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ISSN 2292-9754

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05.27.2017


 अछूते विषय और हिन्दी कहानी
(प्रवासी महिला कहानीकारों के विशेष संदर्भ में)

कथ्य-संवेदना के आधार पर कहानी साहित्य का अध्ययन पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि कटघरों के आधार पर किया जाता रहा है, या फिर चेतना, वादों और विमर्शों का एक मायाजाल सा शोध जगत को आच्छादित करता रहा है- मूल्यचेतना, मार्क्सवाद, नारी विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श वगैरह-वगैरह। लेकिन जब हम प्रवासी महिला कहानीकारों द्वारा रचित कहानी का अध्ययन करते हैं तो कठघरों के चक्रव्यूह चरमराते दिखाई देते हैं। इक्कीसवीं शती का जीवन और समस्याएँ, विलक्षण रूप-रंग लेकर बिखरने लगते हैं। जीवन की आहटें यहाँ गूँज-अनुगूँज बनकर, चुनौती बनकर प्रस्फुटित हुई हैं।

अंगदान यानी ज़रूरतमंदों के लिए अंगों के प्रत्यारोपण का दान। यह महादान है और अंग प्रत्यारोपण विज्ञान की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। 13 अगस्त अंगदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। हर साल लाखों लोगों की किडनी, लीवर, हृदय, फेफड़े, कॉर्निया, त्वचा, रक्त वाहिकाओं या शरीर के अन्य अंगों के काम न करने से मुश्किलें होती हैं/ मृत्यु हो जाती है। लेकिन अंगदान को लेकर लोगों में भय और आशंकाएँ हैं। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा के कहने पर इन्द्र देवता ने दधीची ऋषि की हड्डियों का दान लेकर बनाए अस्त्र से राक्षसों का वध किया था। नेशनल हैल्थ पोर्टल के एक सर्वेक्षण के अनुसार, "भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग पाँच लाख व्यक्तियों की मृत्यु अंगों की अनुपलब्धता के कारण होती है। जिनमें से दो लाख व्यक्ति लीवर की बीमारी और पच्चास हज़ार व्यक्ति हृदय की बीमारी से मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। इसके इलावा लगभग एक लाख पच्चास हज़ार व्यक्ति गुर्दा प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करते हैं। जिनमें से केवल पाँच हज़ार व्यक्तियों को ही गुर्दा प्रत्यारोपण का लाभ प्राप्त होता है।"1

अर्चना पेन्यूली की "हाइवे फॉर्टी सेवन"2 उस शुभा की कहानी है, जिसकी किडनी ट्रांसप्लांट होनी है और अस्पताल ने प्रतीक्षा के लिए कहा है। वह डेनमार्क के कोपेन्हेगेन में बेटों के साथ रह रही है, क्योंकि पति ने वर्षों पहले दूसरी औरत के कारण उसे छोड़ दिया था। अस्पताल को जैसे ही किडनी मिलती है, उसे बुला कर किडनी प्रत्यारोपित कर दी जाती है। पता चलता है कि किडनी उसकी उस सौतन की है, जिसकी सड़क दुर्घटना में हाइवे फॉर्टी सेवेन पर मृत्यु हो गई थी।

अरुणा सब्बरवाल की "16 जुलाई 1980"3 की श्रुति भाँजी की शादी पर अमेरिका, न्यूयार्क गई थी और जब से लौटी है गुमसुम सी है। न्यूयार्क में उसकी मुलाक़ात सॉफ़्टवेयर इंजीनियर जूही से हुई और बोस्टन में भी दो बार वे मिली। जूही सॉफ़्टवेयर इंजीनियर, कवयित्री, गायिका, चित्रकार सब है। जूही ने चार साल की उम्र में नेत्र ज्योति खो दी थी और 12 वर्ष की आयु में यानी 16 जुलाई 1980 को उसके नेत्र ट्रांसप्लांट करके डाक्टरों ने मानो उसे नव जीवन दिया। वह इसी दिन को अपने जन्मदिन की तरह मनाती है। दरअसल रेणु की माँ ने भी अंगदान किए थे। जैसे ही रेणु ने भारत फोन करके अपने पिता से माँ की मृत्यु का समय जानना चाहा तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि जूही को माँ की आँखें ही ट्रांसप्लांट की गई थी। प्रत्यारोपण नए जीवन सा होता है।

सपनों से जगमगाता दांपत्य तब अंधकारमय होने लगता है, जब घर-परिवार, संबंधी-समाज- वर्षों तक बच्चा न होने पर चिंता व्यक्त करने लगते हैं। खिलखिलाता दाम्पत्य मशीनी रोबोट बन जाता है। एक समय था, यह वज्रपात सिर्फ महिलाओं पर गिरता था। वे प्रताड़ित होती थी, घर से निकाल दी जाती थी, पति की दूसरी शादी कर दी जाती थी। आज वैज्ञानिक शोध ने चिंता का इंगित पुरुषीय कमियों की ओर मोड़ दिया है। सम्बन्धों की हक़ीक़त बदल गई है। ठोस अवधारणाएँ पिघलने लगी हैं। पुरुष बाँझपन मर्द का दर्द बन गया है। दम्यन्ती दत्ता लिखती हैं- "2013 के दरवाजे खुलते ही एक चिंताजनक शिकायत आई है कि भारतीय पुरुषों का वीर्य अब पहले जैसा नहीं रह गया।"4 मुंबई के जसलोक अस्पताल के असिस्टेंट रिप्रोडकशन की चीफ़ डॉ फीरोज़ा पारिख कहती हैं- "15 से 20 फ़ीसदी बेऔलाद दम्पतियों में अब अंगुली पुरुषों की तरफ घूम गई है। देश में संतानहीनता के 40 फ़ीसदी मामलों में पुरुषों की इन्फ़ेर्टिलिटी को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है।5 किराये की कोख या सेरोगेट मदर की बात की जाती है। कारण कोई भी लो, इस तकनीक का ख़ूब प्रयोग हो रहा है। मुंबई फ़िल्मी दुनिया के करण जौहर, शाहरुख खान, आमिर खान के सेरोगेट बच्चे हैं।

अचला शर्मा की "उस दिन आसमान में कितने रंग थे"6 वैज्ञानिक उपलब्धियों का उल्लेख लिए एक बोल्ड कहानी है। कहानी के रूपाली और अभिनव लंदन में रहते हैं। दोनों की ख़ूब अच्छी नौकरियाँ हैं। शादी को दस साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक कोई बच्चा नहीं है। रूपाली की उम्र चालीस हो गई है। वह न बच्चा गोद लेना चाहती है, न सैरोगेट मदर की मदद। बच्चे के लिए वह आई.वी.एफ़. तकनीक का उपयोग करना चाहती है। कहानी अस्पताल में स्पर्म जुटाने की प्रक्रिया से गुज़रते अभिनव पर केन्द्रित है। कमरे में प्ले ब्वॉय पत्रिका की प्रतियाँ हैं, ब्लू सी.डी. हैं। विवाह पूर्व गर्भपात करवाने वाली प्रेमिका की रूमानी यादें हैं।

कहते हैं कि टेस्ट ट्यूब बेबी यानी आई. वी. एफ़. तकनीक ने दुनिया के लाखों लोगों के जीवन में ख़ुशियाँ भर दी। यह तकनीक उत्तरी अमेरिका के प्रोफ़ेसर सर राबर्ट एडवर्ड्स द्वारा विकसित की गई। आज विश्व में इस तकनीक द्वारा पच्चास लाख बच्चों का जन्म हो चुका है। प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन का जन्म 1978 में हुआ। भारत की प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी 1990 में जन्मी कमला रत्नम बनी। आज वह स्वयम भी माँ बन चुकी हैं। सुदर्शन प्रियदर्शिनी की कहानी "अवैध नगरी"7 में टेस्ट ट्यूब बेबी की मन:स्थितियाँ और द्वंद्व हैं। तीस साल पहले जन्मा एक टेस्ट ट्यूब बेबी आज वैज्ञानिक पुरू बन अपने बायलोजिकल पिता के विषय में सोच रहा है। वह टेस्ट ट्यूब बेबी है, यह जानते ही मानो वह अवैध, लावारिस और यतीम हो जाता, उस पर जैसे हिरोशिमा-नागासाकी की तरह बॉम्ब गिर जाता है उसके लिए परम्परा, वंश, रक्त संबंध, धर्म- अधर्म, नैतिक-अनैतिक- सब की परिभाषा बदल जाती है। जिसे वह जीवन भर पिता समझता रहा , वह उसका पिता नहीं, यह सच्चाई उसे झकझोर जाती है और यह जानकर कि पति को बिजनेस में घाटे के कारण कमतर आँकते हुये, विद्वान बेटे को जन्म देने के लिए माँ ने यह चाल चली- किसी डॉ. के स्पर्म लिए, उसके पाँव तले से ज़मीन निकाल जाती है। कहानी इस सत्य पर चिंता व्यक्त करती है कि एक दिन टेस्ट ट्यूब से जन्में बच्चों से दुनिया अवैध नगरी हो जाएगी और सब मूल्य धूल हो जाएँगे।

