अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.31.2017


बचा रहे आपस का प्रेम

एक विचार अमूर्त सा
कौंधता है भीतर
कसमसाता है बीज की तरह
हौले से
सिर उठाती है कविता
फूट रहा हो जैसे
कोई अँखुआ
धरती को भेद कर;

तना बनेगा
शाखें निकलेंगी
पत्तियां प्रकटेंगी
एक दिन भरा-पूरा
हरा-भरा
पेड़ बनेगी कविता

पेड़ ही तो है कविता
इस झुलसाने वाले समय में
कविता से इतर
छाँव कहाँ
सुकून कहाँ !
यहीं तो मिल बैठ सकते हैं
सब साथ-साथ
चल पड़ने को फिर से
तरो ताज़ा हो कर

लकड़हारों को
कहाँ सुहाती है कविता
कहाँ सुहाता है उन्हें
लोगों का मिलना जुलना
प्रेम से बोलना बतियाना
भयभीत करती रहती है उन्हें
कविता के पत्तों की
खड़खड़ाहट
इसीलिये तो घूम रहे हैं वे
हाथ में कुल्हाड़ी लिये
हिंसक शब्दों के हत्थे वाली

बचाना है हमें कविता को
इन क्रूर लकड़हारों से
ताकि निर्भीक हो
बैठ सकें हम
इसकी छाँव में

ताकि
बचा रहे
आपस का प्रेम


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें