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ISSN 2292-9754

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03.31.2017


बचा रहे औरत का चिड़ियापन

मौसम आ गया है
फिर से
पत्नी और चिड़ियों के बीच
नोक-झोंक का,
पत्नी
घर सँवारने की ज़िद्द में
उजाड़ देती है घोंसले
चिड़ियेँ घर बसाने की आकांक्षा में
बिखेर देती हैं पत्नी का झाड़ू
और
गूँथ देती हैं तिनका-तिनका
किसी रोशनदान, आले या अलमारी की
ऊपरवाली ताक में!

चिड़ियों को नहीं मालूम
कि
इन सबका मालिक भी है कोई
वे तो सारी दुनिया को
समझती हैं अपना
और होती हैं अचांभित
कि कोई क्यों उन्हें
अपनी दुनिया से
कर देना चाहता है बेदख़ल

एक दिन
बिखर जाता है छिटककर
पत्नी के हाथ से झाड़ू
चिड़ियेँ बेख़ौफ़ चुनती हैं तिनके
आले, रोशनदान में
बस जाती हैं बस्तियाँ
पत्नी
टुकुर-टुकुर ताकती है रोशनदान को
और होती है प्रमुदित
सुनकर चीं चीं कलरव!

मुझे
बू आती है किसी दुरभिसंधि की
मेरी हैरानी भाँप
पत्नी
दीवार पर टँगे कैलेण्डर को
एक पल
देखती है तिरछी नज़र से
फिर
छिपा लेती है मुँह मेरे सीने में
(जैसे कोई चिड़िया स्वयं को घोंसले में)
कैलेण्डर पर
एक शिशु की
भोली मुस्कराहटों के
छितरे हुए हैं इन्द्रधनुषी रंग
पत्नी की आँखों में
फुदक रही है मासूम चिड़िया
वही
सर्वव्यापी अपनत्व
वे ही मुलायम डैने
आकाश को माप लेने का
वैसा ही हौसला और हिम्मत

सोचता हूँ मैं
बचा रहे औरत का चिड़ियापन,
बची रहेगी दुनिया!


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