जीवन को पलों में बनाने बिगाड़ने वाली, मालामाल या कंगाल कर देने वाली एक दुनिया शेयर बाज़ार की भी होती है। न्यूयार्क स्टॉक एक्स्चेंज अठारवीं शती के अंत में अस्तित्व में आया था और भारत में दलाल स्ट्रीट की व्यवस्थित रूप से स्थापना 1875 में मुंबई में हुई। 2010 में वालस्ट्रीट 11.92 ट्रिलियम डॉलर का विश्व का सबसे बड़ा शेयर बाज़ार था। पूँजी की तीव्र वृद्धि के लिए शेयर बाज़ार में पैसा लगाया जाता है। आज सारा लेन देन कम्प्यूटर द्वारा होता है। यह सूचना क्रान्ति का उत्कृष्टतम रूप है। लेकिन घोटाले और गिरावट भी इस शेयर मार्केट से जुड़े हैं। भारत में सत्यम (140162 करोड़), केतन पारिख (800 करोड़), चैनसम भंसानी (1200 करोड़), हर्षद मेहता (4000 करोड़) आदि के घोटाले शेयर होल्डर्स को चूर-चूर कर चुके हैं। वाल स्ट्रीट में भी 1987, 1997, 2008 आदि में अनेक बार सब तहस- नहस करने वाली गिरावट आ चुकी है।

सुधा ओम ढींगरा की "एग्जिट"8 का अजय मेहता शेयर्स में ख़ूब कमा रहा है। कई बार तो घंटे में ही पच्चास हज़ार डॉलर बना लेता है। पहले नौकरी भी करता था। ऑफ़िस में भी शेयर्स का काम करने के कारण निकाल दिया गया। पार्टियों में डींगें मारना उसकी आदत है। सर्जन भी उसके सामने तुच्छ हैं। महँगी कारें,ज़ेवरात, रहन-सहन में उसका कोई मुक़ाबला नहीं। पर शेयर बाज़ार की मंदी में आई अविश्वसनीय गिरावट उसे अस्पताल पहुँचा देती है। घर, कारें, पैसा, ज़ेवर सब ख़त्म हो जाता है। यह सट्टाबाज़ार उसे नष्ट कर देता है। पूर्णिमा वर्मन की "एक शहर जादू जादू"9 में जयपुर में अनन्या के सामने वाले घर की प्रौढ़ा शेयर ब्रोकर है, जबकि शेयर बाज़ार की परिगणना पुरुषीय क्षेत्राधिकार में की जाती रही है।

प्रवासी महिला कहानीकारों ने प्राकृतिक आपदाओं और उनसे जूझती व्यवस्था का भी बड़ी बारीक़ी से वर्णन किया है। चक्रवाती तूफ़ानों की बात करें तो वैश्विक स्तर पर असंख्य प्रलय आ चुकी हैं। विश्व के सभी धर्म ग्रंथों में महा प्रलय का उल्लेख मिलता है। इंडोनेशिया के उत्तर—पूर्व में सुमात्रा द्वीप के समुद्र के नीचे एक तीव्र भूकम्प आया। जिसे गत चालीस वर्षों में विश्व का सबसे भयंकर तूफ़ान/ सूनामी माना गया है। सूनामी मूलतः जापानी शब्द है। सू का अर्थ है बंदरगाह और नामी का अर्थ है लहरें। 1900 के आसपास चक्रवाती तूफानों का नामकरण करने की शुरूआत हुई। नरगिस, लैला, कैटरीना, नीलम, फैलीन, हैलन, गुस्ताव, हुदहुद आदि अनेक नाम दिये गये। नामकरण मायामी नेशनल हेरीकेन सेंटर और राष्ट्रसंघ की वर्ड मेटीरिओलोजिकल ओरगेनाईज़ेशन प्रभावित क्षेत्र को ध्यान में रख कर करते हैं। विश्व के सभी धर्म ग्रंथों में जल प्रलय का उल्लेख मिलता है। पौराणिक मिथ के अनुसार प्राकृतिक प्रलय ब्रह्मा के सौ वर्ष बीतने पर आती है। जय शंकर प्रसाद के महाकाव्य "कामायनी" का आरम्भ ही जल प्रलय की घटना से होता है- "हिमगिरी के उत्तंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह, छांह, एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह। नीचे जल था, ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता, जड़ कहो उसे या चेतन।"

