्व संध्या को ही अपने रंग बिखेरने शुरु कर दिये थे। यह वर्षा पूरी रात ही नहीं, अगले दिन भी वैसी थी।

नैनीताल बहुत साफ़-सुथरा शहर है। कचरे का तो नामों-निशान भी नहीं। झील और सड़कें, मन्दिर और मैदान- सब स्वच्छ, सुंदर और आकर्षक। स्थान-स्थान पर लिखा था कि कचरा फेंकने पर 500 रुपये जुर्माना होगा। पर्यटक भी इसीलिए सचेत रहकर डस्ट्बिन का प्रयोग करते हैं। माल का रास्ता शाम छह से नौ बजे तक वाहनों के लिए बंद कर दिया जाता है और यात्री आराम से पैदल घूम सकते हैं।

16 जुलाई की दोपहर हमें वापसी के लिए निकलना था। पर पिछले दिन से शुरु हुई बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। कार्यक्रम तो वापसी पर कुछ दर्शनीय स्थल देखने का था, लेकिन मौसम ने इसकी इज़ाज़त नहीं दी। मौसम थोड़ा साफ़ होने पर जिम कॉर्बेट म्यूज़ियम पर ही रुकना हुआ। यह कालढूंगी से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित 22 बीघे में फैला है। यहाँ जिम कॉर्बेट की प्रतिमा, अँग्रेज़ी और हिन्दी में फ्रेम किया हुआ परिचय और उनकी धरोहर के रूप में कुछ चीज़ें थी। पर एक बात खटक रही थी कि इस धरोहर को पूरी तरह संरक्षित नहीं किया गया। वापसी की गाड़ी मुरादाबाद से रात ग्यारह बजे की थी। समय बिताने और डिनर वगैरह करने के लिए वेव माल में चले गए और फिर समय पर स्टेशन आ अमृतसर के लिए गाड़ी पकड़ ली।


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