इलाप्रसाद की डायरी शैली में लिखी कहानी "तूफ़ान की डायरी'"10 अमेरिका के समुद्र तट पर आए चक्रवाती तूफ़ान गुस्ताव की आपदाओं और आपदा प्रबंधन को लेकर लिखी गई कहानी है। यहाँ दिवा और नीरज, ब्रेडा और जेरेमी, वेरेनिका, डोरोथी, निधि, लता, बच्चों आदि के माध्यम से स्थितियों को दिखाया गया है। 24 घंटों में अमेरिका के टर्टल और मेरीन बीच ही नहीं आसपास के शहरों का जीवन भी तहस-नहस हो जाता है। कुछ वर्ष पहले अलीशिया और कैटरीना भी आये थे, लेकिन गुस्ताव द्वारा लाई गई महांप्रलय बहुत वीभत्स है| हर टेलीविज़न चैनल से लगातार एक ही सन्देश प्रसारित होने लगता है- गुस्ताव गो अवे, टीना ड्ज़ नाट लिव हेयर। तूफ़ान टर्टल बीच पर आया और नायिका मरीन बीच पर है। गुस्ताव पूरे चौबीस घण्टे शहर में तबाही मचा अगले शहर को निकल जाता है।…एक हज़ार पेड़, ट्रैफिक सिग्नल, बिजली के तार गिर जाते हैं। शहर का समुद्री हिस्सा रातों-रात एक द्वीप में तब्दील हो जाता है। जिन्होंने सरकारी आदेश की अवहेलना कर अपने घर नहीं छोड़े थे, वे अब उस द्वीप में भूखे-प्यासे रहने के लिये मजबूर हैं। उस हिस्से की संचार व्यवस्था पूरी तरह ठ्प्प हो जाती है, दुकानें बंद, सड़क पर रात का कर्फ्यू, बिजली न होने से फ़्रिज बंद। घरों में दो दिन का भी खाना नहीं। हवा ने कारों को ज़मीन से दो-दो फुट उछाल कर टोटल कर दिया है। दिवा के घर की छत गिर जाती है। चीज़ों की क़ीमतें आसमान को छूने लगती हैं। तूफ़ान के एक महीना बाद तक भी स्थितियाँ सामान्य नहीं हो पाती।11

सरकारी प्रबंधन भी साथ-साथ चल रहा है। सरकारी सहायता कोष के कई केंद्र खुल जाते हैं। मुफ़्त राहत सामग्री बाँटी जाती है। पाँचवें दिन सडक पर एनर्जी कम्पनी की गाडियाँ भागने लगती हैं। बाहरवें दिन अस्पताल, सडकें, शॉपिंग माल पर बिजली आती है। सोहलवें दिन बाज़ार खुलता है। ट्रेफ़िक सिगनल चलती है। गुस्ताव के कारण सरकार होटल टैक्स माफ़ कर देती है, ताकि बेघर शिफ़्ट हो सकें।

इस चक्रवात की उपलब्धियाँ भी हैं। पड़ोसियों के बीच का अजनबीपन समाप्त हो जाता है। दिवा वेरेनिया की मशीन पर कपड़े धोती है। जैरेमी की सहायता से प्रभावित हो ब्रेडा उससे शादी कर लेती है।

एचआईवी लाइलाज और जानलेवा बीमारी है। यह शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता को कम करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी ही माना है। शोध चल रहे हैं, लेकिन अभी तक इससे पूर्ण निदान में सफलता नहीं मिली। शैलजा सेक्सेना की "उसका जाना"12 में बेकारी ने बेला के मामा चंदर को विदेश का रास्ता दिखाया था और सुनहरे भविष्य का स्वप्न देखते पिता वंशीधर भी सपरिवार यहाँ आ गए। पिता भारत में जिस दवाइयों के कारखाने में काम करते थे, वहाँ उनके नीचे आठ लोग थे और यहाँ ड्राइवरी सीख कर ट्रक चलाने पड़े। सामान्य स्वभाव के पिता अब घर खर्च पर चिल्लाते और माँ लीला को जानवरों की तरह पीटते हैं। उन्होने यहाँ आकर सँजोया गया एड्स का उपहार माँ को भी भेंट कर दिया है। अब स्थिति यह है कि वेल्फ़ेयर स्टेट माँ और बच्चों को पिता से अलग करने के लिए विवश है। ज़रूरी नहीं कि प्रवास स्वप्न पूरे ही करे, वह पाताल में भी धकेल देता है। यहाँ आकर या तो लोग समझौते कर लेते हैं या मन: रोगी से बनकर असाध्य शारीरिक रोग भी पाल लेते हैं।

दिव्या माथुर की "2050"13 साढ़े तीन दशक बाद का ब्रिटेन लिए है। बात आने वाले 2050 की है। ब्रिटेन के प्रशासन ने धरती पर स्वर्ग लाने के लिए अनेक हिटलरशाही क़ानून बना रखे हैं। जिनके कारण लाखों दिलों में नरक पल रहे हैं। ऋचा और वेद निस्संतान दंपति बच्चे के लिए तड़प रहे है। उन्होंने समाज सुरक्षा परिषद में बच्चा पैदा करने के लिए आवेदन दे रखा है, पर अभी तक अनुमति नहीं मिल पाई। वेद का आई क्यू तीन आने पर वह ट्यूशन रख कर रट्टे लगाता है, तो भी आई क्यू पाँच आता है और वह एक अंक से रह जाता है। आप किसी के बच्चे को जन्म नहीं दे सकते, क्योंकि समाज सुरक्षा परिषद के पास सबके डी.एन.ए. सुरक्षित हैं। "राइट टू हैव बेबीज़" संस्था के अध्यक्ष को सरकार ने पता नहीं कहाँ छुपा रखा है। बच्चे के 60 प्रतिशत से कम अंक आने पर परिषद उसे अपनी देख-रेख में ले लेती है। आप सरकार के ख़िलाफ़ बात नहीं कर सकते, क्योंकि जगह-जगह देखने-सुनने वाले कनसील्ड कैमरे लगे है। नसलवाद ऐसा है कि गोरों को झट से बच्चा पैदा करने की इज़ाजत मिल जाती है। आत्महत्या की काफ़ी डिमांड है। उसके लिए भी आत्महत्या परामर्श परिषद से फ़ॉर्म लेकर भरना पड़ता है और बारी आने में वर्षों लग जाते हैं। बादल/ बारिश मौसम विभाग के हाथ में है। अधिकतर बारिश रात को की जाती है कि लोगों की दिनचर्या में बाधा न आए। गर्भनिरोधक गोलियाँ बचपन से ही देनी शुरू कर देते हैं। सफ़ाई का काम रोबर्ट्स करते हैं अर्थात पूरी कहानी फ़ैन्टेसी शिल्प में कही गई है।

प्रवासी महिला कहानीकारों ने अनेकानेक अछूते विषय लिए हैं। हैफ़ फादर और लिव-इन है। नसलवाद, बाज़ारवाद और सशक्तिकरण है। समलैंगिकता जैसे अवैध विषय हैं। परा-मनोविज्ञान है। अपने और अपनाए देशों की बहुस्तरीय तुलनाएँ और समस्याएँ हैं। उलझनें, पीछे मुड़-मुड़ कर देखते हुये भी आगे बढ़ने की वृति, प्रवृति और अकेलापन है। जिनका उल्लेख मैंने अपने अन्य शोधपत्रों में किया है। यहाँ बस इतना ही।

संदर्भ:

1. http;//hi.nhp.gov.in.अंगदान दिवस
2. अर्चना पेन्यूली, हाइवे फॉर्टी सेवेन, वागर्थ, दिसम्बर 2004
3. अरुणा सब्बरवाल, 16 जुलाई 1980, आधारशिला, 20 जुलाई 2014
4. http//m.aajtak.in Male infertility, 2nd dec 2016, new delhi
5. वही।
6. अचला शर्मा, उस दिन आसमान में कितने रंग थे, अभिव्यक्ति, 15ज जून 2015
7. सुदर्शन प्रियदर्शिनी, अवैध नगरी, अभिव्यक्ति, 15 सितंबर २०१५
8. सुधा ओम ढींगरा, एग्जिट, कौन सी ज़मीन अपनी, भावना, दिल्ली, 2011
9.http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2013/ek_shahar/ek_shahar_jadoo.htm
10. इला प्रसाद, तूफान की डायरी, उस स्त्री का नाम, भावना, दिल्ली, 2010
11. 12 . वही, पृष्ठ 122
12. शैलजा सेकसेना, उसका जाना, साहित्यकुंज, 22 फरवरी 2014
13. दिव्या माथुर, 2050, 2 050 और अन्य कहानियाँ, डायमंड पॉकेट बुक्स, दिल्ली, 2011


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